Tuesday, 17 November 2015

क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?

ये मेरी लिखी हुई कविता है.
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पत्थर बनकर बैठ गए जो,
भगवान कहे जो जाते है,
इनमे ऐसी क्या बात है भला,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
जिनके नाम पर होता धंधा,
अंधश्रद्धा से होता सब गन्दा,
उसने कब सुनी मेरी फरियादें,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
जो बैठा कहीं है, या है ही नहीं,
जिसके नियम भी उसके नहीं है,
जिसके नाम पर कत्लेआम यही है,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
जिसके नियम लिखे हुए है,
तोड़े और मरोड़े हुए है,
क्यों उसको भला मानू मैं,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
जिसके नाम पर चढ़ता चढ़ावा,
ढोंग नाम पे जिसके रचा हुवा,
कारीगर अपने हिसाब बनाता,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
मैं तो मानू उनको जिनका मैं अंश हूँ,
जिन्होंने लालन पालन किया और,
उनका प्यार हरपल पाता हूँ मैं,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं?
जिनसे बड़ा कोई नही,
हर आशीर्वाद इनसे ही,
जब ब्रह्माण्ड में इनसे कोई बड़ा नहीं तो,
क्यूँ पूजूँ भगवान को मैं।

-अमित शुक्ल

Wednesday, 9 September 2015

रीढ़ की हड्डी / अमित शुक्ल

मेरे अपने लिखे हुए शेर:

रीढ़ की हड्डी होना ज़रूरी है,
तलवे चाटने की क्या मजबूरी है,
खुद में बेहतर होते चलो हर पल,
सुना है चमचो की उम्र होती थोड़ी है - शुक्ल

रंज है गर दिल में,तो खुल के कह दो,
यूँ घुट घुट कर रहना हमें अच्छा नहीं लगता,
दिल की बात कह दोगे तो दर्द कम हो जाएगा,
चिंगारी कब शोला बन जाए,पता नहीं लगता' -शुक्ल

Tuesday, 8 September 2015

सब कुछ बिक रहा है / अमित शुक्ल

ये मेरी एक कविता है, आशा करता हूँ आपको पसंद आएगी।

सब कुछ बिक रहा है,
ईमान बिक रहा है,
इंसान बिक रहा है,
काले को गोरा बनाने का,
सामान बिक रहा है,
सोच बिक रही है,
शहीदों का तो देखो यारों,
कफ़न भी बिक रहा है,
सब कुछ बिक रहा है,
रैप बिक रहा है,
एप बिक रहा है,
कला तो नहीं आजकल,
जिस्म दिखाने वालियों का,
जिस्म बिक रहा है,
आस्था बिक रही है,
श्रद्धा बिक रही है,
मूर्ति के रूप में दुकानों में,
भगवान बिक रहा है,
सच बोलना तो भूल चुके,
हकीकत से नाता तोड़ चुके,
आजकल तो देखो मीडिया में,
झूठ बिक रहा है,
फेसबुक पे बिक रहा है,
गूगल पे बिक रहा है,
आजकल तो सच भी,
बेईमानी में बिक रहा है,
- शुक्ल

Thursday, 6 August 2015

वक़्त रहता नहीं कहीं टिककर

जी हाँ, वक़्त कभी नहीं रुकता, कभी नहीं, पर क्यों? ये तो एक कमाल है, एक ऐसा कमाल जो आपके और मेरे समझ से परे है। इसमें इंसान की बुद्धि नहीं काम कर सकती। ये एक सतत नियम है, एक ऐसा नियम जो प्रकृति के वशीभूत है, जिसमे हम भज जुड़े हुए है और जिससे बहुत कुछ सीखने को मिलता है।


एक सीधा सा अनुभव ये है की कोई भी स्थिति, चाहे वो सुख हो या दुःख, ये दोनों ही क्षणभंगुर है, दोनों एक सामान है और जीवन लगातार आगे बढ़ने का नाम है, ठीक वैसे ही जैसे पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन जी ने अपनी कविता 'जीवन की आपाधापी में' में कहा है,

'अनवरत समय की चक्की चलती जाती है,
मैं जहां खडा था कल, उस थल पर आज नही,
कल इसी जगह पर पाना मुझको मुश्किल है,'

