Saturday, 28 April 2018

बम्बई की लखनवी पाव भाजी

अगर आप कभी हज़रतगंज जाकर सप्रू मार्ग की तरफ जाएंगे तो कैथेड्रल के पीछे आपको ये स्टाल गाँधी खादी ग्रामउद्योग के साथ दिख जाएगा।


100 रुपए पर प्लेट की ये पाव-भाजी अच्छी है, और उसमें स्वाद भी है, पर इस अद्भुत डिश को नार्थ इंडियन बनाने के लिए इसमें ज़बरदस्त मक्खन डाल दिया गया। मुझे व्यक्तिगत तौर पर ये लगा कि अगर इनकी डिश में मक्खन और दाम में रुपए कम हों तो इसको हर कोई खाना चाहेगा।

वैसे इसको खाने का प्लान बनवाने के लिए मैं अपने साथियों को धन्यवाद देना चाहूंगा। एक अच्छा अनुभव था, एक अच्छा लंच ऑप्शन।

आला अफसर

पिछले शुक्रवार को मैं जब बुक फेयर गया तो वहीँ पता चला कि एक नाटक भी हो रहा है जिसका नाम था आला अफसर। अब इस नाटक को पहले कभी देखा नहीं था और नाटक देखने और करने की ऐसी लत लगी हुई है कि रहा ना गया।

मैंने ऑडिटोरियम में एंट्री की तो बस अभी शुरुआत ही हुई थी। इसको देख मुझे हमारे नाटक, मुंशी प्रेमचंद के 'मोटेराम का सत्याग्रह' की याद आ गई।

नाटक की रूपरेखा बिलकुल समान थी जहाँ एक अफसर के आने की बात सुनकर सभी हैरान थे, और उसे रिझाने के तरीकों पर विचार कर रहे थे।

उसके बाद पता चला की खुद चेयरमैन साहब उस अफसर को लेने और आवभगत करने पहुंचे। उसके बाद शुरू हुआ उस अफसर का रौब, उसके किस्से, उसके अंतरंग प्रेम की कहानियां।

अब चूँकि ये सबकुछ लखनऊ में था तो संगीत भी था, और वो भी लाइव। मतलब हारमोनियम, ढोलक वाले स्टेज के अपर साइड पर किनारे बैठे हुए थे और उसको बजा रहे थे।


नाटक को कॉमिकल रखा गया था, और उसमें हल्की फुलकी सटायर की झलक थी। ज़्यादातर गीतों में गैंग्स ऑफ़ वासेपुर के इस गीत की झलक थी।


नाटक के अंत में पता चलता है कि वो एक नकली अफसर था और सबको चूना लगाकर चला गया। असली अफसर बाद में आनेवाला है।

नाटक में मुख्या अफसर का किरदार प्रमुख था और सबसे ज़्यादा स्टेज पर वही था। एक अच्छा शो था, बस कभी कभी ओवर द टॉप डायलॉग्स और सांग्स मज़ा खराब कर रहे थे।

Friday, 27 April 2018

लखनऊ बुक फेयर का आगाज़ हो गया है

आज बड़ी व्यस्तता थी। पहले पहल तो यही सोच रहा था कि क्या आज काम खत्म होगा भी या नहीं। खैर आज सुबह जब अखबार पढ़ा तो ये एहसास हुआ कि आखिरकार अखबार पढ़ना क्यों अच्छा है।

आजकल अखबार में शहर में होने वाली प्रमुख घटनाओं के बारे में लिखा होता है। जैसे फला मंत्री वहां आएंगे, या फला संतरी वहां जाएंगे। वैसी ही एक घटना पर मेरी निगाह पड़ी जिसमें ये लिखा था कि आज लखनऊ बुक फेयर शुरू होने जा रहा है।


अब मुझ जैसे किताबी कीड़े को और क्या चाहिए? पढ़ने को एक किताब हो और चाय का प्याला, ये गठजोड़ बेहद निराला है। वैसे चाय तो वहां थी पर पीने का दिल नहीं किया।


जैसे ही कदम अंदर पड़े तो उस खुले बाग में ऐसा लगा जैसे वो सारी किताबें मुझे बुला रही हों। एक एक कर लगभग सारे स्टाल्स पर गया, पर जिस किताब की उम्मीद थी वो वहां मिली ही नहीं।



