Saturday, 9 August 2014

धर्मांध है लोग

तिलक छापे, टोपी या पग बांधते है लोग,
न जाने क्यों इतने धर्मांध है लोग,
                                                    -शुक्ल
'हिन्दू,मुस्लिम,सिख,ईसाई,आपस में सब भाई भाई', ये कितने प्रचलित शब्द है जो की हम सब सुनते है, पर हम सब अपने बचपन में ये हिदायत ज़रूर सुनते है की 'वो हिन्दू है, उनके वहाँ संभलकर जाना', 'वो मुसद्दे है, उनसे बात मत करना' 'उस पग वाले से बच के रहना,उसके तो हर वक़्त १२ बजे रहते है'.

ये कितना घृणित है की लोग अपने ही धर्मो में कितनी सारी विषमताएँ ढूंढते है, जैसे की हिन्दू कहते है,'वो नउवा है, उनसे मत मिलना','वो चमार है,उनसे बात मत करना', और लोग वैसे भी ना जाने कैसी कैसी बातें करते है. कोई अपने धर्म में शिया और सुन्नी के बीच में लड़ रहा है, कोई आपस में लड़ रहा है.

जहाँ तक मैं समझता हूँ (नास्तिक होते हुए भी) की धर्म लोगों को जोड़ने के लिए बने थे, तोड़ने के लिए नहीं. लोगों ने इतने आडम्बर, इतने ढोंग पाल रखे है की आज अपने इस अंधेपन में लोग एक दूसरे के गले काटने से बाज़ नहीं आते. आप एक पर आवाज़ उठाइये और देखिए उनके उठे हुए सर जो दूसरे को भूगत करके ही दम लेते है.

ये कितना दुखद है की आज़ादी की ६७वी सालगिरह की कगार पर बैठे देश में आज भी धर्म के नाम पर ज़हर परोसा जाता है, फिर चाहे वो निजी संस्थान हो, या कुछ अन्य दल जो बस अपनी रोटियां सेकते है. शायद हमारी धर्मान्धता इतनी बढ़ गई है की लोग हमें कैसी भी इस्तेमाल कर लेते है और हम कुछ नहीं कर सकते. शायद तभी हम अयोध्या में हादसा करवा सकते है, या फिर २००२ में दंगा, या फिर मुज़फ्फरनगर में दंगे.

उम्मीद करता हूँ की लोग इस तरह की धर्मान्धता को छोड़ कर इस गीत के माध्यम से कहे गए सन्देश को समझ पाएँगे.


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