वाकई इस अनवरत चलने वाली चक्की में जो गुण है वो किसी और में नहीं, इसमें जो सीख है वो किसी और में नहीं, सीख कभी ना रुकने की, हर पल में इक सा रहने की, दुःख-सुख को एक सा समझने की, जीवन को जीने की। इस चक्की का कमाल ये है, की यहाँ से मिली सीख जीवन भर आपके स्वास्थय को बेहतर करती रहेगी, मगर फिर भी इंसान की फिदरत ऐसी है की वो एक जगह टिककर नहीं रहता, शायद इसको भी वक़्त कहते है, वैसे भी गुलज़ार साहब ने कहा ही है,

'वक़्त रहता नहीं कहीं टिककर, इसकी आदत भी आदमी सी है।'

-अमित शुक्ल

Saturday, 6 June 2015

भागते रहते है बस हम सब

ये ज़रूरी नहीं की मेरी हर इक बात से आप इत्तेफाक रखें, और ना ही मैं ऐसी कोई उम्मीद लगाता हूँ, क्योंकि इसकी उम्मीद करना खुद से बेईमानी कहलाएगी पर जैसा मेरे ब्लॉग का टाइटल कहता है मैं ऐसा मानता हूँ की हम सब भागमभाग में व्यस्त है।

एक ऐसी भागमभाग जो हमारे जन्म लेते ही शुरू हुई थी और हमारे ख़त्म होते ही ख़त्म हो जाएगी। ये भाग दौड़ किसलिए? कही इसका मकसद पैसा कमाना तो नहीं, फिर चाहे वो किसी की ज़ेब काट के मिले या गर्दन? या इसका मकसद है नाम कमाना? नाम कमाने की चाह वैसे तो सबमे होती है मगर इसकी इतनी चाह क्यों जबकि अपने जन्म से लेकर अपनी मौत तक हमारे नाम को हमसे ज़्यादा जानने वाले इस्तेमाल करते है, कभी बुलाने के लिए, कभी परिचय करवाने के लिए या कभी अन्य कारणों से।

ये कमाल की बात है की दिन भर हम सब अपने मालिक/ कर्मचारियों से ये उम्मीद करते है की वो हमारी इस भागमभाग के बदले हमें कुछ माली बढ़त देंगे, मगर ऐसा ना होने पर हम निराश भी होते है, पर इस भागमभाग की वजह क्या है? अपने भविष्य को सुधारना, या अपने बच्चों का? ये जानते हुए भी की भविष्य हमारे हाथ में नहीं होता और वर्तमान में जब हमें समझ, शांति और विवेक से काम करना चाहिए हम भाग रहे होते है, जैसे की हमारे सामने कोई जंग चल रही हो, एक ऐसी जँग जिसके हम हिस्सेदार है, मगर क्या वाकई इस तरह से हम कहीं पहुँचते भी है?

एक नौकरी, फिर दूसरी नौकरी, या फिर एक बिज़नस, फ़िर दूसरा, बस हमेशा काम निकालने की जुगाड़बाजी में लगे रहते है हम, एक घरौंदा बनाने की कोशिश में। जिनके घरौंदे बस गए है उन्हें बधाई, जिनके नहीं, उनके लिए बस यही कहूँगा:

ए खुदा, मुझे इतनी तो मयस्सर कर दे,
मैं जिस मकान में रहता हूँ, उसको घर कर दे।

मगर ये भागमभाग किसलिए? ये भागमभाग करते करते कहीं हम खुद से तो नहीं भाग रहे? क्या इस बात का एहसास कभी हमने किया है की इस 'Rat Race' के चक्कर में हम कही खुद रैट तो नहीं बन गए, जिसको अपना होश नहीं, कोई खबर नहीं, बस एक रेस में बचपन से पड़े हुए थे, अपनों को देखा इस तरह दौड़ते तो हम भी दौड़ने लगे, क्योंकि खुद कभी सोचने का वक़्त नहीं मिला या कभी खुद को वो वक़्त दिया नहीं।

सोचिए, और अपनी राय मुझे ज़रूर दें।

-अमित शुक्ला

Thursday, 14 May 2015

और नौकरी चली गई

जी हाँ, ये सच है, एक हफ्ते की नौकरी के बाद, आज बड़ी ही बेढ़ंगी तरीके से नौकरी चली गई. ऐसा लगा जैसे कोई आँधी आई और मुझे उड़ा के ले गई. ऑफिस के बड़े लोगों ने निर्णय किआ और मुझे बता दिया।

