Wednesday, 13 August 2014

चुप रहना ही बेहतर है

ब्लॉग लिखते समय सोचा की आज क्यों लिखूं और क्या लिखूँ, और ऐसा हो भी क्यों ना? आखिर ब्लॉग का टाइटल भी तो यही कहता है की 'चुप रहना ही बेहतर है', मगर अंदर से एक आवाज़ आई लगा की जैसे ये बयां करूँ की चुप रहना भला क्यों बेहतर है?

सोचने लगा की भला ऐसा ब्लॉग क्यों? आखिर इस ब्लॉग का क्या लाभ? पर फिर अंदर से सवालों के बीच जवाब आया, खुद से सवाल करते हुए ये बताना भी ज़रूरी है की आखिर चुप रहना क्यों ज़रूरी है. खैर मैं कौन होता हूँ ये सलाह देने वाला की किसको, कब और क्यों चुप रहना चाहिए, मगर शायद कहीं ना कहीं आज मैंने कुछ सीखा जिसको एक ब्लॉग की शक्ल दे रहा हूँ.

हम जिस दुनिया में रहते है वहां अधकचरे ज्ञान वाले लोग ज़्यादा रहते है, जो स्वयं को महाज्ञानी समझते है, और दुःख इस बात का है की अपने इस अधकचरे ज्ञान पर सवाल किये जाते ही वो समस्याऍ करने लगते है, उनको लगता है की उनके ज्ञान पर आघात किया गया है. कितना दुखद है की उन्हें इस बात का इल्म भी नहीं होता है की वो कितनी बड़ी ग़लतफहमी के शिकार है, और उस पर सवाल किए जाते ही वो आपको ही गलत ठहराने लगते है. अलग अलग से कथन कहना शुरू करते है, कुछ ऐसे भी जो लोगों के बीच कहे भी नहीं जा सकते.

ऐसे लोग सदा ही स्वयं को ज्ञानी और जगत को अज्ञानी ही समझते है, जिनके हिसाब से आपकी कोई औकात नहीं, कोई मान नहीं, सम्मान नहीं, और कमाल है की ये सब वो डंके की चोट पर कहते है, उनको लगता है की उनके पास ऐसा कहने का अधिकार है और आप जो अपनी शीलता के कारण उनको कोई उत्तर नहीं देते, तो उसको कहीं ना कहीं कमज़ोरी समझा जाता है. मगर असलियत ये है की जब ऐसे लोग कुछ भी बोलना शुरू करें तो, चुप रहना ही बेहतर है.

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