Tuesday, 17 November 2015

क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?

ये मेरी लिखी हुई कविता है.
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पत्थर बनकर बैठ गए जो,
भगवान कहे जो जाते है,
इनमे ऐसी क्या बात है भला,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
जिनके नाम पर होता धंधा,
अंधश्रद्धा से होता सब गन्दा,
उसने कब सुनी मेरी फरियादें,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
जो बैठा कहीं है, या है ही नहीं,
जिसके नियम भी उसके नहीं है,
जिसके नाम पर कत्लेआम यही है,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
जिसके नियम लिखे हुए है,
तोड़े और मरोड़े हुए है,
क्यों उसको भला मानू मैं,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
जिसके नाम पर चढ़ता चढ़ावा,
ढोंग नाम पे जिसके रचा हुवा,
कारीगर अपने हिसाब बनाता,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
मैं तो मानू उनको जिनका मैं अंश हूँ,
जिन्होंने लालन पालन किया और,
उनका प्यार हरपल पाता हूँ मैं,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
जिनसे बड़ा कोई नही,
हर आशीर्वाद इनसे ही,
जब ब्रह्माण्ड में इनसे कोई बड़ा नहीं तो,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं।

-अमित शुक्ल

Monday, 12 October 2015

लाओत्ज़ु का गधा

mastering strength quote

लाओत्ज़ु अपने गधे पर सवार होकर एक शहर से दूसरे शहर जा रहा था. उसे रास्ते में राजा का दूत मिला. दूत ने लाओत्ज़ु से कहा -“राजा ने आपके बारे में बहुत कुछ सुना है और वे आपको अपने दरबारियों में सम्मिलित करना चाहते हैं. उन्हें बुद्धिमान जनों की ज़रुरत है.”
लाओत्ज़ु ने दूत से बहुत सम्मानपूर्ण व्यवहार किया और कहा – “क्षमा करें, पर यह संभव नहीं है. राजा को धन्यवाद दें और कहें कि मैं इस अनुरोध को स्वीकार नहीं कर सकता.”
जब दूत वापस जाने लगा तब लाओत्ज़ु ने अपने कान और अपने गधे के कानों को धोया. यह देखकर पास खड़े एक व्यक्ति ने पूछा – “आप ये क्या कर रहे हैं?”
लाओत्ज़ु ने कहा – “मैं अपने कान धो रहा हूँ क्योंकि राजनीतिक गलियारों से होकर आनेवाले सन्देश अपवित्र और खतरनाक होते हैं.”
आदमी ने पूछा – “लेकिन आपने अपने गधे के कान क्यों धोये?”
लाओत्ज़ुने कहा – “गधों में बड़ी राजनीतिक समझ होती है. वह पहले ही कुछ अजीब तरह से चल रहा था. जब उसने राजा के दूत का सन्देश सुना तो उसे स्वयं पर बड़ा अभिमान हो गया. उसने भी बड़े सपने संजो लिए. राजदरबार की भाषा की इतनी समझ तो मुझमें भी नहीं है जितनी इस गधे में है. ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि दरबार में भी इसके जैसे गधे ही भरे हुए हैं. इन सबकी भाषा एक समान है.”
यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत हंसा. कहते हैं कि यह बात राजा तक भी पहुंची और इसे सुनकर राजा भी बहुत हंसा.
ऐसा था लाओत्ज़ु. उसकी बातें सुनकर सभी हंसते थे. वह अपने समय का सबसे ज्ञानी, सबसे विलक्षण, और बचकाना आदमी था. किसी ने भी उसे गंभीरता से नहीं लिया. उसने लोगों को कभी भी इतना प्रभावित नहीं किया कि वे उसकी शिक्षाओं को सहेजने के बारे में गंभीरता से सोचते. उसने अपने पीछे कोई धर्म या शास्त्र या संघ नहीं छोड़ा. वह सदैव अकेला ही रहा और सबसे शुद्ध बना रह सका.

Sunday, 11 October 2015

अमित के जन्म-दिन पर / हरिवंशराय बच्चन

अमित को बारंबार बधाई!
आज तुम्हारे जन्म-दिवस की,
मधुर घड़ी फिर आई।
अमित को बारंबार बधाई!

उषा नवल किरणों का तुमको
दे उपहार सलोना,
दिन का नया उजाला भर दे
घर का कोना-कोना,
रात निछावर करे पलक पर
सौ सपने सुखदायी।
अमित को बारंबार बधाई!

जीवन के इस नये बरस में
नित आनंद मनाओ,
सुखी रहो तन-मन से अपनी
कीर्ति-कला फैलाओ,
तुम्हें सहज ही में मिल जाएं
सब चीजें मन-भायी।
अमित को बारंबार बधाई!

