Thursday, 28 August 2014

खूब लड़ी मर्दानी वो तो फिल्मों वाली रानी थी



सुनकर आपको शायद अजीब लगे मगर वाकई में यही था की वो खूब लड़ी मर्दानी वो तो फिल्मों वाली रानी थी. अगर इस फिल्म में अभिनय के बारे में मेरे दोस्त दिव्य सोल्गामा ने अपने रिवियू में तारीफ़ ना की होती तो शायद मैं इस फिल्म को देखने की भी नहीं सोच पाटा, और समय का अभाव तो वैसे ही रहता है मेरे पास.


खैर जब फिल्म देखने की शुरुआत हुई तो कई ट्रेलर्स ने दिमाग का बैंड बजाया, फिर जब फिल्म शुरू हुई तो लोगो ने चीखकर कहा,'मर्दानी', जैसे की देखने आए लोगों को पता ही नहीं है की वो कौन सी पिक्चर देखने आए है. फिल्म शुरू हुई तो मैं रानी को देखकर खुश था, क्यूंकि शायद बंटी और बबली के बाद मैं उनकी कोई फिल्म देखने आया था.


अगर फिल्म की बात करू तो एक्शन करती लड़की का किरदार इतनी ताकत के साथ काफी वक़्त में परदे पर देखा. कुछ डायलॉग्स बहुत ही उम्दा थे, अभिनय सुन्दर था, फिर चाहे वो किसी का भी हो, और सबसे अच्छी बात ये थी की फिल्म में कोई ज़बरदस्ती का कोई गीत नहीं था. अंत का गीत बहुत ही सुन्दर था, और आंकड़े भी तस्करी की कहानी बयान करते है.




अब समस्या ये थी की प्रकाश झा की तरह इन्होने भी समस्या को ऊपर ऊपर से छुआ या यूँ कहूँ की उसकी मार्केटिंग करी तो गलत नहीं होगा. हम फिल्मों में लोगों को समस्याओं से तो अवगत कराते है, पर उपचार से नहीं. हम समस्या की विकटता तो बताते है, मगर उससे आगे कुछ नहीं. ये गलत है. यदि हिम्मत रखते हो की किसी समस्या को उजागर करने की, तो उसके निद्दन से जुडी बातचीत भी करो. सिर्फ अंत में वॉइसओवर से काम नहीं होगा. अंत में लड़ाई के समय बेवजह की डायलाग-बाजी बहुत ही नीरस लगी, लेकिन ये मैं फिर कहूँगा की बड़ा मुद्दा उठाया था.




ऐसी फिल्में और बने इसकी कामना करता हूँ

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