Sunday, 30 November 2014

पैसे से पहचानते है लोग

एक दौर वो था जब,
नाम-काम से जानते,
और पहचानते थे लोग,
पर वक़्त बदल गया है,अब
पैसे से पहचानते है लोग,

हर कोई पूछता है आप कैसे है,
जब तक आपकी जेब में पैसे है,
वरना आपको नहीं जानते है लोग,
पैसे से पहचानते है लोग

गर्लफ्रेंड भी पूछती है, पैसे के बारे में,
माँ-बाप भी पूछते है आमदनी के बारे में,
मगर माँ-बाप के प्यार को नहीं समझते लोग,
पैसे से पहचानते है लोग,

आज पहचान मिलती है बैंक बैलेंस से,
कपड़ो के पहनावे से, सेल्फिज़ के स्टांस से,
गर्लफ्रेंड कितनी हॉट है, या कितनी बार किया संभोग,
पैसे से पहचानते है लोग,

नहीं जेब में पैसा तो दुनिया भी धुत्कारती है,
अपनी औलाद भी अनजान कहकर पुकारती है,
लोगों की पहचान कराता ये पैसे का रोग,
पैसे से पहचानते है लोग।
                                          -अमित शुक्ल

Friday, 28 November 2014

समय कम है

समय की अनुपलब्ध्ता के कारण बड़ा ब्लॉग नहीं लिख सकता। क्षमा।

Thursday, 27 November 2014

कोशिश करने वालों की हार नहीं होती / हरिवंशराय बच्चन

कविवर डॉ हरिवंशराय बच्चन जी को उनके जन्मदिवस पर याद करते हुए.

लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों में साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, स्वीकार करो
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो
जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम
संघर्ष का मैदान छोड़ मत भागो तुम
कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

Wednesday, 26 November 2014

भाग रहा है इंसा

भाग रहा है इंसा,
पैसा कमाने को,
सपने पाने को,
घरोंदा बनाने को,

भाग रहा है इंसा,
भीड़ में खो जाने को,
पहचान बनाने को,
बुलंदियों को पाने को,

भाग रहा है इंसा,
धर्म में खो जाने को,
धर्म पे खून बहाने को,
खुद से दूर जाने को,

भाग रहा है इंसा,
खूबसूरत दिखने के लिए,
किसी पे मिटने के लिए,
कुछ करने की चाहत लिए,

भाग रहा है इंसा,
ये सोचकर की भागना,
और जागना ही ज़िन्दगी है,
मगर क्या ये ज़िन्दगी है?

शांति पाना ही ज़िन्दगी है,
खुद को समझना भी ज़िन्दगी है,
खुशियाँ बाटना भी ज़िन्दगी है,
फिर भी भाग रहा है इंसा,

इक दिन रुक जाती ये दौड़ भी,
ज़िन्दगी की ये हसीं मोड़ भी,
पर क्या हम खुद को समझ पाते यहाँ,
फिर भी भाग रहा है इंसा,
                                                                                -अमित शुक्ल

Tuesday, 25 November 2014

उस अद्भुत लम्हे की तैयारी

जिस पल से ये पता चला की बच्चन सर गुडगाँव में आए हुए है, और अपनी फिल्म की शूटिंग में व्यस्त है, इस बात की संभावना बन रही थी की हमें सर से मिलने का सौभाग्य शायद फिर से प्राप्त हो जाए, मगर क्या ये मुमकिन होगा, इस बात की आशंका हर पल मन पर छायी हुई थीं.

