Saturday, 2 August 2014

जी-वन

जनहित में जारी: मेरे इस ब्लॉग के टाइटल का किसी भी जीवित/मृत तथा किसी भी काल्पनिक किरदार से कोई लेना देना नहीं है.

आज ब्लॉग लिखने से पहले सोच रहा था की ब्लॉग किस पर लिखूँ? अपने कल के दिन पर, उसकी यात्रा पर, या फिर किसी और चीज़ पर. वैसे भी कल के दिन में बस अपने अस्मिता थिएटर के मित्र भूपेंद्र सोनी(अक्षर सोनी) का जन्मदिन मानाने के इलावा कुछ भी नहीं किया था. नौकरी? हाँ वो तो रोज़ ही चलती है, और जैसे की आज लग रहा था की काफी समय होगा तो कुछ ज्ञानवर्धन कर लूंगा, मगर आप नौकर-ई(अर्थात नौकरही) होते है तो दम मारने का भी वक़्त नहीं मिला.

भोजनावकाश के दौरान मन सोच रहा था की ब्लॉग क्या लिखूँ? फिर एकाएक ख्याल आया जीवन(जी-वन). सोच आकर अच्छा लगा मगर ये सोच रहा था की ब्लॉग किस तरह लिखूँ क्यूंकि ये तो बहुत ही बड़ा और विस्तृत शब्द है, जिसके अपने अपने अर्थ है, अपनी अपनी परिभाषाएँ, फिर भी मैंने लिखने की सोची, और ये है मेरा नजरिया:

'जीवन'

अगर शब्दों को देखा जाए तो ये कहीं न कहीं एक यात्रा की और इशारा कर रहा है, एक ऐसी यात्रा जो हमसब की है, चाहे वो इंसान हो या जानवर या पाषाण. जीवन को समझना वैसे भी बड़ा मुश्किल है और अगर आप उसको शब्दों में बांधना चाहे तो वो और भी मुश्किल है. पर जो मुझे लगता है वो है की 'जी-वन' शायद ये शब्द ही इस लिए बना क्यूंकि कहीं न कहीं ये इंसान के जीवन की यात्रा को बयान करता है, वहीँ ये मन की चंचलता को भी बयान करता है.

जी यानी आत्मा या मन, जो बहुत ही चंचल होता है और वन यानी ये दुनिया,लोग,स्थितियाँ जो की उसको इतना चलायमान बनाती है. अगर इसको एक अलग नज़र से देखे तो ये कहेंगे की जैसे जी यानी इंसान वन यानी जंगल में खो जाता है और वहां उसको भाँति-भाँति के जीव मिलते है. कोई उसको आकर्षित करता है, किसी से वो डरता है, मगर अंत में जैसे एक दिन वन कहीं न कहीं समाप्त हो जाता है, वैसे ही जीवन भी समाप्त होता है.

ऐसा कहते हुए मैं कोई बाबा नहीं दिखना चाहता, मगर मुझे ऐसा लगता है की ज़िन्दगी या जीवन एक ऐसी प्रतिस्पर्धा का नाम है जो हम खुद से लड़ते है. कमाल की बात ये है की लोग इस जीवन में दूसरे जैसे बनना चाहते है. दूसरे जैसा बनने की होड़ क्यों? आपका अपना डी.एन.ए. है जो किसी और जैसा नहीं हो सकता, इस पूरे ब्रम्हांड में नहीं, फिर दूसरे जैसा बनने की कोशिश क्यों? क्यों नहीं हम अपनी आइडेंटिटी यानि पहचान को ऐसा बनाने की कोशिश करते जो सबसे भिन्न हो? क्यों नहीं हम उसको कुछ ऐसा बनाने या बनने की कोशिश करते जो हमें औरों से भिन्न करे? अगर हम सबको एक दूसरे जैसा ही होना था तो फिर ये अलग अलग डी.एन.ए. क्यों? ज़ाहिर सी बात है की ये कोई खेल तो है नहीं? ये इसलिए है की हम खुद को पहचाने, और खुद को बेहतर बनाए, हर पल.

इस जी-वन का लक्ष्य दूसरे जैसा बनना तो कत्तई नहीं हो सकता इसलिए,इस जी-वन को बेहतर बनाना हमारा लक्ष्य होना चाहिए, और निरंतर होना चाहिए.

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