चलिए अब फिर से नई नौकरी की तलाश चालू।

Friday, 8 May 2015

अक्सर देर कर देता हूँ मैं

http://www.nishantyadav.in/2015/05/blog-post_8.html

मैं अक्सर देर से पहुँचता हूँ ।
उसके बुलाने पर या खुद ही जाने पर ।।
मै अक्सर देर से कहता हूँ ।
उससे कुछ कहना हो या फिर खुद से ।।
मैं अक्सर देर से समझ पाता हूँ ।
समझना उसको हो या खुद को ।।
मैं बहुत देर कर देता हूँ ।
पहले हाँ कहने  में फिर ना कहने में ।।
मैं अक्सर देर से पढता हूँ ।
किसी का चेहरा हो या जज्वात अपने ।।
मै अक्सर देर से जलाता हूँ चिराग ।
अँधेरा रात के होने का हो या मन का ।।
मै अक्सर देर संभल पाता हूँ ।
हाथ तुम्हारा हो या साथ खुद का ।।
...निशान्त यादव

Thursday, 30 April 2015

इंसानी जीवन का सच

निशांत जी के ब्लॉग से साभार

हम  इंसान अपने बजूद को जिन्दा रखने के लिए जिंदगी भर लड़ते है एक दूसरे से लड़ते , परस्थितिओं  से लड़ते है और कभी- कभी पीढ़ी दर्द पीढ़ी लड़ते है अपने होने के बजूद हम इंसान जमा कर जाते है बिलकुल मुन्नवर राणा साहव के शेर की तरह ...

मुमकिन है मेरे बाद की नस्लें मुझे  ढूंढ़ें
बुनियाद में इस नाम का पत्थर भी लगा दो.

लेकिन ये प्रकृति जिसके गोद में हम पल रहे है ये भी चुपचाप हंसती होगी  और फिर एक दिन  एक झटके में हमारे बजूद को मिटा जाती है और हम फिर से जुट जाते अपने बजूद को बनाने में ! यही इंसानी जीवन होने का संघर्ष है हम मिटते है बनते और फिर बनते है  !!

Monday, 27 April 2015

बाबरे मन लौट आ ...

मेरे मित्र निशांत यादव जी के ब्लॉग से साभार


बाबरे मन लौट आ आवारगी के दिन गए ।                                            
देख लंबा रास्ता , अब मस्तियों के दिन गए ।। 

राह पथरीली मिले या फ़ूल की चादर मिले ।
चल समय पर छोड़ दे , पर बाबरे मन लौट आ ।।

चुन लिया है फूल को काँटों के संग इस राह में ।
कौन जाने छोड़ दे  ...  एक  साथी वास्ता ।।

राह फूलों की चुने , सब काँटों से किसका वास्ता ।
नींद सुख की सब जियें , दुःख से है किसका वास्ता ।।

आ अंधेरो से लड़े , अब रौशनी की लौ लिए ।
चल जला दें  राह में रौशन किये लाखो दीये ।।

छोड़ दे अब साथ उसका जिसने अँधेरे दिए ।
बाबरे मन लौट आ आवारगी के दिन गए ।।

रौशनी की एक लौ है काफी ,  मन के अँधेरे तेरे लिए ।
देख फिर भी लाया हूँ मैं , आशा के लाखो दीये ।।

फिर से न विखरेगा तू , आज ये वादा तो कर ।
देख ले आया हूँ मैं, निशाँ मंजिलो के ढूंढ कर ।।

लौट आ अब देख ले , जिंदगी दरवाजे खड़ी ।
बाबरे मन लौट आ , आवारगी के दिन गए ।।

........निशान्त यादव

Friday, 24 April 2015

तन उजियारे, काले मन

http://www.nishantyadav.in/2015/04/blog-post_24.html

माया और काया पर निर्भर है व्यक्ति यहाँ ।
तन का रंग सब देख रहे मन के रंग से अनिभिज्ञ यहाँ ।।
माया काली ,उजियारे तन की माँग यहाँ ।
काले तन ,उजियारे मन को ले जाऊँ कहाँ ।।
हे ! कृष्ण बताओ क्या  तुमने भी झेला दंश यहाँ ।
देखो रंग, प्रेम पर भारी , हे ! कृष्ण यहाँ ।।
रंगो के इस भेद भाव में जीती दुनिया सारी ।
माया के काले  पाश बंधी दुनिया सारी ।।
हे ! शनि काला रंग अपना ले जाओ ।
या फिर माया पाश  से मुक्ति दे जाओ ।।
मन के काले जग में उजियारा मिले कहाँ ।
हे ! सूर्य कृपा कर उजियारे मन कर जाओ ।।
हे ! चंद्र रात्रि से लड़ जाओ ।
सब काले मन उजियारे से भर जाओ ।।