Saturday, 10 October 2015

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ / हरिवंशराय बच्चन

सोचा करता बैठ अकेले,
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

Friday, 9 October 2015

20 ज़रूरी बातों की लिस्ट

हिंदीज़ेन 

इंटरनेट पर यह इमेज लिस्ट मिली तो इसे आप लोगों से शेयर करने के बारे में सोचा. इस लिस्ट में हमारे शरीर और मन को स्वस्थ व संपन्न रखने के लिए जिन उपायों के बारे में बताया गया है वे बहुत सामान्य हैं और हमारी पुरानी पीढ़ियों के लोग इन्हें बहुत महत्व देते थे. भागदौड़ भरी व तनावयुक्त आधुनिक जीवनशैली के कारण हम कई अच्छी आदतों को अपना नहीं पाते. ये लिस्ट उन्हीं अच्छी आदतों या बातों का रिमांइडर हैः-
1. दिन भर में कई बार पानी पीजिए. पर्याप्त मात्रा में पानी पीना आपको अनेक रोगों से दूर रख सकता है. दूध वाली उबली चाय एसिडिटी बढ़ाती है. इसके स्थान पर नैचुरल जायके वाली ग्रीन-टी पीजिए.
2. दिन की शुरुआत पौष्टिक नाश्ते से करें. दोपहर का भोजन औसत लें और रात को भरपेट खाने से बचें.
3. अपने भोजन में अनाज और डिब्बाबंद फूड के स्थान पर फलों, सब्जियों और प्राकृतिक आहार को वरीयता दें.
4. सुबह से शाम तक एक ही जगह पर टिककर बैठे न रहें. सुबह या शाम कुछ दूरी तक पैदल चलें और हो सके तो सप्ताह में एक बार तैरने या साइकिल चलाने की आदत डालें.
5. हर समय इंटरनेट, टीवी या मोबाइल से ही चिपके न रहें. अपने पसंदीदा विषयों की किताबों को पढ़ना जारी रखें. अपने बच्चों को किताबों से ज्ञान अर्जित करने के लाभ बताएं.
6. सुखद नींद आपके मनोरंजन से ज्यादा ज़रूरी है. कितना भी काम का दबाव या सीरियल/फिल्म देखने की चाह हो लेकिन अपनी ज़रूरत के हिसाब से 6 से 8 घंटे की नींद ज़रूर लें. रात को दस बजे तक सोने और सुबह सात बजे तक उठ जाने से शरीर व मष्तिष्क को भरपूर आराम मिलता है और आप तरोताज़ा बने रहते हैं.
7. अपने या किसी और के बारे में निगेटिव विचार अपने मन में न लाएं. हर व्यक्ति में कुछ अच्छे की खोज करें और उससे सीखें. उदार और हंसमुख बनें.
8. बीती ताहि बिसार दें. अतीत में घट चुकी बातों और बुरे अनुभवों को अपने ऊपर हावी न होने दें. अपने मन में किसी भी व्यक्ति या घटना से उपजी कड़वाहट को घर न करने दें.
9. छोटी-छोटी खुशियों के पलों की अनदेखी न करें. ज़िंदगी इन्हीं लम्हों से मिलकर बनती है. तुनकमिजाजी भरा व्यवहार आपके प्रियजनों को आपसे दूर करता जाएगा.
10. खुद को किसी से कमतर न आंकें. अपनी या किसी दूसरे व्यक्ति की तुलना किसी और से न करें. प्रयास करें कि किस तरह आप अपनी व अन्य व्यक्तियों की खुशियों व क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं.
11. नियमित योग व ध्यान साधना आपको स्थिर व स्वस्थ रख सकती है. तनाव तथा असंयमित जीवनशैली के कारण उपजी समस्याओं के उपचार के लिए इनके लिए समय निकालिए.
12. टालमटोल करने की आदत से बचिए. यदि किसी छोटे काम को आप सिर्फ दो मिनटों में ही कर सकते हों तो उसे फौरन कर डालिए.
13. प्रोसेस्ड या प्रेज़रवेटिव वाले भोजन और बाहर का खाना खाने की बजाए प्राकृतिक व ऑर्गेनिक आहार को तरजीह दें. अधिक गर्म/ठंडा, अधिक मीठा/नमकीन व अधिक तेल/मसाले वाले भोजन से होनेवाले नुकसान सर्वविदित हैं.
14. अपनी पीठ व गर्दन को एक ही मुद्रा में बैठे रहने के कारण होनेवाली अकड़न से बचाने के लिए कुछ-कुछ अंतराल पर उठकर अपने हाथ-पैर आदि को स्ट्रेच करने की आदत डालिए. इससे आपको कंप्यूटर के कारण होनेवाले कलाई के दर्द व आंखों की जलन में भी आराम मिलेगा.
15. शांत संगीत सुनें. पक्षियों के कलरव को सुननने के लिए शहर के कोलाहल से दूर जाएं. गाएं. गुनगुनाएं.
16. अपने परिवेश को साफ-सुथरा रखें. अपनी डेस्क और टेबल आदि से गैरज़रूरी चीजों व क्लटर को हटा दें.
17. ऐसे वस्त्रादि पहनें जिन्हें पहनने से आपको खुशी मिलती हो. फैशन या दूसरी की ख्वाहिश पूरी करने के लिए अपनी इच्छाओं को दरकिनार न करें.
18. जिन चीजों की आपको ज़रुरत न हो उन्हें या तो बेच दें या किसी और को दें. चीजों को Repair, Reuse या Recycle करने की नीति का पालन करें.
19. हमेशा आशान्वित रहें कि आप जो कुछ भी कर रहे हैं वह सबके हित में होगा. लक्ष्य बनाएं और उसकी प्राप्ति की दिशा में भरसक प्रयास करें. असफलताओं से हताश व निराश न हों.
20. असल ज़िंदगी हमारे घर और comfort zone के बाहर है. पुराने दोस्तों की खोजखबर लें. दुनिया देखें. नए लोगों से मिलें, कुछ नया करें. नई रुचियां विकसित करें… आप जो जानते हों वह दूसरों को सिखाएं.

Thursday, 8 October 2015

अस्वस्थ हूँ

आज तबियत नासाज़ है। आज आराम कर लेता हूँ, ताकि कल आपसे कुशलता से बात कर सकूं।

Wednesday, 7 October 2015

कोई विरला विष खाता है/ पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

कोई विरला विष खाता है!
मधु पीने वाले बहुतेरे,
और सुधा के भक्त घनेरे,
गज भर की छातीवाला ही विष को अपनाता है!
कोई विरला विष खाता है!
पी लेना तो है ही दुष्कर,
पा जाना उसका दुष्करतर,
बडा भाग्य होता है तब विष जीवन में आता है!
कोई विरला विष खाता है!
स्वर्ग सुधा का है अधिकारी,
कितनी उसकी कीमत भारी!
किंतु कभी विष-मूल्य अमृत से ज्यादा पड़ जाता है!
  1. कोई विरला विष खाता है!