सोच रहा था की जब सर मिलेंगे तो क्या करूँगा? कैसे उनसे मिलूंगा, क्या कहूँगा? किस ओर खड़ा होऊँगा? और ना जाने क्या क्या? ये होना लाज़मी भी था, क्यूंकि आप चाहे कितनी भी बार सर से मिल लो, ये डर, ये घबराहट होती है है, हालांकि सर सबसे बड़े ही प्यार से मिलते है, मगर वो जो अंग्रेजी की कहावत है ना,'Butterflies in the Stomach' वो मुझे अभी से महसूस हो रही थी, हालांकि अभी कुछ भी निर्धारित नहीं था. ये भी नहीं पता था की ऐसा कुछ हो भी पायेगा की नहीं, क्यूंकि सर हर क्षण व्यस्त रहते है, और इस उम्र में (जैसा लोग कहत है) जब लोग अमूमन आराम कर रहे होते है, वो कई गुना ज़्यादा काम करते है, और हर पल इतने एक्टिव रहते है, की उनकी ऊर्जा देखकर हम तथाकथित जवानो को भी शर्म आ जाए.

फिर वो पल आया, शायद इतवार का दिन था, मुझे मेरे एक दोस्त का फ़ोन आया, पता चला की सर के पास ये मैसेज पहुंच चूका है की उनकी प्यारी इ.ऍफ़. के हम दिल्ली के सदस्य उनसे मिलना चाहते है. ये सुनते ही की सर तक ये बात पंहुचा दी गयी है, मेरे रोंगटे खड़े हो गए और ख़ुशी के कारण चेहरे पर एक मुस्कान सी आ गयी. यकीन कर पाना मुश्किल था, की मैं ऐसा कुछ सुन रहा हूँ. इस बात की ख़ुशी हो रही थी की सर को मेरा नाम बताया जाएगा या वो स्वयं शायद मेरे नाम को पढ़कर उसको स्वीकार करेंगे, की इसको भी बुलाओ या बुलालो. मुंगेरीलाल के सपनो ने अंदर ही अंदर इतनी ख़ुशी मचा दी की मैं फूला नहीं समां रहा था.

आखिरकार मंगलवार को वो मंगल घडी आई जब इस बात की पक्की खबर मिली की 'आज शाम ५ बजे बच्चन सर के साथ अपना अपॉइंटमेंट है अपॉइंटमेंट है, हाएँ', हिंदी में बोलता है हाएँ। ख़ुशी और विस्मित रूप के भाव मेरे चेहरे पर आ गए. एक पल के लिए तो ये लगा की कोई ये बता दे की मैं सपना देख रहा हूँ, या यूँ कहूँ की मैं ये सोच रहा हूँ, और ये सपना है, और अगर है भी तो मुझे उठाये नहीं, और गर नहीं तो मैं इसको जीना चाहता हूँ, हर पल , हर क्षण को.

पहले सोचा की मैं एक गिफ्ट ले लेता हूँ, फिर समझ ही नहीं आया की क्या गिफ्ट लूँ भला मैं उनके लिए, क्यूंकि गिफ्ट्स और अवार्ड्स अब उनके सामने छोटे लगते है. फिर याद आया की कुछ किताबें है जो मैंने अब तक पढ़ी ही नहीं है, और कुछ ऐसी है जो की मैंने सर के लिए ही मंगाई थी, सो उनमें से कुछ मैंने अपने साथ कर ली, और साथ में एक पुराने एल.पी. का रिकॉर्ड, जिसमे कुछ बेहद ही पुरानी कव्वालियाँ थी, इतनी पुरानी की एक कव्वाली तो आपमें से किसी ने शायद सुनी भी नहीं होगी, वो थी फिल्म शोले की कव्वाली।

खैर इस बीच ये सोच ही रहा था की क्या पहनूँ, फिर याद आया  की मेरी फेवरेट ड्रेस तो कुरता पायजामा है, जो सर भी अमूमन पहनते है, और वो इतनी अच्छी लगती है की क्या कहें, सो मैंने भी कुरता पायजामा पहना और इस अद्भुत यात्रा के लिए तैयार हो गया.