Monday, 20 April 2015

दहेज़

ये कविता मैने तब लिखी थी जब मैं ७वी या आठवी कक्षा में था। आशा करता हूँ आपको पसंद आएगी।



दहेज़
दहेज़ तूने कितनो की सेज़,
को अर्थी में बदल दिया,
कर दिया तूने कितनी,
माओ की कोख़ सूनी,
आँचल उठा के रो रही है,
अब उनकी आँखें रोनी,

क्या उनका कसूर था,
क्या उनका गुनाह था,
क्यूँ कर दिया तुमने उनके,
जीवन का ख़त्म प्रवाह था,

क्या धन ही है,
सबकुछ तुम्हारे जीवन में,
क्या स्त्री का कोई मान,
नहीं तुम्हारे जीवन में,

क्यूँ भूल जाते है हम,
की जो आज हमारी बहू है,
वह किसी की बेटी है,
और जो आज हमारी बेटी है,
कल वो भी किसी कि बहू होंगी,

क्यूँ होता है यह फर्क,
क्यूँ है ये दहेज़ का नर्क,
क्या कभी समाप्त हो पाएगा,
यह बहूँ-बेटी का फर्क,

क्या ये सोच है प्रधान,
या है ये कोरा ज्ञान,
की जो बन आई बहूँ,
वह है पैसे की खान,
क्या इस विकृत सोच से,
बना दिए है घर शमशान,

संस्कारों की बलि-वेदि पर,
कब तक होंगी बेटियाँ कुर्बान,
कब तक कल्पनीय भय से,
हम सहते रहे यह अपमान,

बदल सकता यह रूप तभी,
जब बहूँ का दर्ज़ा हो बेटी समान,
जब सिर्फ बेटी ही नहीं बल्कि,
बहूँ का भी हो सम्मान,

तब पिता भी यह कह सकेगा,
जाओ खुश रहो बिटिया रानी,
सास करेगी माँ सा प्यार,
तब सत्य होगी यह कहानी।
                                            -अमित शुक्ल


Wednesday, 15 April 2015

किसान पस्त, पी.एम. मस्त


ये २०१५ का भारत है साहब, जी हाँ, वही भारत जिसमे अच्छे दिन लाने का सपना लोगबाग को दिखाकर मोदी साहब देश के प्रधानमन्त्री बन गए। प्रधानमंत्री मतलब देश का केंद्र बिंदु। प्रधानमंत्री मतलब लोगों की तकलीफों को समझने वाला, उनका निवारण करने के तरीके बनाने वाला, मगर क्या ऐसा है?

पिछले कुछ वक़्त का हाल देखें तो ये साबित हो जाता है की देश में उसके अन्नदाता को उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। जो किसान कभी लोगो की पेट की आग बुझाने के लिए दिन-रात,सुबह-शाम अपने खेतों में काम करते थे वो अब इस ख्याल से ख़ौफ़ज़दा है की कहीं बिगड़े मौसम और सरकार की अनदेखी के कारण वो अपने लगाए हुए पैसे भी पा पाएँगे या नहीं?

जी हाँ, शायद आपको इस बात का अंदाजा नहीं होगा की पहले तो ये किसान अपनी जमा पूँजी लगाकर अपने खेतों में फ़सल उगाते है, फिर उसे मिल में जमा करा देते है, क्योंकि वो एक वक़्त के बाद ही उन्हें पैसा देते है, और वो भी कौड़ियों के भाव। इस साल किसानों को लगभग ३ रूपए पर किलो का भाव मिल रहा है, जो की इस अन्नदाता के लिए एक तमाचा ही है।

आखिर जिसने अपना खून पसीना लगाकर इसको उगाया है उसे ही उसकी चीज़ से महरूम कर दिया जाए तो ये गलत होगा या नहीं? इस पर कमाल ये की जब ये किसान अपना हक़ लेने सरकारी अधिकारी के पास जाते है, तो उनसे रिश्वत मांगी जाती है, और मुआवज़े के नाम पर मिलता कुछ नहीं।

'कल तक जो अन्नदाता था, वो आज भिखारी बना बैठा है,
है किसान का ख्याल नहीं, ये कौन उल्लू सरताज बना बैठा है।'- शुक्ल

आगे शायद कहने की ज़रुरत नहीं की इतने बुरे वक़्त में, जब देश के प्रधानमन्त्री को स्वदेश में होना चाहिए, वो विदेश की सैर कर रहे है, बड़े बड़े होटलों में खाना खा रहे है, और किसान भूखों मर रहा है, या खुद को मार रहा है, क़र्ज़ के कारण, मुफलिसी के कारण।