Tuesday, 6 October 2015

Monday, 5 October 2015

दक्षिणा के मोती

हिंदीज़ेन से साभार।


नदी के तट पर गुरुदेव ध्यानसाधना में लीन थे. उनका एक शिष्य उनके पास आया. उसने गुरु के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना के वशीभूत होकर दक्षिणा के रूप में उनके चरणों के पास दो बहुत बड़े-बड़े मोती रख दिए.
गुरु ने अपने नेत्र खोले. उन्होंने एक मोती उठाया, लेकिन वह मोती उनके उनकी उँगलियों से छूटकर नदी में गिर गया.
यह देखते ही शिष्य ने नदी में छलांग लगा दी. सुबह से शाम तक नदी में दसियों गोते लगा देने के बाद भी उसे वह मोती नहीं मिला. अंत में निराश होकर उसने गुरु को उनके ध्यान से जगाकर पूछा – “आपने तो देखा था कि मोती कहाँ गिरा था! आप मुझे वह जगह बता दें तो मैं उसे ढूंढकर वापस लाकर आपको दे दूँगा!”
गुरु ने दूसरा मोती उठाया और उसे नदी में फेंकते हुए बोले – “वहां!”
(~_~)

Sunday, 4 October 2015

प्राचीन प्रथा

हिंदीज़ेन से साभार।

oranges.jpg

मरू-प्रदेश की भूमि में बहुत कम फल उपजते थे. अतः ईश्वर ने अपने पैगंबर को पृथ्वी पर यह नियम पहुंचाने के लिए कहा, “प्रत्येक व्यक्ति दिन में केवल एक ही फल खाए”.
लोगों में मसीहा की बात मानी और दिन में केवल एक ही फल खाना प्रारंभ कर दिया. यह प्रथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रही. दिन में एक ही फल खाने के कारण इलाके में फलों की कमी नहीं पड़ी. जो फल खाने से बच रहते थे उनके बीजों से और भी कई वृक्ष पनपे. जल्द ही प्रदेश की भूमि उर्वर हो गयी और अन्य प्रदेशों के लोग वहां बसने की चाह करने लगे.
लेकिन लोग दिन में एक ही फल खाने की प्रथा पर कायम रहे क्योंकि उनके पूर्वजों के अनुसार मसीहा ने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा था. दूसरे प्रदेश से वहां आनेवाले लोगों को भी उन्होंने फलों की बहुतायत का लाभ नहीं उठाने दिया.
इसका परिणाम यह हुआ कि अधिशेष फल धरती पर गिरकर सड़ने लगे. उनका घोर तिरस्कार हो रहा था.
ईश्वर को यह देखकर दुःख पहुंचा. उसने पुनः पैगंबर को बुलाकर कहा, “उन्हें जाकर कहो कि वे जितने चाहें उतने फल खा सकते हैं. उन्हें फल अपने पड़ोसियों और अन्य शहरों के लोगों से बांटने के लिए कहो”.
मसीहा ने प्रदेश के लोगों को ईश्वर का नया नियम बताया. लेकिन नगरवासियों ने उसकी एक न सुनी और उसपर पत्थर फेंके. ईश्वर का बताया पुराना नियम शताब्दियों से उनके मन और ह्रदय दोनों पर ही उत्कीर्ण हो चुका था.
समय गुज़रता गया. धीरे-धीरे नगर के युवक इस पुरानी बर्बर और बेतुकी प्रथा पर प्रश्नचिह्न लगाने लगे. जब उन्होंने देखा कि उनके बड़े-बुजुर्ग टस-से-मस होने के लिए तैयार नहीं हैं तो उन्होंने धर्म का ही तिरस्कार कर दिया. अब वे मनचाही मात्रा में फल खा सकते थे और उन्हें भी खाने को दे सकते थे जो उनसे वंचित थे.
केवल स्थानीय देवालयों में ही कुछ ऐसे लोग बच गए थे जो स्वयं को ईश्वर के अधिक समीप मानते थे और पुरानी प्रथाओं का त्याग नहीं करना चाहते थे. सच तो यह है कि वे यह देख ही नहीं पा रहे थे कि दुनिया कितनी बदल गयी थी और परिवर्तन सबके लिए अनिवार्य हो गया था.
(पाउलो कोएलो के ब्लॉग से)

Saturday, 3 October 2015

भविष्यवेत्ता

हिंदीज़ेन से साभार।

एक बहुत पूरानी यूनानी कहानी सुनाता हूँ।

(तस्वीर लेख से नहीं लिया गया है)

आपको. उन दिनों कहीं एक बहुत प्रसिद्ध भविष्यवेत्ता रहता था. एक दिन वह राह चलते कुएं में गिर गया. हुआ यूं कि वह रात के दौरान तारों का अवलोकन करते हुए चला जा रहा था. उसे पता न था कि राह में कहीं एक कुंआ है, उसी कुंए में वो गिर गया.
उसके गिरने और चिल्लाने की आवाज़ सुनकर पास ही एक झोपड़ी में रहनेवाली बुढ़िया उसकी मदद को वहां पहुंच गई और उसे कुंए से निकाला.
जान बची पाकर भविष्यवेत्ता बहुत खुश हुआ. वह बोला, “तुम नहीं आतीं तो मैं मारा जाता! तुम्हें पता है मैं कौन हूं? मैं राज-ज्योतिषी हूं. हर कोई आदमी मेरी फीस नहीं दे सकता – यहां तक कि राजाओं को भी मेरा परामर्श लेने के लिए महीनों तक इंतज़ार करना पड़ता है – लेकिन मैं तुमसे कोई पैसा नहीं लूंगा. तुम कल मेरे घर आओ, मैं मुफ्त में तुम्हारा भविष्य बताऊंगा”.
यह सुनकर बुढ़िया बहुत हंसी और बोली, “यह सब रहने दो! तुम्हें अपने दो कदम आगे का तो कुछ दिखता नहीं है, मेरा भविष्य तुम क्या बताओगे?”
(~_~)