आगे की यात्रा चित्रों के साथ, मगर एक वीडियो आपको दिखा देता हूँ की क्या और कैसे? क्रमशः

Monday, 24 November 2014

थोड़ी सफाई यहाँ भी कर दो

इससे पहले की तुम आज,
सफाई की शुरुआत कर दो,
गर मिले वक़्त जो तुमको तो,
थोड़ी सफाई यहाँ भी कर दो,

जिन कुरीतियों ने हमको जकड़े रखा,
जिस समाज ने जात-पात को पकडे रखा,
उस पुरानी धूल पर नयी सोच की सफाई कर दो,
थोड़ी सफाई यहाँ भी कर दो,

जो आज भी औरत को छेड़े,
उनको गाली दे,हाथ मरोड़े,
इस सोच को झाड़ कर नयी कर दो,
थोड़ी सफाई यहाँ भी कर दो,

जहाँ आज भी लगती हो दुल्हो की बोली,
दक्ष प्रथा पर दुल्हनो की जहाँ जली हो होली,
उस सोच पर आज तुम नयी सोच का पोछा कर दो,
थोड़ी सफाई यहाँ भी कर दो,

जहाँ आज भी इंसा-इंसा से जलता हो,
जहाँ धर्म के नाम पर उसका शोषण होता हो,
उस सोच पर एक नयी खुशबू का छिड़काव कर दो,
थोड़ी सफाई यहाँ भी कर दो,

सफाई सिर्फ गली-मोहल्ले की नहीं होना है ज़रूरी,
खुद की बुरी धारणाओं को मिटाना भी है ज़रूरी,
पहले अंदर, फिर बाहर की सफाई का एक प्रण कर दो,
थोड़ी सफाई यहाँ भी कर दो I

                                                                               -अमित शुक्ल

Sunday, 23 November 2014

तीसरा पहर/ मोहन राना

पुनः प्रसारित यहाँ से http://www.poetrytranslation.org/poems/221/After_Midnight/original
मैंने तारों को देखा बहुत दूर
जितना मैं उनसे
वे दिखे इस पल में
टिमटिमाते अतीत के पल
अँधेरे की असीमता में,
सुबह का पीछा करती रात में
यह तीसरा पहर
और मैं तय नहीं कर पाता
क्या मैं जी रहा हूँ जीवन पहली बार,
या इसे भूलकर जीते हुए दोहराए जा रहा हूँ
सांस के पहले ही पल को हमेशा !
क्या मछली भी पानी पीती होगी
या सूरज को भी लगती होगी गरमी
क्या रोशनी को भी कभी दिखता होगा अँधकार
क्या बारिश भी हमेशा भीग जाती होगी,
मेरी तरह क्या सपने भी करते होंगे सवाल नींद के बारे में
दूर दूर बहुत दूर चला आया मैं
जब मैंने देखा तारों को - देखा बहुत पास,
आज बारिश होती रही दिनभर
और शब्द धुलते रहे तुम्हारे चेहरे से
22.11.09

(अप्रकाशित)

Friday, 21 November 2014

खुशी

Re-published from Sulekha

दिल के चमनमे बहार बनके वो आई 
फुलो सी अंगडाई ले खुशी पास आई 
छुकर मेरे दिल को दिया ऐसा एह्सास 
लब्जोमे बयान ना हो सके वो दास्तान

दिल ने किया स्वागत अचरज से
रोम रोम मेहक उठा उस्की खुश्बू से
फेल गई होठोपे वोह बन के हसी 
आंसु बनके आन्खो से वोह बरसी 

आन्खोकी नमी वैसे तो गवारा नही मुझे 
पर आज वो पसन्द थी बहेज से परे 
नही आई थे वोह आंसु आज रुलाने 
दीखाई दी थी खुशी की झलक उस्मे 

चुपके से संभाले वोह खुशीके मोती 
इस खज़ाने की कीमत ना कर सके कोई 
कज्ररे कि धारने देख ली मेरी होशीयारी 
मुकस्कुरा कर दी उसने मुझे बधाई 

चादनी पूनमकी रेह्ती है एक दिन 
दिये कि रोशनी मीटती पल गिन 
मैने लिपटा खुशीके किरन को ऐसे 
लुप्त होके भी चमकेगी याद का सितारा बनके

