Sunday, 17 August 2014

ऑन स्टेज या बैक स्टेज: कोर्ट मार्शल का नशा कम नहीं होता!

वाकई में कहना पड़ेगा की कुछ नाटक, या कृतियाँ ऐसी होती है जिनका नशा कभी कम नहीं होता. कौन कहता है, की सिर्फ शराब में ही नशा होता है, गर नाटक 'कोर्ट मार्शल' जैसा हो, तो उसका नशा वक़्त के साथ इतना बढ़ जाता है, की उतारे नहीं उतरता.

कुछ दिनों पहले मुझे ये सौभाग्य प्राप्त हुआ की मैं ऑन स्टेज, इस नाटक में सलाहकार जज का किरदार कर सकूँ. ये एक बहुत बड़ा मौका था, और मैंने भी इस मौके को हाथ से जाने नहीं दिया. वैसे तो मेरी डबल एक्सेल (XXL) बॉडी, आर्मी वालों की फिट & फाइन बॉडी से कहीं भी मैच नहीं करती थी, मगर लम्बाई, मूछें और शायद कुछ अन्य खूबियों को देखकर मुझे ये मौका मिला (ऐसा मुझे लगता है).

कुछ मौकों पर इस अद्भुत नाटक का भाग बनने पर जो ख़ुशी मेरे मन के अंदर थी, उसको बयान कर पाना मुमकिन नहीं था. पहली बार ड्रेस का पंगा, दूसरी बार सब चंगा, और कुछ अन्य मौकों पर परफॉर्म करके बहुत ही ख़ुशी हो रही थी. मगर ये नाटक बैकस्टेज से कैसा लगता होगा इसका इल्म नहीं था, सो मेरे मन में एक इच्छा थी की कभी इस नाटक को अब बैकस्टेज भी देख पाऊँ, और वो भी हो गया इस १५ अगस्त को.

खैर गलती भी मेरी ही थी, क्यूंकि जब कॉल टाइम १:३० बजे का हो तो आप ४ बजे के करीब कैसे आ सकते है, मगर कुछ ऐसी घटनाएँ थी जिनके कारण ऐसा हुआ, जिन्हे मैं इस वक़्त यहाँ नहीं बयां कर सकता. खैर ४ बजे जब एक बार फिर रिहर्सल शुरू हुई तो मैंने भी अपने सह-कलाकारों के साथ स्टेज पर एंट्री ली, इस उम्मीद के साथ की मेरा स्थान रिक्त होगा और मैं अपनी जगह पर बैठ जाऊँगा, मगर वहां मेरी जगह की भरपाई की जा चुकी थी. जैसे की मेरे एक मित्र शिव कानूनगो ने कहा भी,'नेक्स्ट इन लाइन तुम हो'. वैसे किसी को उनकी बात बुरी या ताने जैसी लग सकती है, मगर मुझे बहुत ही हास्यापद लगी, और हो भी क्यों ना, आखिरकार आप २:३० घंटे लेट होने के बाद ये उम्मीद कैसे कर सकते है की वो स्थान रिक्त रहेगा.

पूरे दिन की मेहनत, कपड़ो की सफाई, और अन्य मेहनते सारी तो वेस्ट सी लगने लगी, क्यूंकि मैं समय पर नहीं था, इसलिए वो किरदार किसी और को मिल गया. एक पल के लिए बड़ा दुःख हुआ,पर अगले ही पल ये ख्याल आया की ऑन स्टेज नहीं तो क्या हुआ बैकस्टेज तो काम कितने है, वो किए जा सकते है. ये सोच ही रहा था, की ऑनलाइन टिकट बुकिंग से जुडी जानकारियाँ निकालने के काम से जुडी बात होने लगी, और मैं ही वो देखता हूँ, सो मुझे लगा की वाह क्या काम आ गया, चलिए यही करते है, मगर ये भी मेरे एक साथी को मिल गया, मगर फिर उसका ऑन स्टेज एक एनक्टमेंट था सो वो उसकी रिहर्सल में लग गया. मैंने इस काम की कमान अपने हाथों में संभाली, और डेटा अपने एक साथी के साथ मिलकर तैयार किया. फिर टिकट खिड़की पर जाकर इससे जुडी तैयारियां करने लगा, खैर धीरे धीरे इतनी ऑडियंस आ गयी की लोग ज़्यादा थे और जगह कम, मगर हमने किसी को भी जाने नहीं दिया, किसी तरह उनको अंदर भेजा, और ऐसा क्यों ना हो, आखिर वो एक छुट्टी वाले दिन, और ना जाने कहाँ कहाँ से नाटक देखने आए थे.

नाटक के दौरान मैंने बैकस्टेज से जब इस नाटक को देखा तो हर इक डायलाग में और ख़ास तौर पर उन मौकों पर जब बजरंगबली सिंह जी किसी भी अफसर से सवाल करते तो नाटक की ऊर्जा तो किसी और ही चरम पर होती थी. आलम ये था, की लोग उनकी अदाकारी को देखकर हतप्रभ थे और मैं उनकी ऊर्जा और अदाकारी दोनों. क्या गज़ब का समां बाँधा उन्होंने की लोग मंत्रमुग्ध थे, और हतप्रभ भी! उन्हें बैकस्टेज से परफॉर्म करते हुए देखना उतना ही अद्भुत था जितना की उनके साथ स्टेज शेयर करना. क्या गज़ब की दृणता थी उनके शब्दों में की कोई भी मंत्रमुग्ध हो जाए. सलाम है उनको!

वो समय जब डॉ. गुप्ता लोगो को अपनी बातों से हँसाते, तो वही सूबेदार बलवान सिंह अपनी पीड़ा बताते, और अपनी गलती पर अफ़सोस करते. रामचन्दर का वो दहाड़ मार कर रोना, कर्नल रावत का सारी चीज़ो से बेखबर होने की बात करना, या फिर मेजर पुरी का बार बार टोकना. कैप्टेन कपूर का यूँ झल्ला कर बात करना, वो गार्ड का उनपर बन्दूक तानना, सलाहकार जजो का वो हर बात को नोट करना, कर्नल सूरत सिंह का वो अधिकारपूर्ण अपनी बात को कहना, और कैप्टेन बिकाश राय का वो तर्कपूर्ण तरीके से सारी बातों को रखना और जवाब के रूप में तथ्य कोर्ट के सामने लाना. अद्भुत था ये पूरा नज़ारा-ए-समां.

सच में ऑन स्टेज या बैक स्टेज: कोर्ट मार्शल का नशा कम नहीं होता! आपको छोड़े जाता हूँ इस नाटक की कुछ अद्भुत तस्वीरों के साथ, आनंद उठाइए!



















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