Wednesday, 30 September 2015

रीढ़ की हड्डी / पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

मैं हूँ उनके साथ,खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार
कभी नही जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार
एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
निर्भय होकर घोषित करते, जो अपने उदगार विचार
जिनकी जिह्वा पर होता है, उनके अंतर का अंगार
नहीं जिन्हें, चुप कर सकती है, आतताइयों की शमशीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
नहीं झुका करते जो दुनिया से करने को समझौता
ऊँचे से ऊँचे सपनो को देते रहते जो न्यौता
दूर देखती जिनकी पैनी आँख, भविष्यत का तम चीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
जो अपने कन्धों से पर्वत से बढ़ टक्कर लेते हैं
पथ की बाधाओं को जिनके पाँव चुनौती देते हैं
जिनको बाँध नही सकती है लोहे की बेड़ी जंजीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
जो चलते हैं अपने छप्पर के ऊपर लूका धर कर
हर जीत का सौदा करते जो प्राणों की बाजी पर
कूद उदधि में नही पलट कर जो फिर ताका करते तीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
जिनको यह अवकाश नही है, देखें कब तारे अनुकूल
जिनको यह परवाह नहीं है कब तक भद्रा, कब दिक्शूल
जिनके हाथों की चाबुक से चलती हें उनकी तकदीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
तुम हो कौन, कहो जो मुझसे सही ग़लत पथ लो तो जान
सोच सोच कर, पूछ पूछ कर बोलो, कब चलता तूफ़ान
सत्पथ वह है, जिसपर अपनी छाती ताने जाते वीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

Tuesday, 29 September 2015

पागलपन

हिंदीज़ेन

एक ताकतवर जादूगर ने किसी शहर को तबाह कर देने की नीयत से वहां के कुँए में कोई जादुई रसायन डाल दिया. जिसने भी उस कुँए का पानी पिया वह पागल हो गया.
सारा शहर उसी कुँए से पानी लेता था. अगली सुबह उस कुँए का पानी पीनेवाले सारे लोग अपने होशहवास खो बैठे. शहर के राजा और उसके परिजनों ने उस कुँए का पानी नहीं पिया था क्योंकि उनके महल में उनका निजी कुआं था जिसमें जादूगर अपना रसायन नहीं मिला पाया था.
राजा ने अपनी जनता को सुधबुध में लाने के लिए कई फरमान जारी किये लेकिन उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि सारे कामगारों और पुलिसवालों ने भी जनता कुँए का पानी पिया था और सभी को यह लगा कि राजा बहक गया है और ऊलजलूल फरमान जारी कर रहा है. सभी राजा के महल तक गए और उन्होंने राजा से गद्दी छोड़ देने के लिए कहा.
राजा उन सबको समझाने-बुझाने के लिए महल से बाहर आ रहा था तब रानी ने उससे कहा – “क्यों न हम भी जनता कुँए का पानी पी लें! हम भी फिर उन्हीं जैसे हो जायेंगे.”
राजा और रानी ने भी जनता कुँए का पानी पी लिया और वे भी अपने नागरिकों की तरह बौरा गए और बेसिरपैर की हरकतें करने लगे.
अपने राजा को ‘बुद्धिमानीपूर्ण’ व्यवहार करते देख सभी नागरिकों ने निर्णय किया कि राजा को हटाने का कोई औचित्य नहीं है. उन्होंने तय किया कि राजा को ही राजकाज चलाने दिया जाय.

Sunday, 27 September 2015

पिता और पुत्र

हिंदीज़ेन

crow chick

एक बहुत बड़े घर में ड्राइंग रूम में सोफा पर एक 80 वर्षीय वृद्ध अपने 45 वर्षीय पुत्र के साथ बैठे हुए थे। पुत्र बहुत बड़ा विद्वान् था और अखबार पढने में व्यस्त था।
तभी कमरे की खिड़की पर एक कौवा आकर बैठ गया।
पिता ने पुत्र से पूछा – “ये क्या है?”
पुत्र ने कहा – “कौवा है”।
कुछ देर बाद पिता ने पुत्र से दूसरी बार पूछा – “ये क्या है?”
पुत्र ने कहा – “अभी दो मिनट पहले तो मैंने बताया था कि ये कौवा है।”
ज़रा देर बाद बूढ़े पिता ने पुत्र से फ़िर से पूछा – “ये खिड़की पर क्या बैठा है?”
इस बार पुत्र के चेहरे पर खीझ के भाव आ गए और वह झल्ला कर बोला – “ये कौवा है, कौवा!”
पिता ने कुछ देर बाद पुत्र से चौथी बार पूछा – “ये क्या है?”
पुत्र पिता पर चिल्लाने लगा – “आप मुझसे बार-बार एक ही बात क्यों पूछ रहे हैं? चार बार मैंने आपको बताया कि ये कौवा है! आपको क्या इतना भी नहीं पता! देख नहीं रहे कि मैं अखबार पढ़ रहा हूँ!?”
पिता उठकर धीरे-धीरे अपने कमरे में गया और अपने साथ एक बेहद फटी-पुरानी डायरी लेकर आया। उसमें से एक पन्ना खोलकर उसने पुत्र को पढने के लिए दिया। उस पन्ने पर लिखा हुआ था:
“आज मेरा तीन साल का बेटा मेरी गोद में बैठा हुआ था तभी खिड़की पर एक कौवा आकर बैठ गया। उसे देखकर मेरे बेटे ने मुझसे 23 बार पूछा – पापा-पापा ये क्या है? – और मैंने 23 बार उसे बताया – बेटा, ये कौवा है। – हर बार वो मुझसे एक ही बात पूछता और हर बार मैं उसे प्यार से गले लगाकर उसे बताता – ऐसा मैंने 23 बार किया।”
(~_~)