Thursday, 20 November 2014

पथ की पहचान / हरिवंशराय बच्चन

पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले

पुस्तकों में है नहीं छापी गई इसकी कहानी,
हाल इसका ज्ञात होता है न औरों की ज़बानी,
अनगिनत राही गए इस राह से, उनका पता क्या,
पर गए कुछ लोग इस पर छोड़ पैरों की निशानी,
यह निशानी मूक होकर भी बहुत कुछ बोलती है,
खोल इसका अर्थ, पंथी, पंथ का अनुमान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

है अनिश्चित किस जगह पर सरित, गिरि, गह्वर मिलेंगे,
है अनिश्चित किस जगह पर बाग वन सुंदर मिलेंगे,
किस जगह यात्रा ख़तम हो जाएगी, यह भी अनिश्चित,
है अनिश्चित कब सुमन, कब कंटकों के शर मिलेंगे
कौन सहसा छूट जाएँगे, मिलेंगे कौन सहसा,
आ पड़े कुछ भी, रुकेगा तू न, ऐसी आन कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

कौन कहता है कि स्वप्नों को न आने दे हृदय में,
देखते सब हैं इन्हें अपनी उमर, अपने समय में,
और तू कर यत्न भी तो, मिल नहीं सकती सफलता,
ये उदय होते लिए कुछ ध्येय नयनों के निलय में,
किन्तु जग के पंथ पर यदि, स्वप्न दो तो सत्य दो सौ,
स्वप्न पर ही मुग्ध मत हो, सत्य का भी ज्ञान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

स्वप्न आता स्वर्ग का, दृग-कोरकों में दीप्ति आती,
पंख लग जाते पगों को, ललकती उन्मुक्त छाती,
रास्ते का एक काँटा, पाँव का दिल चीर देता,
रक्त की दो बूँद गिरतीं, एक दुनिया डूब जाती,
आँख में हो स्वर्ग लेकिन, पाँव पृथ्वी पर टिके हों,
कंटकों की इस अनोखी सीख का सम्मान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

यह बुरा है या कि अच्छा, व्यर्थ दिन इस पर बिताना,
अब असंभव छोड़ यह पथ दूसरे पर पग बढ़ाना,
तू इसे अच्छा समझ, यात्रा सरल इससे बनेगी,
सोच मत केवल तुझे ही यह पड़ा मन में बिठाना,
हर सफल पंथी यही विश्वास ले इस पर बढ़ा है,
तू इसी पर आज अपने चित्त का अवधान कर ले।
पूर्व चलने के बटोही, बाट की पहचान कर ले।

Wednesday, 19 November 2014

जाग तुझको दूर जाना/महादेवी वर्मा

जाग तुझको दूर जाना

चिर सजग आँखें उनींदी आज कैसा व्यस्त बाना!
जाग तुझको दूर जाना!

अचल हिमगिरि के हॄदय में आज चाहे कम्प हो ले!
या प्रलय के आँसुओं में मौन अलसित व्योम रो ले;
आज पी आलोक को ड़ोले तिमिर की घोर छाया
जाग या विद्युत शिखाओं में निठुर तूफान बोले!
पर तुझे है नाश पथ पर चिन्ह अपने छोड़ आना!
जाग तुझको दूर जाना!

बाँध लेंगे क्या तुझे यह मोम के बंधन सजीले?
पंथ की बाधा बनेंगे तितलियों के पर रंगीले?
विश्व का क्रंदन भुला देगी मधुप की मधुर गुनगुन,
क्या डुबो देंगे तुझे यह फूल दे दल ओस गीले?
तू न अपनी छाँह को अपने लिये कारा बनाना!
जाग तुझको दूर जाना!

वज्र का उर एक छोटे अश्रु कण में धो गलाया,
दे किसे जीवन-सुधा दो घँट मदिरा माँग लाया!
सो गई आँधी मलय की बात का उपधान ले क्या?
विश्व का अभिशाप क्या अब नींद बनकर पास आया?
अमरता सुत चाहता क्यों मृत्यु को उर में बसाना?
जाग तुझको दूर जाना!