उम्मीद है की इस बार राशन खराब नहीं किया जाएगा, या खुले में सड़ने को नहीं ड़ाल दिया जाएगा।

Tuesday, 14 April 2015

अम्बेडकर-गाँधी के विचारों का मंचन

आज बाबासाहेब की जयंती है। आज बहुत से कार्यक्रम होंगे, मगर कल देर शाम अस्मिता थिएटर द्वारा जे.एन.यू. में राजेश कुमार द्वारा लिखित 'अम्बेडकर और गाँधी' का मंचन किया गया। मैं भी वहाँ कल दर्शक दीर्घा में था और सोच रहा था की इन दो महान हस्तियों के चरित्रों को एक साथ एक मंच पर देखना या दिखाना बहुत ही अनूठा अनुभव होगा।

यकीन मानिए मेरा अंदाज़ा गलत नहीं था। अस्मिता के वरिष्ठ अभिनेता बजरंगबली सिंह ने जैसे ही स्टेज पर बाबा साहब का चरित्र निभाना शुरू किया, मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

एक अद्भुत वार्तालाप का माहौल बन गया, जिसमे बापू और बाबा साहब के बीच अश्पृश्यता के मुद्दे पर बहस शुरू हुई, एक बातचीत, विचारों का आदान प्रदान आरम्भ हुआ। वो बातचीत, जिसमे अस्पृश्यता को मिटाने की बातचीत थी, वर्ण व्यवस्था पर मतभेद था।

यकीनी तौर पर दोनों ही लोग बहुत ही शक्तिशाली प्रतीत होते है, मगर ये कहना गलत नहीं होगा की बाबासाहब वाकई में बहुत ही शक्तिशाली लगते है। इसका ये तात्पर्य नहीं की बापू कहीं से कमज़ोर थे, वो बस अपने विचारों को बहुत ही अलग रूप से प्रस्तुत करते थे।

रमाबाई का किरदार कर रही शिल्पी मारवाह का संवाद बहुत ही सुन्दर था,ख़ासतौर पर,

'आज तक महात्मा लोगों के प्राण बचाते थे, आप तो स्वयं महात्मा के प्राण बचाने जा रहे है।'

बाबासाहेब के इतने सारे और शक्तिशाली संवाद है की यदि उन्हें लिखने बैठा, तो रात से सुबह हो जाएगी। बापू के रूप में गौरव मिश्रा जी ने ये फिर साबित किया है की आप किसी भी किरदार में जान फूँक देते है। बापू का सधा हुआ चरित्र और व्यक्तित्व निभाने में उन्होंने कमाल कर दिया है।

सिर्फ नाटक के अंतिम संवाद पर मुझे थोडा सा कहना है, की बाबासाहेब ने बापू की मृत्यु के लिए हत्या शब्द का इस्तेमाल शायद कभी भी अपनी लेखनी और बातों में नहीं किया है, किन्तु नाटक के अंतिम संवाद में 'हत्या' शब्द का इस्तेमाल किया गया है। यदि लेखक और निर्देशक इसपर ध्यान दे दें तो अति कृपा होगी।

Monday, 13 April 2015

हानूश की कहानी, मेरी ज़बानी

हानूश की कहानी देखने और पढ़ने में एक आम सी कहानी लगती है मगर ध्यान देने पर लगता है की ये हम सब की ज़िन्दगी की कहानी है। एक कहानी जिसमे एक इंसान का जुनून, उसकी लगन, उसकी मेहनत, उसको मिलने वाली दुत्कार और लक्ष्य प्राप्ति पर उसका सत्कार, ये सब शामिल है।

हानूश की कहानी मुझे मेरी ज़िन्दगी के उस दौर की याद दिलाती है जब मेरी ज़िन्दगी मुफलिसी में थी। जब लोगों ने मेरे सपने को पाने में रूकावट पैदा की। उससे आज भी जूझता हूँ मगर जिस ख़ूबसूरती से अस्मिता थिएटर के अभिनेता गौरव मिश्रा ने हानूश का किरदार किया, उसके मन की पीड़ा, उसका लगाव उस घडी के साथ दिखाया, वो काबिल-ए-तारीफ है।

