Friday, 8 August 2014

मुखौटे पहनते है लोग

लोग कुछ इस तरह से रहते है आजकल की उनकी हरकतें पहचानना बड़ा मुश्किल होता है, की वो जो कह रहे है वो हकीकत है या मुखौटे भरे चेहरे की आवाज़. कई मर्तबा तो कुछ ऐसे लोग भी होते है जो आपके आगे बहुत बड़ी बड़ी कहेंगे, आपका साथ देना चाहेंगे, या यूँ कहिए की कहेंगे की आप बिल्कुल सही है, और  आपको प्रोत्साहित करेंगे, आप आगे बढ़िए हम आपके साथ है, ये कहेंगे, मगर पलटते ही आपके ऊपर फब्तियां कसेंगे, आपको बैलठ (पागल) कहेंगे, जो उनको सही लगता है बस उसका समर्थन करेंगे, और आपके प्रति उलटी सीधी बातें लोगों में करेंगे, मगर आपके सामने आते ही आपके हितैषी होने का दावा फिर से. कितनी बड़ी विडंबना है?

शायद इसका कारण ये है की हमें दूसरे के बारे में बुरा भला कहने की आदत है, वो जैसा कहते है ना, की लोग अपने अंदर झांकते नहीं है, मगर दूसरों पर उंगलियाँ उठाने को हमेशा तैयार रहते है, मगर शायद ये भूल जाते है की इस दौरान ३ उंगलियाँ और एक अंगूठा उनकी ओर ही होता है, मतलब साफ़ है १ बटे ४. मियाँ,आप दूसरे पर भला क्या उंगलियाँ उठाते हैं, पहले खुद के गिरेहबान को तो झांकिए.

गौर करने वाली बात ये है की ये सोच आती कहाँ से है? ज़ाहिर है समाज से, वो समाज जहाँ पर हमेशा दूसरे के बारे में बात की जाती है, मगर उससे भी पहले अपने आस पास से, अपने परिवार से, अपने लोगों से, वो लोग जो हमेशा अपने रिश्तेदारों की बुराईयाँ करते रहते है. माँ बुआ की या किसी और रिश्तेदार की बुराई, उसकी स्थिति की विवेचना करना. पिता भी ऐसे ही, और फिर परिवार भी, पर जब बुराई करने वाले के सामने हो तो हमेशा भोले बनकर रहना. उसकी तारीफ करना, हाँ में हाँ मिलाना. उसकी तारीफ के कसीदे पढ़ना, मगर उसके पलटते ही मुखौटा बदल देना और बुराई शुरू.

स्कूल भी आजकल बच्चों को शिक्षित (Educated) नहीं, प्रशिक्षित (Qualified) बना रहा है. क्या विडंबना है की मोरल साइंस और एथिक्स भी हमें ऐसा करने से नहीं रोकते और फिर हम अपने आस पास, फिर चाहे वो घर हो या शिक्षा का मंदिर, हर जगह ऐसा ही सिखाया जा रहा है. फिर संगत, सब हमें मुखौटे लगाने और पहनने पर मजबूर करते है, जिससे शायद हमें ये लगता है की यही जीने का तरीका है.

ये कितना दुखद है की लोग जितना समय दूसरे की बुराई और चुगली करने में लगाते है, गर उसका आधा समय भी अपनी उन्नति में लगा दें तो शायद उनके जीवन की काया ही बदल जाए. मगर वो ऐसा नहीं करते और फिर ये कहते है की हमारी ज़िन्दगी कभी बेहतर या बड़ी ही नहीं हुई.

वैसे भी मुखौटे और चुगली की आदत वही लोग रखते है जो अंदर से और संस्कारों से कमजोर होते है.

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