कह न ठंढी साँस में अब भूल वह जलती कहानी,
आग हो उर में तभी दृग में सजेगा आज पानी;
हार भी तेरी बनेगी माननी जय की पताका,
राख क्षणिक पतंग की है अमर दीपक की निशानी!
है तुझे अंगार-शय्या पर मृदुल कलियां बिछाना!
जाग तुझको दूर जाना! 

Tuesday, 18 November 2014

क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?


क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
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पत्थर बनकर बैठ गए जो,
भगवान कहे जो जाते है,
इनमे ऐसी क्या बात है भला,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?

जिनके नाम पर होता धंधा,
अंधश्रद्धा से होता सब गन्दा,
उसने कब सुनी किसी की फरियादें,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?

जो बैठा कहीं है, या है ही नहीं,
जिसके नियम भी उसके नहीं है,
जिसके नाम पर कत्लेआम यही है,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?

जिसके नियम लिखे हुए है,
तोड़े और मरोड़े हुए है,
क्यों उसको भला मानू मैं,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?

जिसके नाम पर चढ़ता चढ़ावा,
ढोंग नाम पे जिसके रचा हुवा,
कारीगर अपने हिसाब बनाता,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?

मैं तो मानू उनको जिनका मैं अंश हूँ,
जिन्होंने लालन पालन किया और,
उनका प्यार हरपल पाता हूँ मैं,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?

जिनसे बड़ा कोई नही,
हर आशीर्वाद इनसे ही,
जब ब्रह्माण्ड में इनसे कोई बड़ा नहीं तो,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं।
                                  -अमित शुक्ल

Monday, 17 November 2014

आज लिखने के लिए कम है, क्षमा

जब आप स्वयं ब्लेंक हो गए हो तो फिर क्या लिखें? कल मिलेंगे मित्रों

Sunday, 16 November 2014

जो बीत गई सो बात गयी / हरिवंशराय बच्चन

जो बीत गई सो बात गई

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अम्बर के आनन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अम्बर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में वह था एक कुसुम
थे उसपर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुवन की छाती को देखो
सूखी कितनी इसकी कलियाँ
मुर्झाई कितनी वल्लरियाँ
जो मुर्झाई फिर कहाँ खिली
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुवन शोर मचाता है
जो बीत गई सो बात गई

जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया
मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठतें हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई

मृदु मिटटी के हैं बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन लेकर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फिर भी मदिरालय के अन्दर 
मधु के घट हैं मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई

Saturday, 15 November 2014

रोटी और स्वाधीनता / रामधारी सिंह "दिनकर"

(1)
आजादी तो मिल गई, मगर, यह गौरव कहाँ जुगाएगा ?
मरभुखे ! इसे घबराहट में तू बेच न तो खा जाएगा ?
आजादी रोटी नहीं, मगर, दोनों में कोई वैर नहीं,
पर कहीं भूख बेताब हुई तो आजादी की खैर नहीं।
(2) 
हो रहे खड़े आजादी को हर ओर दगा देनेवाले, 
पशुओं को रोटी दिखा उन्हें फिर साथ लगा लेनेवाले।
इनके जादू का जोर भला कब तक बुभुक्षु सह सकता है ?
है कौन, पेट की ज्वाला में पड़कर मनुष्य रह सकता है ?
(3) 
झेलेगा यह बलिदान ? भूख की घनी चोट सह पाएगा ?
आ पड़ी विपद तो क्या प्रताप-सा घास चबा रह पाएगा ?
है बड़ी बात आजादी का पाना ही नहीं, जुगाना भी, 
बलि एक बार ही नहीं, उसे पड़ता फिर-फिर दुहराना भी।

Friday, 14 November 2014

गर्म हवा से चंद अलफ़ाज़

तक्सीन हुआ मुल्क तो दिल हो गए टुकड़े; हर सीने में तूफ़ान, वहां भी था यहाँ भी
हर घर में चिता जलती थी,लहराते थे शोले; हर शहर में श्मशान, वहां भी था यहाँ भी
गीता की कोई न सुनता, ना कोई क़ुरान की सुनता; हैरान सा ईमान, वहां भी था यहाँ भी.
- कैफ़ी आज़मी