ये घड़ी सिर्फ एक सांकेतिक प्रदर्शन है, घड़ी की जगह आप कुछ भी कह सकते है, वो आपका सपना हो सकता है, आपका प्यार हो सकता है, या कुछ और। आप अपने जीवन में जो भी करना चाहे वो पा सकते है, अगर आप उस सपने को, उस इच्छा को अपना सर्वस्व दे दें। जिस प्रकार हानूश ने मुफलिसी में १३ साल गुज़ार दिए, मगर अपने सपने को ओझल ना होने दिया, उसके पूरा हो जाने के बाद अपनी आँखों से भी महरूम हो गया, मगर घड़ी बनाने की चाह और उसकी टिक-टिक से उसका कभी मन नहीं भरा।

जब आप कुछ नया करना चाहते है तो तकलीफ़े आती ही है, ठीक वैसे ही जैसे हानूश एक ताले बनाने वाले से, एक घड़ी बनाने वाला बनने की कोशिश करने लगा और इसके लिए हर चीज़ को कुर्बान करने पर आमादा था। एक बड़ी सीख है इस कहानी में की गर आप कुछ पूरे दिल से करना चाहते है तो उसके लिए जोख़िम उठाना ही पड़ेगा और आपको उसके लिए तैयार रहना ही पड़ेगा। हानूश के पादरी भाई में भी एक बात थी। वो कहता है की उसने ड़र-ड़र कर ही जीवन बिताया है, और उसका जीवन बुरी तरह नहीं बीता है, वही दूसरी ओर उसका भाई है जो सब कुछ लुटा देने को तैयार है अपने सपने को पाने के लिए। एक ओर वो भाई है जो लोगों की परवाह करता है, और दूसरा जो सबसे बेखबर सिर्फ चिड़िया की आँख पर ध्यान लगाए हुए है।

जब गौरव मिश्रा ने वो किरदार किया और वो स्टेज पर आए तो मुझे लगा जैसे मैं भी स्टेज पर हूँ, मैं भी वही कह रहा हूँ जो वो कह रहे है, उनकी बातों ने मुझे अपने दिन याद करा दिए।

यक़ीनी तौर पर मैं भीष्म साहनी जी, गौरव मिश्रा जी, और अरविन्द गौड़ साहब को बहुत बहुत शुक्रिया कहना चाहूँगा की उन्होंने इतने अद्भुत नाटक को मंच पर प्रस्तुत किया।

Sunday, 12 April 2015

मुफलिसी भी कमाल है

मुफलिसी भी कमाल है,
ये दौर बहुत बेमिसाल है,
उतरते है नकाब चेहरों से,
जब आप होते कंगाल है,
मुफलिसी भी कमाल है,

इस दौर की क्या सुनाए,
साथी दूर होकर दुत्कार लगाए,
जानते हुए भी पूछे मेरा हाल है,
मुफलिसी भी कमाल है,

एतबार करने वाले दगा देते है,
बाते करते है पीछे,देख भगा देते है,
देखकर कहते है क्यों हम भटेहाल है,
मुफलिसी भी कमाल है,

मदद पूछते है तो वो भिखारी समझते है,
एक परिवार कहते थे जो, अब पराया कहते है,
शुक्र है अपना परिवार नहीं कहता की आप कंगाल है,
मुफलिसी भी कमाल है,

खामख्याली से जागा हूँ, संभल गया हूँ,
बिखरने से पहले ही मैं सिमट गया हूँ,
असली-नकली की पहचान करा दी, ये धमाल है,
मुफलिसी भी कमाल है।

- अमित शुक्ल

Saturday, 11 April 2015

पैसा ही सब कुछ है?

सच है साहब। पैसा ही सब कुछ है। ये वो बात है जो बच्चे माँ के गर्भ में ही सीख लेते है, मगर मैंने 31 साल में भी नहीं समझा। पहले मुझे लगता था की इंसान का चरित्र, उसकी परवरिश, उनके संस्कार बहुत बड़ी चीज़ है, मगर अब लगता है की नहीं, ये सब ख़ामख्याली थी। आज की दुनिया के लिए पैसा ही सब कुछ है।

बीते कुछ महीनों में जिस किस्म की पैसों की तकलीफ देखी है, ये कहना गलत नहीं होगा की ज़िन्दगी बस कुछ ऐसी ही हो चली है।

