Thursday, 14 August 2014

भारत वाकई में बदल रहा है

१९४७ वाला भारत अब नहीं दिखता, हाँ दिखे भी कैसे ये २०१४ है साहब, एंड्राइड फ़ोन वाला, फेसबुक/ट्विटर वाला भारत. वो भारत जो चमचमाती गाड़ियों में घूमता है, रात में पब में नाचता है साहब, और हाँ जहाँ मुन्नी के बदनाम होने और शीला के जवान होने पर लोग खुशियाँ लुटाते है, नाचते और गाते है. ये वो देश है साहब जहाँ देशभक्ति सिर्फ २४ घंटे की मेहमान होती है, उसके बाद वही दारु, लड़कीबाज़ी,बलात्कार,छेड़ने की बारी होती है.

क्या कहें साहब की जब शहीद भगत सिंह जी ने रस्सी को चूमा था, और अपने चर्चित लेख 'मैं नास्तिक क्यों हूँ?' में अपने इस अंतिम पल की बात कही थी:

'मैं जानता हूँ कि जिस क्षण रस्सी का फ़न्दा मेरी गर्दन पर लगेगा और मेरे पैरों के नीचे से तख़्ता हटेगा, वह पूर्ण विराम होगा – वह अन्तिम क्षण होगा। मैं या मेरी आत्मा सब वहीं समाप्त हो जायेगी। आगे कुछ न रहेगा। एक छोटी सी जूझती हुई ज़िन्दगी, जिसकी कोई ऐसी गौरवशाली परिणति नहीं है, अपने में स्वयं एक पुरस्कार होगी – यदि मुझमें इस दृष्टि से देखने का साहस हो। बिना किसी स्वार्थ के यहाँ या यहाँ के बाद पुरस्कार की इच्छा के बिना, मैंने अनासक्त भाव से अपने जीवन को स्वतन्त्रता के ध्येय पर समर्पित कर दिया है, क्योंकि मैं और कुछ कर ही नहीं सकता था।'

तो उन्हें भी उम्मीद होगी की हर एक रिश्ता और रास्ता सिर्फ देशभक्ति पर ख़त्म होता है, जैसा की माखनलाल चतुर्वेदी ने अपनी कविता 'पुष्प की अभिलाषा' में एक पुष्प के माध्यम से अपनी भावनाएँ व्यक्त करी है:


चाह नहीं मैं सुरबाला के

गहनों में गूँथा जाऊँ,
चाह नहीं, प्रेमी-माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ,
चाह नहीं, सम्राटों के शव
पर हे हरि, डाला जाऊँ,
चाह नहीं, देवों के सिर पर
चढ़ूँ भाग्य पर इठलाऊँ।
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ पर देना तुम फेंक,
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पर जावें वीर अनेक



- माखनलाल चतुर्वेदी
वहीँ देश जहाँ कभी भगत सिंह जी २३ आल की उम्र में न जाने कितना ज्ञान रखते थे, और कितने कर्मठ थे, वहीँ आज का युवा तो बस रोज़ी रोटी के ख्याल में और लड़की के तिल में फंसा पड़ा है. यहाँ पर मुझे पियूष मिश्रा जी की 'गुलाल' फिल्म में गाई गयी नज़्म 'सरफ़रोशी की तमन्ना' याद आ रही है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ु-ए-क़ातिल में है
वक़्त आने दे बता देंगे तुझे ऎ आसमाँ
हम अभी से क्या बताएँ क्या हमारे दिल में है |
ओ रे बिस्मिल काश आते आज तुम हिन्दोस्ताँ
देखते कि मुल्क़ सारा क्या टशन में, चिल में है
आज का लौंडा ये कहता हम तो बिस्मिल थक गए
अपनी आज़ादी तो भइया लौंडिया के दिल में है |
आज के जलसों में बिस्मिल एक गूँगा गा रहा
और बहरों का वो रेला नाचता महफ़िल में है
हाथ की खादी बनाने का ज़माना लद गया
आज तो चड्ढी भी सिलती इंग्लिसों की मिल में है |


सच बोलू तो इस गीत में कितनी सच्चाई से आज के अजीब हालात को बयान करने का प्रयास किया गया है, की जहाँ आज का नौजवान सिर्फ टशन और लड़कीबाजी में व्यस्त है और बस आज के जलसों में कोई जाकर खुद को पहला प्रधानमंत्री घोषित कर देता है, और जनता उसपर यकीन भी करती है.

सच में हिन्दुस्तान (घटिया रूप से) बदल रहा है

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