Thursday, 13 November 2014

लैंगिकता पर जनविचार

मैं जानता हूँ आपमें से कुछ लोग ब्लॉग का टाइटल पढ़कर ये सोच रहे होंगे की ये क्या है, मगर यकीन मानिए, ये एक ऐसी समस्या है जिसके बारे में दबी ज़बान से सब बात करते है, पर खुल के कोई बोलने को तैयार नहीं।

LGBT: Lesbian Gay Bisexual Transgender


ये हमारे समाज का ही हिस्सा है मगर इनके साथ हो रहा बर्ताव कैसा है? सोचिए? क्या आपने कभी इनसे सही से बात की, या इन्हें 'ढीला' या कुछ अन्य शब्दों से ही संबोधित नहीं किया है? आप इंकार नहीं कर सकते, क्यूंकि हम जिस समाज में पैदा हुए है उसमे इनमे से किसी भी किस्म के इंसान को अच्छा नहीं समझा जाता. क्यों? अगर ये सवाल पूछे तो लोग ये कहेंगे की ये फलां-फलां है, मगर क्या उन्होंने कभी जीव विज्ञान पढ़ा है? जीव विज्ञान में एक चीज़ होती है हॉर्मोन्स, वो हॉर्मोन्स, जो ये निर्धारित करते है की हम लड़को से जीन्स पाएंगे या लड़के होकर भी लड़कियों जैसे. जब ये हार्मोनल बदलाव होते है तो ज़रूरी है की आप इस बात का ख्याल करें की यदि इनके कारण वो इंसान किसी अलग प्रवर्ति को समझने लगा है, इसका अर्थ ये नहीं की वो एक इंसान नहीं है. उसको भी आपके ही जैसे किसी माँ ने अपने गर्भ में धारण किया था, जन्म दिया, मगर किन्ही हार्मोनल बदलावों के कारण उसके बोलचाल, हाव-भाव में यदि कोई परिवर्तन हो गया तो उसको नज़रअंदाज़ न करें, बल्कि उसको स्वीकार करें, क्यूंकि उसको भी जीने का हक़ है.

भारत सरकार ने धारा ३७७ को मना कर दिया, वो धारा जिसका निर्माण १८६० में हुआ था. वो समय जब आप और मैं पैदा भी नहीं हुए थे, जो उस समय के हिसाब से सही थी, मगर जैसा की कहते है की नियम और कानून हमेशा समय के साथ बदलने चाहिए ताकि वो अपने समय के साथ कदम से कदम मिला सके. देखिये ना इसी आधार पर तमिल नाडु सरकार ने एक 'ट्रांसजेंडर्स राइट्स' नाम से एक सुविधा आरम्भ की है जो की इस तरह के लोगों की समस्याएँ हल कर सके. 

भारत के कानून ने भी इन्हे एक तीसरे लिंग के रूप में स्वीकार किया था सन ११९४ और उन्हें भी चुनाव में मत डालने का अधिकार दे दिया था. १५ अप्रैल २०१४ को भारत के कानून ने उन्हें एक पिछड़ी जाति मानते हुए, उन्हें कई सुविधाएँ प्रदान की, मगर क्या उन्हें वो सुविधाएं मिलती भी है? भारत की सबसे उच्च परीक्षा प्रणाली यु.पी.एस.सी. में भी उनके लिए कोई सुविधाएँ नहीं है. 

ये कैसा अधिकार है? क्या सिर्फ कागज़ों में उन्हें सम्मान और स्थान दे देने से वो सच हो जाता है? क्या एक कागज़ पर लिख देने से लोगों की मानसिकता बदली जा सकती है? शायद इसके लिए हमें लोगों की सोच को बेहतर करने की ज़रुरत है. सच में मेरे एक मित्र का ये स्टेटस मुझे याद आता है, जो इस स्थिति पर बिलकुल फिट बैठता है:

'ये लीजिये आपकी सोच, मुझे वह गिरी हुई मिली'

उम्मीद है की आप पाठक ये समझेंगे की वो भी हमारी तरह हाड मांस से बने हुए लोग है और उन्हें भी जीने का अधिकार है. ये कानून सिर्फ इसलिए बनाये गए, ताकि लोग इस प्रकार की मूर्खताएं ना करे, मगर इसके लिए ज़रूरी है की हम अपनी गिरी हुई मानसिकता को सुधारे

यदि आपकी कोई राय है तो कृप्या अवश्य दे.

