Friday, 29 August 2014

वाकई बहुत गर्म थी वो हवा!


भारत का विभाजन एक ऐसी पीड़ा है जिसका दर्द बयान करते नहीं बनता. सच पूछिये तो अपने बड़े बुज़ुर्गो से पूछते हुए भी डर लगता है, और जो हिम्मत करके बड़े बुज़ुर्गो से पूछ भी लिया तो उनकी कमज़ोर हो चुकी याददाश्त से इसको जान पाना बड़ा मुश्किल है. ये त्रासदी इतनी बड़ी है की किसी से पूछने पर भी इसका सही जवाब नहीं मिल सकता, और कितने लोग इस विभाजन के दौरान कत्लेआम का शिकार हुए, इसका तो आकड़ा भी सही सही नहीं लगाया जा सकता. देखिए ना मंटो साहब ने इसको कितनी ख़ूबसूरती से बयान किया है,

'ये मत कहो की १ लाख हिन्दू या एक मुसलमान मरे है, बल्कि ये कहो की २ लाख इंसान मरे है'


सच में, हम सब कितनी आसानी से किसी जीते जागते इंसान को कौम के नाम से बाँट देते है, और उस दौरान तो ये एक ऐसी बीमारी के रूप में फैला हुआ था की जिसे देखिये वो ही हर गैर हिन्दू, या मैं यदि कहूँ की मुसलमान को पाकिस्तान जाने की हिमायत कर रहा था.



वाकई में इस स्थिति को दर्शाने का बहुत ही सुन्दर प्रयास किया है एम.एस.सथ्यू साहब ने, वो सलीम मिर्ज़ा के किरदार में बलराज साहनी जी जैसा मंझे हुए कलाकार, तो वहीँ उनका साथ देते फारूक शेख साहब जो कहीं ना कहीं बेरोज़गारी से जूझ रहे थे, तो वही आमना के किरदार में गीता सिद्दार्थ, बहुत ही फब रहे थे. वो उस खुदा पर उम्मीद रखने वाले मिर्ज़ा साहब के सामने उनके परिवार का ख़त्म हो जाना,वहीँ बेटे का देश छोड़ कर चले जाना, मगर उनका अपने ही मुल्क में रहने की ज़िद रखना. वो कहते भी तो है,


'बेगम, दुनिया छोड़ने की उम्र में तुम देश छोड़ने की बात कह रही हो'



वो गांधीजी पर उनका विश्वास,और इस बाँट पर भी की सब कुछ ठीक हो जाएगा. हर मुश्किल से जूझते रहने की वो जद्दोजहद, कहीं ना कहीं आपको झकझोर देती है. वो बेटी का खुद को ख़त्म कर लेना, वो माँ का गुज़ा जाना, सब सहते हुए भी अपनी ज़िन्दगी जीने की ज़िद रखना, वो अपनों और लोगों की दुत्कार. वाकई बहुद गर्म थी वो हवा.

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