Saturday, 26 September 2015

छाता

हिंदीजेन से साभार।


ज़ेन गुरु के कक्ष में प्रवेश करने से पहले शिष्य ने अपना छाता और जूते बाहर छोड़ दिए.
“मैंने खिड़की से तुम्हें आते हुए देख लिया था” – गुरु ने पूछा – “तुमने अपने जूते छाते के दाईं ओर उतारे या बाईं ओर?”
“यह तो मुझे याद नहीं आ रहा. इससे क्या फर्क पड़ता है? मैं तो हर समय ज़ेन के रहस्य का ही मनन करता रहता हूँ”.
“यदि तुम जीवन की इन छोटी-छोटी बातों की ओर ध्यान नहीं दे सकते तो तुम कभी भी कुछ नहीं सीख पाओगे. हर समय सतत जागरण में रहो, हर क्षण तुमसे ध्यान देने की अपेक्षा करता है – यही ज़ेन का एकमात्र रहस्य है”.

Friday, 25 September 2015

संध्या सिंदूर लुटाती है / हरिवंशराय बच्चन

संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

रंगती स्‍वर्णिम रज से सुदंर
निज नीड़-अधीर खगों के पर,
तरुओं की डाली-डाली में कंचन के पात लगाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

करती सरि‍ता का जल पीला,
जो था पल भर पहले नीला,
नावों के पालों को सोने की चादर-सा चमकाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

उपहार हमें भी मिलता है,
श्रृंगार हमें भी मिलता है,
आँसू की बूंद कपोलों पर शोणित की-सी बन जाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

Thursday, 24 September 2015

दुःख / महादेवी वर्मा

रजतरश्मियों की छाया में धूमिल घन सा वह आता;
इस निदाघ के मानस में करुणा के स्रोत बहा जाता।

उसमें मर्म छिपा जीवन का,
एक तार अगणित कम्पन का,
एक सूत्र सबके बन्धन का,
संसृति के सूने पृष्ठों में करुणकाव्य वह लिख जाता।

वह उर में आता बन पाहुन,
कहता मन से, अब न कृपण बन,
मानस की निधियां लेता गिन,
दृग-द्वारों को खोल विश्वभिक्षुक पर, हँस बरसा आता।

यह जग है विस्मय से निर्मित,
मूक पथिक आते जाते नित,
नहीं प्राण प्राणों से परिचित,
यह उनका संकेत नहीं जिसके बिन विनिमय हो पाता।

मृगमरीचिका के चिर पथ पर,
सुख आता प्यासों के पग धर,
रुद्ध हृदय के पट लेता कर,
गर्वित कहता ’मैं मधु हूँ मुझसे क्या पतझर का नाता’।

दुख के पद छू बहते झर झर,
कण कण से आँसू के निर्झर,
हो उठता जीवन मृदु उर्वर,
लघु मानस में वह असीम जग को आमन्त्रित कर लाता।

Wednesday, 23 September 2015

पेंसिल और इरेज़र

From Hindizen

pencil and eraser

इस ब्लॉग के नियमित पाठक और सम्माननीय टिप्पणीकार श्री जी विश्वनाथ जी ने कुछ दिनों पूर्व मुझे एक ईमेल फौरवर्ड भेजा. उसे मैं यहाँ अनूदित करके पोस्ट कर रहा हूँ. आपको धन्यवाद, विश्वनाथ जी!
एक दिन एक पेंसिल ने इरेज़र (रबर) से कहा – “मुझे माफ़ कर दो…”
इरेज़र ने कहा – “क्यों? क्या हुआ? तुमने तो कुछ भी गलत नहीं किया!”
पेंसिल बोली – “मुझे यह देखकर दुःख होता है कि तुम्हें मेरे कारण चोट पहुँचती है. जब कभी मैं कोई गलती करती हूँ तब तुम उसे सुधारने के लिए आगे आ जाते हो. मेरी गलतियों के निशान मिटाते-मिटाते तुम खुद को ही खो बैठते हो. तुम छोटे, और छोटे होते-होते अपना अस्तित्व ही खो देते हो”.
इरेज़र ने कहा – “तुम सही कहती हो लेकिन मुझे उसका कोई खेद नहीं है. मेरे होने का अर्थ ही यही है! मुझे इसीलिए बनाया गया कि जब कभी तुम कुछ गलत कर बैठो तब मैं तुम्हारी सहायता करूं. मुझे पता है कि मैं एक दिन चला जाऊँगा और तुम्हारे पास मेरे जैसा कोई और आ जाएगा. मैं अपने काम से बहुत खुश हूँ. मेरी चिंता मत करो. मैं तुम्हें उदास नहीं देख सकता.”
पेंसिल और इरेज़र के बीच घटा यह संवाद बहुत प्रेरक है. उन्हीं की भाँती माता-पिता इरेज़र और बच्चे पेंसिल की तरह हैं. माता-पिता अपने बच्चों की गलतियों को सुधारने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं. इस प्रक्रिया में उन्हें कभी-कभी ज़ख्म भी मिलते हैं और वे छोटे – बूढ़े होते हुए एक दिन हमेशा के लिए चले जाते हैं. बच्चों को उनकी जगह कोई और (जीवनसाथी) मिल जाता है लेकिन माता-पिता अपने बच्चों का हित देखकर हमेशा खुश ही होते हैं. वे अपने बच्चों पर कभी कोई विपदा या चिंता मंडराते नहीं देख सकते.
* * *
इसी ब्लॉग में पेंसिल का सन्देश भी बहुत पहले पोस्ट किया गया था, उसे पढना भी आपको अच्छा लगेगा.