सबक सिखाकर वो पल चला गया। अब ज़िन्दगी अनुभव पर ही ज़िंदा है।

Thursday, 9 April 2015

ये बेमौसम बरसात कितनी भयानक है

http://www.nishantyadav.in/2015/03/blog-post_30.html


ये बेमौसम बरसात कितनी भयानक है 
गरजते बादल दानव जैसे हैं काले घनघोर डरावने
मै अपनी लहलहाती फसल को देख कर कितना खुश था
बिजली सी लपलपाती तलवार से इसने
मेरी फसल और मेरे अरमानो का वध किया है
बाढ़ के रेलों ने मेरे घरो को उजाड़ दिया है
झेलम ,चिनाव गंगा कोसी सब इनके साथ हो ली हैं
मैं अकेला खड़ा हूँ निशस्त्र असहाय लुटा सा
हे ! ईश्वर मेरी बर्बाद फसल उजड़े घर के तरफ देखो
जवाव दो ! क्या ये दानव तुमने भेजा है
क्या बिजली सी लपलपाती तलवार तुम्हारे म्यान की है
जवाव दो ! निरुत्तर क्यों हर बार  की तरह
हे ! ईश्वर बादलो से कहो ये लौट जाएं
झेलम से कहो ये अपने प्रवाह को कम कर ले
और यदि ये तुम्हारी चुनौती है
तो मुझे स्वीकार है
मैं धरती का पुत्र हूँ हिमालय सा मेरा साहस है
मैं हर बार गिर के उठा हूँ
मैं फिर से उठ जाऊंगा
ये फसल फिर से उगेगी ,
यदि कभी धरती पर आओ
तो मेरा जवाव लाना
क्या ये दानव तुमने भेजा है

..निशान्त यादव....

Monday, 6 April 2015

अंधेपन का कमाल देखिए

भारत चमत्कारों का देश है साहब, यहाँ हर चौक,चौराहे पर चमत्कार होते है। कभी फूल चढ़ाकर, कभी तेल तो कभी मिठाई और अगर इससे भी दिल ना भरे तो थोड़ी सी बख्शीश देकर। कभी पत्थरों को या उसके रखवालो को जो एक मंत्र पढ़कर और ५०० की पत्ती जेब में रखकर आपकी गाडी को हरा सिग्नल दे देता है।

ये वही देश है साहब जहाँ पर कुछ सालों पहले तक दर्जी का काम करने वाला लोगों को अजीब अजीब से नुस्खे बताकर, जैसे समोसे के साथ लाल चटनी खाने से कृपा आने लग जाएगी, एक अरबपति बन जाता है, और उसके वही तथाकथित भक्त भिखारी, क्योंकि गरीब तो वो पहले से ही होते है।

देखिए ना, ये वही देश है जहाँ पर बाबाओं के पास करोडो की दौलत चंद ही सालों में इकठ्ठा हो जाती है, जबकि उनके भक्तों की रही गई संपत्ति भी लुट जाती है।

यहाँ पर एक पंडित की इज़्ज़त एक प्रधानमन्त्री से ज़्यादा है क्योंकि यहाँ की राजनीति भी इनपर निर्भर होती है। दुःख की बात ये है की एक विकासशील देश में इस तरह की चीज़ से ज़्यादा बुरा क्या हो सकता है की बाबा लोग मुफ़्त में घर से खाने को कमा ले जाते है जबकि उसी जगह एक पसीने बहा कर काम करने वाला पाई पाई के लिए जद्दोजहद कर रहा होता है।

ये दुखद है की हम

'राम को मानते है, राम की नहीं मानते,
रामायण को मानते है, रामायण की नहीं मानते,
अल्लाह को मानते है, अल्लाह की नहीं मानते,
ग्रन्थ साहिब को मानते है, ग्रन्थ साहिब की नहीं मानते,
क्राइस्ट को मानते है, क्राइस्ट की नहीं मानते।

ज़रूरी है की हम अपने अंधेपन से बचे, वरना एक दिन इसी तरह हम मिट जाएँगे, क्योंकि अंध श्रद्धा नुकसान देती है।

Sunday, 5 April 2015

जो चाहूँ, सो लिखूँ

पिछले कुछ दिनों से ब्लॉग पर आने वाले कुछ साथियों ने इस बारे में अपनी प्रतिक्रिया जाहिर की है की मैं बस औरों की चीज़ें या दूसरों की कृतियाँ अपने ब्लॉग पर क्यों साझा कर रहा हूँ?

मैं ये जानना चाहता हूँ की इस प्रकार की राय रखने के लिए तो आप आज़ाद है मगर मुझपर थोपने वाले आप कौन होते है। किसी ने अच्छा लिखा है तो उसको अपने ब्लॉग पर साझा करना क्या बुरा है। क्या कोई कृति किसी की बपौती है? नहीं ना। अगर किसी को अपनी बात पूरी तरह से कहने का समय नहीं मिला या वो बात ऐसी है की उसे और लोगों तक भेजा जाए तो इसमें बुरा क्या है?