मुंबई हो या दिल्ली, चेन्नई हो या लखनऊ, हर जगह की किताबें वहां दिखी।


जिस चीज़ ने मुझे हँसा दिया वो था रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया का स्टाल जहां के अधिकारी समय के पाबंद थे। शाम के आफिस के समय की समयसीमा समाप्त थी और उनकी सेवाएं भी।

कुछ यही हाल आल इंडिया रेडियो के स्टाल पर भी था जहां कोई था ही नहीं। वो जैसे बस में रुमाल डालकर हम सीट पर कब्ज़ा कर लेते हैं कुछ वैसा ही आलम वहां की कुर्सियां भी बयां कर रही थी। अगर कोई आकर पूछे तो ये कहा जा सकता है कि सर मेरा बैग था, मतलब मैं उपस्थित था।

















मेरठ से आए हुए स्टाल ने मेरा ध्यान अपनी तरफ खींचा और उनकी सुंदर कृतियाँ देखकर बेहद अच्छा लगा।


पर एक बुक फेयर में हैंडलूम स्टाल कुछ समझ नहीं आया।



वैसे अगर आप शहर में है तो इस बुक फेयर में ज़रूर जाएं क्योंकि किताबें सबसे अच्छी दोस्त होती हैं।

आखिरकार नाटक देखने का टर्न आ ही गया

नाटक एक ऐसी विधा है जिसमें जाने के बाद आप उससे दूर नहीं रह सकते। आप अनायास ही उसकी तरफ खिंचे चले जाते हैं।

पिछले हफ्ते मंगलवार की देर शाम मुझे ये पता चला कि आज एक नाटक 'टर्न' होने वाला है। बस फिर क्या था, मैंने प्लान बनाने शुरू किए और इस नाटक का आनंद लिया।


नाटक की कहानी दो बुजुर्ग लोगों के इर्द गिर्द है जो अपने जीवनसाथी खो चुके हैं और मुंबई में रहते हैं। वहां कि दौड़ भाग भरी जिंदगी, मुझे अपनी स्पेस चाहिए की जद्दोजहद और फ्रीडम की लड़ाई।


नाटक में दोनों अपने खाली पड़े वक्त को काटने की कोशिश करते हैं। आभा अभी पुणे से आई है और अपने बच्चे निशांत के साथ रहती है। उसी फ्लैट में उसके साथ लिवइन रिलेशनशिप में रह रही महिला मित्र भी है जो निशांत की माँ से हर सुबह लड़ती है। इस चक्कर में आभा का गाने का क्रम बंद हो चुका है और वो अब बालकनी पर खड़े होकर चाय भी नहीं पीती।

वहीं दूसरी तरफ सामने के घर में एक रिटायर्ड पिता है जिसकी बिटिया अभी दूसरे शहर से आई है और वो चाहती है कि उसकी शादी होने से पहले उसके पिता दोबारा शादी कर लें।

आजतक अपनी बेटी की हर मांग खुशी खुशी पूरी करने वाले ये पिता अपनी बच्ची से इस सवाल की वजह पूछते हैं तो उन्हें ये खबर होती है कि वो एक लड़के को पसन्द करती है और वो जल्द ही उसका हाथ मांगने उनके पास आएगा।


बिटिया फिर जिद करती है कि उसके पिता अपनी अच्छी महिला मित्र वृंदा जी से शादी कर लें, पर पिता उसे नकार देते हैं।

अपने हालातों से जूझते ये दो लोग कैसे एक दूसरे में अपने आराम का रास्ता तलाश लेते हैं, और कैसे उनकी ज़िंदगी एक टर्न लेती है, ये कहानी उसके बारे में है।


नाटक बहुत ही खूबसूरत था, पर उसकी तस्वीरें शायद उतनी खूबसूरत ना हो। मुझे इस नाटक के अंत में अपनी एक कविता की पंक्तियां याद आ गई:

कौन भला किसका जीवनसाथी है,
ये अफसाना है, जिसकी मियाद बाकी है,
जब ज़िन्दगी के कारवाँ को चलते ही रहना है,
तो ये ना कहिए कुछ खत्म हुआ, कहिए अभी बात बाकी है।

- शुक्ला

Tuesday, 17 May 2016

वो सुबह कभी तो आएगी!