Tuesday, 22 September 2015

Monday, 21 September 2015

सस्पेंडेड कॉफ़ी

हिंदीज़ेन से साभार

इसे मैंने फेसबुक पर पढ़ा. अच्छा लगा इसलिए हिंदी अनुवाद करके यहां लगा रहा हूं.

“मैं अपने एक मित्र के साथ एक छोटे कॉफीहाउस गया और हमने अपना ऑर्डर दिया. जब हम अपनी टेबल की ओर जा रहे थे तब मैंने देखा कि दो लोग आए और उन्होंने काउंटर पर जाकर कहा:
‘तीन कॉफी. दो हमारे लिए और एक सस्पेंडेड कॉफी’, उन्होंने पैसे दिए और दो कॉफी लेकर चले गए.
मैंने अपने मित्र से पूछा, “ये सस्पेंड कॉफी क्या होती है?”
उसने कहा, “देखो, अभी पता चल जाएगा.”
कुछ और लोग वहां आए. दो लड़कियों ने कॉफी ली और पैसे देकर चलती बनीं. अगला ऑर्डर तीन वकीलों ने दिया – अपने लिए तीन कॉफी और बाकी दो सस्पेंडेड. मुझे सस्पेंडेड कॉफी का चक्कर समझ में नहीं आ रहा था. मौसम बहुत खुशगवार था और मैं कॉफीहाउस की खिड़की से बाहर चौराहे का सुंदर नज़ारा देख रहा था. तभी मैले कपड़े पहने एक गरीब आदमी भीतर आया और उसने काउंटर पर बैठे मैनेजर से बड़ी उम्मीद से पूछा, ‘क्या कोई सस्पेंडेड कॉफी है?’
मैं समझ गया कि लोग अपनी ओर से कीमत अदा करके उन व्यक्तियों के लिए कॉफी का इंतजाम कर रहे थे जो गरीब होने के कारण कॉफी नहीं खरीद पाते. सस्पेंडेड कॉफी खरीदने का यह दस्तूर नेपल्स में शुरु हुआ लेकिन अब यह दुनिया में दूर-दूर तक फैल चुका है और लोग सस्पेंडेड कॉफी ही नहीं बल्कि सैंडविच या पूरा खाना भी ऑर्डर करते हैं.
कितना अच्छा हो यदि दुनिया के हर शहर और कस्बे में ऐसे रेस्तरां या ऐसी राशन की दुकानें भी हों जहां कोई जाकर किसी ज़रूरतमंद की मदद कर सके… उसे थोड़ी खुशी दे सके. 
(~_~)

Sunday, 20 September 2015

मोतियों के सौदागर

http://hindizen.com/2014/07/12/jewel-merchants/


एक रात हीरे-जवाहरात के दो सौदागर किसी दूरदराज़ रेगिस्तान की सराय पर लगभग एक ही वक़्त पर पहुंचे. उन दोनों को एक-दूसरे की मौजूदगी का अहसास था. जब वे अपने ऊंटों से माल-असबाब उतार रहे थे तब उनमें से एक सौदागर ने जानबूझकर एक बड़ा मोती थैले से गिरा दिया.
मोती लुढ़कता हुआ दुसरे सौदागर के करीब पहुँच गया, जिसने बारीकी से मुआयना करते हुए उसे उठाया और पहले सौदागर को सौंपते हुए कहा, “यह तो बहुत ही बड़ा और नायाब मोती है. इसकी रंगत और चमक बेमिसाल है.”
पहले सौदागर ने बेपरवाही से कहा, “इतनी तारीफ करने के लिए आपका शुक्रिया लेकिन यह तो मेरे माल का बहुत मामूली और छोटा मोती है”.
दोनों सौदागरों के पासे ही एक खानाबदोश बद्दू बैठा आग ताप रहा था. उसने यह माजरा देखा और उठकर दोनों सौदागरों को अपने साथ खाने का न्यौता दिया. खाने के दौरान बद्दू ने उन्हें अपने साथ बीता एक पुराना वाकया सुनाया.
“दोस्तों, बहुत साल बीते मैं भी आप दोनों की मानिंद हीरे-जवाहरातों का बड़ा मशहूर सौदागर था. एक दिन मेरा कारवां रेगिस्तान के भयानक अंधड़ में फंस गया. मेरे साथ के लोग तितर-बितर हो गए और मैं अपने साथियों से बिछड़कर राह खो बैठा.”
“कई दिनों तक मैं अपने ऊँट के साथ भूखा-प्यासा रेगिस्तान में भटकता रहा लेकिन मुझे कहीं कुछ नहीं मिला. खाने की किसी चीज़ की तलाश में मैंने अपने ऊँट पर लदे हर थैले को दसियों बार खोलकर देखा.”
“आप मेरी हैरत का अंदाजा नहीं लगा सकते जब मुझे माल में एक ऐसा छोटा थैला मिला जो मेरी नज़रों से तब तक बचा रह गया था. कांपती हुई उँगलियों से मैंने उस थैले को खोला.”
“और आप जानते हैं उस थैले में क्या था?”
“वह बेशकीमती मोतियों से भरा हुआ था.”
(~_~)