Wednesday, 12 November 2014

उस जगह कानून काला चल रहा है / बल्ली सिंह चीमा

उस जगह क़ानून काला चल रहा है ।
तू उधर न जा ख़ुदा का वास्ता है ।

गोलियाँ ही फ़ऐसले करने लगीं,
शहर से इन्सानियत ही लापता है ।

उसके बारे में फ़क़त ये जानता हूँ,
दूर से वो शख़्स लगता देवता है ।

क्या बताएगा तुझे मंज़िलें तेरी,
कोई रहबर तो नहीं ये रास्ता है ।

जी रहा ’बल्ली’ कि जीना है मगर,
ज़िन्दगी में से बहुत-कुछ लापता है ।

Tuesday, 11 November 2014

जीने की इच्छा मर पड़ी है

गिन्नी भाई को समर्पित:

बीते दिनों के झरोखों से यादों की,
कपोल जैसे कही फूट पड़ी है,
जहाँ भी है तू बुला ले ए दोस्त,
जीने की इच्छा मर पड़ी है,
यादों की लहरों में दिल कही खो गया,
इक दिन तू हमसे कहीं दूर हो गया,
आज भी मेरी ज़िन्दगी में तेरी कमी बड़ी है,
जहाँ भी है तू बुला ले ए दोस्त,
जीने की इच्छा मर पड़ी है,
सोचता हूँ तेरे घर वालों से बात करूँ,
मगर क्या भूलूँ क्या याद करूँ,
बोलने की ताकत जैसे जड़ पड़ी है,
जहाँ भी है तू बुला ले ए दोस्त,
जीने की इच्छा मर पड़ी है,
तुझसे जुडी पीड़ा किसको दिखाऊँ,
दुनिया में हँसकर बस वो दर्द छुपाऊ,
तेरे अंतिम दर्शन की याद साथ चल रही है,
जहाँ भी है तू बुला ले ए दोस्त,
जीने की इच्छा मर पड़ी है,
तुझ संग बैठेंगे, खूब गल्ला करेंगे,
कुछ तुझसे कहेंगे,कुछ तेरी सुनेंगे,
सुनने को कान, देखने को आँखें तरस गई है,
जहाँ भी है तू बुला ले ए दोस्त,
जीने की इच्छा मर पड़ी है,
सोचता हूँ तुझसे आकर अभी मिल लूँ,
पर आत्महत्या गुनाह है, बात ये हमने पढ़ी है,
जहाँ भी है तू बुला ले ए दोस्त,
जीने की इच्छा मर पड़ी है।
                                   -अमित शुक्ल

Monday, 10 November 2014

गाँधी / हरिवंशराय बच्‍चन

अद्भुत कविता. ज़रूर पढ़े:

एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्‍म गाँधी को दिया था,

जिस समय हिंसा,
कुटिल विज्ञान बल से हो समंवित,
धर्म, संस्‍कृति, सभ्‍यता पर डाल पर्दा,
विश्‍व के संहार का षड्यंत्र रचने में लगी थी,
तुम कहाँ थे? और तुमने क्‍या किया था!

एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्‍म गाँधी को दिया था,
जिस समय अन्‍याय ने पशु-बल सुरा पी-
उग्र, उद्धत, दंभ-उन्‍मद-
एक निर्बल, निरपराध, निरीह को
था कुचल डाला
तुम कहाँ थे? और तुमने क्‍या किया था?