2014 के अपने ब्लॉग से साभार।


वो सुबह कभी तो आएगी!

वो सुबह कभी तो आएगी,
जब अखबारों की सुर्खियां,
वारदातों की खबर का शोर नहीं,
खुशियों के गीत सुनाएँगी,
जब लड़कियाँ घरो से बेख़ौफ़ निकल पाएँगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,

जब सास-बहु के झगडे नहीं,
घर में प्यार की धुन गुनगुनाएगी,
और बहु के जलने/मरने की नहीं,
उसके उन्नति की खबरें आएँगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,

जब घर से निकलती लड़की बेख़ौफ़ चल पाएगी,
जब वासना नहीं, इज़्ज़त की नजरें देख पाएँगी,
जब घर में बैठी उसकी माँ निश्चिंत घर पे रह पाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,

जब लड़कियों के बलात्कार की घटनाएँ बंद हो जाएँगी,
जब लड़कियों को कोख में मारने की प्रथा बंद हो जाएगी,
जब वो भी ख़ुशी से हसेंगी, खेलेंगी और मुस्कराएँगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,

जब नेताओ का मानसिक संतुलन सही हो पाएगा,
जब बयानों में राजनीति नहीं, जनता का दर्द आएगा,
जब उनकी सोच संकीर्ण नहीं, कुछ ब्रॉड हो जाएगी,
वो सुबह कभी तो आएगी,

जब आम इंसान को उसके हक़ मिल पाएंगे,
जब घोटालों की जगह पैसे का हक़ लोगो को मिल पाएंगे,
जब आम इंसान के सपने भी पूरे हो पाएंगे,
वो सुबह कभी तो आएगी,

-शुक्ल

Saturday, 7 May 2016

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी

आजकल की इस दुनिया में चारो तरफ इतनी भीड़ है, इतने लोग है की एक पल को समझ में ही नहीं आता की आखिर क्या हो रहा है और हम कहा जा रहे है।

चलते चलते आजकल इंसान थकता नहीं है, १२-१४ घंटे का काम(यात्रा सहित) और उसपर इंसान का एक ऐसा रूप जहाँ वो लगातार बिजली के उपकरणों से लैस, जी हाँ, एक पल के लिए भी इससे दूर नहीं, कभी लैपटॉप, कभी मोबाइल, चार्जर, टी. वी. ना जाने और क्या क्या और उसपर इंसानी हुजूम, फिर चाहे वो दिल्ली की मेट्रो हो या बम्बई की लोकल, हर तरफ बस बेशुमार आदमी।

इतना इंसान जाता कहा है? आप कहेंगे की अपने काम पर, मगर काम तो एक बहाना है, असल मे इंसान बस अपने लिए कुछ पल तलाशने की कोशिश करता है, इतनी भीड़ में भी, इतने लोगों के बीच। ये अजीब है ना की इंसान तो इस दुनिया में कई है मगर लोग खुद में इतने उलझे हुए है की चीज़ों को सुलझा ही नहीं पा रहे।

इक गाँठ है जो उन्होंने खुद बनाई और अब खुद ही उसे खोल पाना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है। देखिए ना, अब वो उस गाँठ को टी. वी. देखकर, फिल्में देखकर, सप्ताहांत पर हँसकर खोलने की कोशिश करते है, मगर गाँठ तो कभी खुलती ही नहीं, और एक दिन खुद इसी गाँठ की चपेट में आकर खत्म हो जाते है।

इंसान कितना अकेला, कितना तन्हा चल रहा है ये तो आप एक खूबसूरत नज़्म सुनकर अंदाजा लगा सकते है, जो मरहूम ग़ज़ल गायक श्री जगजीत सिंह ने गाई थी। सुनिए और मेरे इस ब्लॉग का उस नज़्म से नाता देखिए।


हर इक दिन अपने ही बोझ को हम सब ढोते है, और इक दिन इक मज़ार में तब्दील हो जाते है। कितनी बड़ी बात कही है उन्होंने, कमाल।