Saturday, 19 September 2015

बुद्ध के धर्म का सार

http://hindizen.com/2012/05/01/essence/

पो चीन के तांग राजवंश में उच्चाधिकारी और कवि था. एक दिन उसने एक पेड़ की शाखा पर बैठे बौद्ध महात्मा को ध्यान करते देखा. उनके मध्य यह वार्तालाप हुआ:
पो: “महात्मा, आप इस पेड़ की शाखा पर बैठकर ध्यान क्यों कर रहे हैं? ज़रा सी भी गड़बड़ होगी और आप नीचे गिरकर घायल हो जायेंगे!”
महात्मा: “मेरी चिंता करने के लिए आपका धन्यवाद, महामहिम. लेकिन आपकी स्थिति इससे भी अधिक गंभीर है. यदि मैं कोई गलती करूंगा तो मेरी ही मृत्यु होगी, लेकिन शासन के इतने ऊंचे पद पर बैठकर आप कोई गलती कर बैठेंगे तो सैंकड़ों-हजारों मनुष्यों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा”.
पो: “शायद आप ठीक कहते हैं. अब मैं कुछ कहूं? यदि आप मुझे बुद्ध के धर्म का सार एक वाक्य में बता देंगे तो मैं आपका शिष्य बन जाऊँगा, अन्यथा, मैं आपसे कभी मिलना नहीं चाहूँगा”.
महात्मा: “यह तो बहुत सरल है! सुनिए. बुद्ध के धर्म का सार यह है, ‘बुरा न करो, अच्छा करो, और अपने मन को शुद्ध रखो’.”
पो: “बस इतना ही!? यह तो एक तीन साल का बच्चा भी जानता है!”
महात्मा: “आपने सही कहा. एक तीन साल के बच्चे को भी इसका ज्ञान होता है, लेकिन अस्सी साल के व्यक्ति के लिए भी इसे कर सकना कठिन है.”

Friday, 18 September 2015

चंद्रमा की ओर इशारा

http://hindizen.com/2013/11/29/finger-pointing-to-the-moon/

भिक्षुणी वू जिन्कांग ने आचार्य हुइनेंग से पूछा, “मैं कई वर्षों से महापरिनिर्वाण सूत्र का पारायण कर रही हूं लेकिन इनमें कही अनेक बातों को समझ नहीं पा रही हूं. कृपया मुझे उनका ज्ञान दें.”
आचार्य ने कहा, “मुझे पढ़ना नहीं आता. यदि तुम मुझे वे अंश पढ़कर सुना दो तो शायद मैं तुम्हें उनका अर्थ बता पाऊं.”
भिक्षुणी ने कहा, “आपको लिखना-पढ़ना नहीं आता फिर भी आप इन गूढ़ शास्त्रों का ज्ञान कैसे आत्मसात कर लेते हैं?”
“सत्य शब्दों पर आश्रित नहीं होता. यह आकाश में दीप्तिमान चंद्रमा की भांति है, और शब्द हमारी उंगली हैं. उंगली से इशारा करके आकाश में चंद्रमा की स्थिति को दर्शाया जा सकता है, लेकिन उंगली चंद्रमा नहीं है. चंद्रमा को देखने के लिए दृष्टि को उंगली के परे ले जाना पड़ता है. ऐसा ही है न?”, आचार्य ने कहा.
इस दृष्टांत का सार यह है कि चंद्रमा की ओर इंगित करने वाली उंगली चंद्रमा नहीं है. क्या इसका कोई गहन अर्थ भी है? हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन से इसका क्या संबंध है? इस दृष्टांत के अर्थ का हम किस प्रकार उपयोग कर सकते हैं?
चित्र में लॉफ़िंग बुद्ध होतेई चंद्रमा की ओर इशारा कर रहा है. होतेई चीन के परवर्ती लियांग राजवंश (907–923 ईसवी) में महात्मा था. प्रसन्नता और संतोष होतेई के चित्र व चरित्र का रेखांकन करने वाले प्रमुख तत्व हैं. उसकी थलथलाते हुए पेट और प्रसन्नचित्त मुखमंडल की छवि विषाद हर लेती है.
* * * * *

Thursday, 17 September 2015

नीड़ का निर्माण / पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

वह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा,
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँति घेरा,

रात-सा दिन हो गया, फिर
रात आ‌ई और काली,
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा,

रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

वह चले झोंके कि काँपे
भीम कायावान भूधर,
जड़ समेत उखड़-पुखड़कर
गिर पड़े, टूटे विटप वर,

हाय, तिनकों से विनिर्मित
घोंसलो पर क्या न बीती,
डगमगा‌ए जबकि कंकड़,
ईंट, पत्थर के महल-घर;

बोल आशा के विहंगम,
किस जगह पर तू छिपा था,
जो गगन पर चढ़ उठाता
गर्व से निज तान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों
में उषा है मुसकराती,
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती;

एक चिड़िया चोंच में तिनका
लि‌ए जो जा रही है,
वह सहज में ही पवन
उंचास को नीचा दिखाती!

नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

Wednesday, 16 September 2015

बुद्ध-प्रतिमा को बंदी बनाना

http://hindizen.com/2008/10/09/buddha-in-jail/


एक व्यापारी कपड़े के 50 थान लेकर दूसरे नगर में बेचने जा रहा था। मार्ग में एक स्थान पर वह सुस्ताने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गया। वहीं पेड़ की छांव में भगवान बुद्ध की एक प्रतिमा भी लगी हुई थी। व्यापारी को बैठे-बैठे नींद लग गयी। कुछ समय बाद जागने पर उसने पाया कि उसके थान चोरी हो गए थे। उसने फ़ौरन पुलिस में जाकर रिपोर्ट लिखवाई।
मामला ओ-ओका नामक न्यायाधीश की अदालत में गया। ओ-ओका ने निष्कर्ष निकाला – ”पेड़ की छाँव में लगी बुद्ध की प्रतिमा ने ही चोरी की है। उसका कार्य वहाँ पर लोगों का ध्यान रखना है, लेकिन उसने अपने कर्तव्य-पालन में लापरवाही की है। प्रतिमा को बंदी बना लिया जाए।”
पुलिस ने बुद्ध की प्रतिमा को बंदी बना लिया और उसे अदालत में ले आए। पीछे-पीछे उत्सुक लोगों की भीड़ भी अदालत में आ पंहुची। सभी जानना चाहते थे कि न्यायाधीश कैसा निर्णय सुनायेंगे।
जब ओ-ओका अपनी कुर्सी पर आकर बैठे तब अदालत परिसर में कोलाहल हो रहा था। ओ-ओका नाराज़ हो गए और बोले – “इस प्रकार अदालत में हँसना और शोरगुल करना अदालत का अनादर है। सभी को इसके लिए दंड दिया जाएगा।”
लोग माफी मांगने लगे। ओ-ओका ने कहा – “मैं आप सभी पर जुर्माना लगाता हूँ, लेकिन यह जुर्माना वापस कर दिया जाएगा यदि यहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति कल अपने घर से कपड़े का एक थान ले कर आए। जो व्यक्ति कपड़े का थान लेकर नहीं आएगा उसे जेल भेज दिया जाएगा।”
अगले दिन सभी लोग कपड़े का एक-एक थान ले आए। उनमें से एक थान व्यापारी ने पहचान लिया और इस प्रकार चोर पकड़ा गया। लोगों को उनके थान लौटा दिए गए और बुद्ध की प्रतिमा को रिहा कर दिया गया।
चित्र साभार – फ्लिकर

Tuesday, 15 September 2015

ताबूत

http://hindizen.com/2009/01/11/a-wooden-box/

एक किसान इतना बूढा हो चुका था कि उससे खेत में काम करते नहीं बनता था। हर दिन वह धीरे-धीरे चलकर खेत को जाता और एक पेड़ की छाँव में बैठा रहता।
उसका बेटा खेत में काम करते समय अपने पिता को पेड़ के नीचे सुस्ताते हुए देखता था और सोचता था – “अब उनसे कुछ भी काम नहीं करते बनता। अब उनकी कोई ज़रूरत नहीं है।”
एक दिन बेटा इस सबसे इतना खिन्न हो गया कि उसने लकड़ी का एक ताबूत बनाया। उसे खींचकर वह खेत के पास स्थित पेड़ तक ले कर गया। उसने अपने पिता से ताबूत के भीतर बैठने को कहा। पिता चुपचाप भीतर बैठ गया। लड़का फ़िर ताबूत को जैसे-तैसे खींचकर पास ही एक पहाड़ी की चोटी तक ले कर गया। वह ताबूत को वहां से धकेलने वाला ही था कि पिता ने भीतर से कुछ कहने के लिए ठकठकाया।
लड़के ने ताबूत खोला। पिता भीतर शान्ति से बैठा हुआ था। पिता ने ऊपर देखकर बेटे से कहा – ”मुझे मालूम है कि तुम मुझे यहाँ से नीचे फेंकने वाले हो। इससे पहले कि तुम यह करो, मैं तुम्हें एक बात कहना चाहता हूँ।”
“क्या?” – लड़के ने पूछा।
“मुझे तुम फेंक दो लेकिन इस ताबूत को संभालकर रख लो। तुम्हारे बच्चों को आगे चलकर काम आएगा।”

Monday, 14 September 2015

पूर्व निष्कर्ष

अरविन्द सर के व्हाट्सएप्प सन्देश से साभार।

एक छोटा सा बच्चा अपने दोनों हाथों में एक एक एप्पल लेकर खड़ा था

उसके पापा ने मुस्कराते हुए कहा "बेटा एक एप्पल मुझे दे दो"

इतना सुनते ही उस बच्चे ने एक एप्पल को दांतो से कुतर लिया.

उसके पापा कुछ बोल पाते उसके पहले ही उसने अपने दूसरे एप्पल को भी दांतों से कुतर लिया

अपने छोटे से बेटे की इस हरकत को देखकर बाप ठगा सा रह गया और उसके चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई थी...
तभी उसके बेटे ने अपने नन्हे हाथ आगे की ओर बढाते हुए पापा को कहा....
"पापा ये लो.. ये वाला ज्यादा मीठा है."

शायद हम कभी कभी पूरी बात जाने बिना निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं..
नजर का आपरेशन तो सम्भव है, पर नजरिये का नही..!
फर्क सिर्फ सोच का  होता है...वरना , वही सीढ़ियां ऊपर भी जाती हैं और नीचे भी आती हैं।

Sunday, 13 September 2015

ध्वज-वंदना / रामधारी सिंह "दिनकर"

नमो, नमो, नमो...

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
नमो नगाधिराज-शृंग की विहारिणी!
नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी!
प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी!
नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी!
नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो!
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

हम न किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार
प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार
सत्य न्याय के हेतु, फहर फहर ओ केतु
हम विरचेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु
पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग
दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग
सेवक सैन्य कठोर, हम चालीस करोड़
कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर
करते तव जय गान, वीर हुए बलिदान
अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!
प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!