एक दिन इतिहास पूछेगा
कि तुमने जन्‍म गाँधी को दिया था,
जिस समय अधिकार, शोषण, स्‍वार्थ
हो निर्लज्‍ज, हो नि:शंक, हो निर्द्वन्‍द्व
सद्य: जगे, संभले राष्‍ट्र में घुन-से लगे
जर्जर उसे करते रहे थे,
तुम कहाँ थे? और तुमने क्‍या किया था?

क्‍यों कि गाँधी व्‍यर्थ
यदि मिलती न हिंसा को चुनौ‍ती,
क्‍यों कि गाँधी व्‍यर्थ
यदि अन्‍याय की ही जीत होती,
क्‍यों कि गाँधी व्‍यर्थ
जाति स्‍वतंत्र होकर
यदि न अपने पाप धोती!

Sunday, 9 November 2014

तीन रूबाइयाँ / हरिवंशराय बच्‍चन

मैं एक जगत को भूला,
मैं भूला एक ज़माना,
कितने घटना-चक्रों में
भूला मैं आना-जाना,
पर सुख-दुख की वह सीमा
मैं भूल न पाया, सा‍की,
जीवन के बाहर जाकर
जीवन मैं तेरा आना।

तेरे पथ में हैं काँटें
था पहले ही से जाना,
आसान मुझे था, साक़ी,
फूलों की दुनिया पाना,
मृदु परस जगत का मुझको
आनंद न उतना देता,
जितना तेरे काँटों से
पग-पग परपद बिंधवाना।

सुख तो थोड़े से पाते,
दुख सबके ऊपर आता,
सुख से वंचित बहुतेरे,
बच कौन दुखों से पाता;
हर कलिका की किस्‍मत में
जग-जाहिर, व्‍यर्थ बताना,
खिलना न लिखा हो लेकिन
है लिखा हुआ मुरझाना!

Saturday, 8 November 2014

अग्निपथ/हरिवंश राय बच्चन

प्रेरणादायक

वृक्ष हों भले खड़े
हों घने, हों बड़े
एक पत्र छाँह भी
मांग मत! मांग मत! मांग मत!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

तू न थकेगा कभी
तू न थमेगा कभी
तू न मुड़ेगा कभी
कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

यह महान दृश्य है
चल रहा मनुष्य है
अश्रु-स्वेद-रक्त से
लथ-पथ! लथ-पथ! लथ-पथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

Friday, 7 November 2014

बेकारी के कुछ दिन

जी हाँ, बेकारी, या यूँ कहूँ की बेरोज़गारी का आलम भी बड़ा अजब होता है। इसका आनंद भी कुछ अलग होता है। ना सुबह जल्दी उठने की चिंता, न ऑफिस पहुचने की, न पंच की, न अकाउंट की, न बॉस की झिकझिक, न क्लाइंट की चिकचिक, बल्कि शांति की टिक टिक। भई वाह, एक लंबे अंतराल के बाद इसका आनंद भी अनूठा है। ना जाने क्यों बच्चन साहब की ज़मीर फ़िल्म का वो गीत याद आ गया,

'बड़े दिनों में ख़ुशी का दिन आया, आज कोई न पूछो मुझसे मैंने क्या पाया'

जबतक अगला कदम निर्धारित नहीं होता, इस दौर का लुत्फ़ उठाया जाए, और खुश रहा जाए।

Thursday, 6 November 2014

किसको अपनी व्यथा सुनाए?

किसको अपनी व्यथा सुनाए,
जिसको देखो वही बस अपनी,
हर पल दुखों की पीपरी बजाए,
किसको अपनी व्यथा सुनाए,

हर पल खुद को ढूंढते रहे,
कल तक बस सोचते रहे,
किस ओर अपने कदम बढाए,
किसको अपनी व्यथा सुनाए,

सपनो को आधी उड़ान दी,
फिर जिम्मेदारियों से तोड़ दी,
अंत में रहे भूले-भरमाए,
किसको अपनी व्यथा सुनाए,

अंत में ज़रूरी ये है की,
हम खुद को बेहतर बनाए,
ना की ये सोचे की हरपल,
किसको अपनी व्यथा सुनाए।
-शुक्ल