Sunday, 1 May 2016

ज़िन्दगी की कविता

ये कविता मैंने नहीं लिखी है, मुझे व्हाट्सएप्प पर साझा की गई, और ये बहुत ही प्रासंगिक लगी इसलिए मैं आप सब लोगों के साथ साझा कर रहा हूँ। इस कविता के मूल लेखक को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ।


Sunday, 20 March 2016

बदलाव को स्वीकार कीजिए

बदलाव एक ऐसी सतत होने वाली चीज़ है जिसे हम चाह कर भी इक दूजे से अलग नहीं कर सकते। आप सोच रहे होंगे, एक दूजे से? जी, इक दूजे से। हर पल दूसरे पल से जुड़ा हुआ है, अगर आपने पिछले पल को नहीं जिया तो इस पल में ख़ुशी को सोचना भी एक गुनाह है क्योंकि इस पल में ख़ुशी तभी आ सकती है जब हमने पिछले पल को आनंद से गुज़ारा हो।

मैं किसी बाबा या उन जैसा नहीं लगना चाहता इसलिए कहता हूँ की साहब बदलाव समय की पुकार है, और ये किसी समय से नहीं, सतत समय से जुड़ा हुआ है। सतत समय जो इस ब्लॉग के लेखन के दौरान भी है, इसके पूर्ण होने पर भी रहेगा, और उसके बाद भी रहेगा मगर हर पल बदलता ज़रूर रहेगा।

ज़रुरत है की हम उस बदलाव को स्वीकार करें और खुद को बेहतर बनाए क्यूँकि बदलाव और समय किसी का इंतज़ार नहीं करते, वैसे भी चलता हुआ पानी कल-कल की ध्वनि करता है जबकि रुका-ठहरा हुआ पानी बदबू मारता है।
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लेखक - अमित शुक्ला

Wednesday, 9 March 2016

बड़ी भागादौड़ी है

आज एक नई शुरुआत हुई, एक बिल्कुल नई। शायद अपने सपने को पाने की ओर एक कदम बढ़ाया, मगर चारों ओर ये शोर कैसा? ये भागम-भाग कैसी?

एक पल को लगा की ये क्या हो रहा है? हम एक पल के लिए भी क्यूँ नही रुक रहे, सोचने के लिए, चिंतन के लिए, मगर जब थोड़ा और सोचा तो लगा की आजकल तो यही चल रहा है, हर एक अपने एक भुलावे में है, जल्दी में, किसी को किसी चीज़ के लिए वक़्त नहीं है, इतना भी नहीं की अगर कोई रास्ते में चोटिल पड़ा हो तब हम उसको अस्पताल पहुँचा सकें, या अगर कोई किसी के साथ बत्तमीजी करे तो हम उसका विरोध करें, इतने व्यस्त है हम।

जब उपरोक्त घटनाएँ हमारे साथ होती है तो हम सोचते है की काश कोई हमारी मदद को आता, मगर जब हमें किसी की मदद करनी चाहिए तो हम आँख मूँद लेते है या यूं कहूँ की फेर लेते है ताकि कोई हमें ना कहें की आपने देखते हुए भी कुछ क्यूँ नहीं किया। ये कितना कमाल है ना की हमें खुद के लिए सब कुछ अच्छा चाहिए होता है,मगर हम ये जानते है की कुछ भी अच्छा तब तक नहीं हो सकता जब तक  हम अच्छा करने की कोशिश नहीं करते या किसी और के लिए नहीं करते।

अस्मिता थिएटर का एक नाटक है 'दस्तक' जो महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के बारे में हमें जागरूक करता है और ये भी समझाता है की हमें क्या करना चाहिए, उसी नाटक में एक कविता का ज़िक्र होता है जो द्धितीय विश्व युद्ध के दौरान की है, और अगर आपको ये समझ में आ गई तो शायद आप भागादौड़ी के बीच में भी जीवन से सामंजस्य बनाएँगे।  वो कविता कुछ इस प्रकार है:

'पहले वो मेरे शहर में आए लोगों को मारने लगे मैंने कुछ नही कहा ,फिर वो मेरे मोहल्ले मे आए मै चुप रहा , फिर वो मेरी गली में आएँ, मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और जब वो मेरे घर में आएँ तो मुझे बचाने वाला कोई नहीं बचा था.'