Tuesday, 5 August 2014

चमगादड़ से दो दो हाथ

सुबह सुबह आँख खुली तो देखा,
नाईट शिफ्ट करके मि. चमगादड़ आए है,
शिफ्ट से मायूस थे शायद, और मुझको काट खाए है,

झाड़ू लिए, उनको खिसकाएँ,
कमरे से जैसे कैसे बाहर लाए,
और अंदर एक अजीब सा दर्द उठ रहा था,

इतवार की सुबह मेरे लिए एक अजीब से घटनाक्रम के साथ शुरू हुई. सुबह सुबह मि. चमगादड़ ने मेरे कमरे में दस्तक दे दी, और वो भी कैसे? मैं नहीं जानता? या शायद मैं जानता हूँ, कारण ये हो सकता है की मेरे कमरे का दरवाज़ा खुला हुआ था और साहब शायद रौशनी से बचने के लिए कोई ऐसी जगह ढूंढ रहे थे, जहाँ पर अँधेरा हो. शायद उनकी तरंगो ने उन्हें कोई आपदा न दिखाई हो और बीच में कहीं से मैं आ गया था. वैसे भी मेरी नींद तो उनके काटने या पर लगने से हुए दर्द के कारण खुली थी. एक पल के लिए तो मैं चौक गया. दर्द मेरे बाएँ कोहनी में हो रहा था, सो मुझे ये तो समझ में आ गया की इसका कारण क्या है, और साहब मेरे सामने बेहोश से पड़े थे, हो भी क्यों ना? आखिर उनकी लालटेन जो बुझ गयी थी रौशनी में. डरते हुए मैंने कमरे से बाहर कदम रखा और झाड़ू उठाई और उन्हें बाहर निकालने का प्रयास करने लगा, पर उन्होंने तो जैसे मेरे घर में शरण लेने की सोच रखी थी, क्यूंकि वो कमरे से बाहर ही नहीं आ रहे थे. एक ओर रौशनी और दूसरी ओर उनका प्रयास कमरे में रहने का? लग रहा था जैसे वो कह रहे हो की क्या कोई ज़बरदस्ती है? जब हम नहीं जाना चाहते तो हमें क्यों निकाल रहे हो!

फिर वो एकदम गायब हो गए? मैं हैरान परेशान सा सोच रहा था की ये क्या हो रहा है? कहाँ गए मि. चमगादड़? फिर उन्होंने कमरे के दूसरे किनारे पर दर्शन दिए और मेरी वही लड़ाई चालू हो गयी. एक ज़ोरदार हाथ मार और वो दरवाज़े पर, दूसरा और वो बरामदे में थे, तीसरे में वो दीवार चढ़ने की कोशिश करने लगे और चौथे में धड़ाम! वो घर से बाहर जा चुके थे. उनके जाते ही मुझे वो गीत के बोल याद आ गए: 

'जाते जाते वो मुझे अच्छी निशानी दे गया, उम्र भर दोहराऊँगा, ऐसी कहानी दे गया'

उनके जाते ही मैंने घाव को धुला. कपडे धुले, कमरे की साफ़ सफाई की मगर दर्द लगातार बढ़ रहा था, फिर ना जाने कब नींद आ गयी, शाम करीब ७ बजे तक सोता ही रहा. आँख खुली तो दर्द बहुत हो रहा था, सो मैं डॉक्टर के पास चल दिया. पास के एक डॉक्टर ने तो अपनी ज़िन्दगी में कभी चमगादड़ से काटे जाने का कोई केस नहीं देखा था सो उन्होंने मुझे नज़दीक के सरकारी अस्पताल में भेज दिया. मैंने भी कहा चलिए, मैंने कभी सरकारी अस्पताल का मुँह नहीं देखा है, इसी बहाने उनकी खामियों को देखता हूँ, मगर मेरी सोच से विपरीत, वहां सब कुछ बहुत ही सलीके से हुआ.

उन्होंने कुछ इंजेक्शन्स के नाम लिखे और कहा की अभी लगवा लो, और एक इंजेक्शन सफदरजंग से लगवा लेना और उसके बाद पहला इंजेक्शन ३ दिन, दूसरा घटना से ७ दिन और आखिरी २८ दिन बाद लगेगा. मैंने सोचा इतने इंजेक्शन्स? ना जाने क्यों मुझे सलमान खान की दबंग पिक्चर का वो डायलाग याद आ गया,

'हम तुममे इतने इंजेक्शन्स ठोकेंगे की कंफ्यूज हो जाओगे की दर्द कहाँ और आराम कहाँ?'

खैर अगले दिन जैसे कैसे मैं ऑफिस गया मगर दर्द इतना था की इन्तहा हो गयी, सो मैंने आधे दिन की छुट्टी ली,और बाकी बचा सफदरजंग वाला टीका लगवाने चल पड़ा. वहां जाकर पता चला की ये तो शायद ५ से १० लगेंगे! सुनते ही मेरी खोपड़ी हिल गयी, समझ नहीं आया की क्या करूँ? मगर आख़िरकार इंजेक्शन तो लगवाना ही था, सो मैंने इंजेक्शन्स लगवाए, मगर अच्छी बात ये थी की सिर्फ दो इंजेक्शन्स में ही काम हो गया.

घर आया तो इतना दर्द था की मैंने आँखें बंद की और कब नींद आ गयी पता ही नहीं चला. फिर जब आँख खुली तो दर्द बहुत था ऊपर से बुखार भी, जैसे कैसे लंगड़ी टाँग में मैं केमिस्ट की दुकान पे पहुँचा और उससे क्रोसिन ली. मगर घर आने के साथ ही मुझे इतना पसीना आया की बुखार का नामोनिशान नहीं. जैसे कैसे मैंने रात काटी और अब इंतज़ार है कल लगने वाले टीके का, उसके बाद १० अगस्त, और इतने सारे इंजेक्शन्स के बारे में सोचकर ये याद आ रहा है,
'आदमी एक और इंजेक्शन्स इतने, बहुत नाइंसाफी है ये'

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