अपने मत आप अपने जीवन में लगाए, दूसरों पर नहीं।

Saturday, 28 March 2015

जितना कम सामान रहेगा / गोपालदास "नीरज"

अपने मित्र निशांत यादव के ब्लॉग से साभार।http://www.nishantyadav.in/2015/03/blog-post_11.html?m=1

श्री गोपाल दास नीरज के संग्रह " बादलो से सलाम लेता हूँ " से 

जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा

उससे मिलना नामुमक़िन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा

हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुक़सान रहेगा

जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं
मुश्क़िल में इन्सान रहेगा

‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा

Friday, 27 March 2015

ए वुमन अलोन

इतने अद्भुत अभिनय के लिए स्तब्ध और निशब्द हूँ. इस नाटक के माध्यम से स्टेरियटाइप पर सवाल उठाए गए है और अरविंद गौड़ का अद्भुत निर्देशन.

























Tuesday, 24 March 2015

किसान की पीड़ा

http://www.nishantyadav.in/2015/03/blog-post_12.html

मैं भारत का किसान हूँ
मेरी पीड़ाएँ अनंत है
अन्नदाता हूँ देवता समान 
दाता किन्तु खुद निर्धन 

इन बेमौसम बारिश और हवाओं में 
लोग पकोड़े तलते आहा वाहा करते है 
लेकिन तुमसे दूर कहीं 
किसानो के घर  चूल्हे नहीं जलते है 

इन काली निरीह रातो में 
बारिश से लिपटे हवा के झोको से 
हर पल होते वज्र घात 
खेतों में गिरी फसल
खत्म हुए गेहूं के दाने 
बिखरे सपने आने से पहले 

हर वर्ष ठगा गया हूँ में 
संसद  में बैठे झूठे पेरेकारो से 
अब फिर से पटवारी आएगा 
एक नया सर्वे करवाएगा 
हर वर्ष की तरह ...
बर्बादी को सरकारी  तराजू पर तोलेगा 
वर्षो बाद सरकारी सिक्के आएंगे 
भरे घाव फिर से कुरेद जायेंगे ........ 

                                                                                .......निशान्त यादव

Monday, 23 March 2015

एक दिन की देशभक्ति



एक दिन के लिए हम सब बहुत बड़े देशभक्त बन जाते है, सारी देशभक्ति उमड़ आती है फेसबुक, ट्विटर पर, क्योंकि आज २३ मार्च को देश के तीन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव देश के लिए फाँसी के तख्तों पर झूल गए थे।

ज़ाहिर सी बात है की उनके अतुलनीय बलिदान के लिए शब्द कम है। उन्हें नमन करने के लिए भावनाएँ शिथिल, मगर आलम देखिए की लोग आज एक दिन उमड़ पड़ते है उनकी सांकेतिक मूर्तियों को फूल माला पहनाने, ओजस्वी गीत गाने, उन्हें नमन करने के लिए समाधि स्थल पर जाकर, या गाँव जाकर, और खुद को एक सच्चा देशभक्त कहलवाने के लिए।

आलम ये है की आज एक दिन सब उनकी तस्वीरें लेंगे, चारो तरफ डालेंगे, खुद को देशभक्त का तमगा दिलवाएंगे और अगले दिन? अगले दिन इन्ही मूर्तियों और पार्कों का स्वागत कर रहे होंगे कूड़े के ढेर, गन्दगी, प्रेम में डूबे जोड़े और पंछियों की बीट। शर्म आती है ये सोचकर की हम सब ऑनलाइन भक्त बनकर रह गए है। शुक्र है की आजादी के वक़्त सोशल मीडिया नहीं था वरना हमें आज़ादी भी शायद उसी पर मिल जाती।

अगर सच में देशभक्त हो तो उनकी सोच को आत्मसात करो, उनके आदर्शों को समझो, उनके सपने कैसे साकार हो सकते है, ये सोचो, ना की अपने भाषणों में कभी उन्हें पांडिचेरी की जेल में पहुँचा कर, उनकी समाधि स्थल जाकर, सोशल मीडिया पर प्रचार और प्रोपोगंडा कर के अपनी रोटियां सेको, या उनके गाँव जाकर रोकर खुद को देशभक्त साबित करो।

शर्मनाक ये है की हम भूल गए की २३ मार्च को सिर्फ इन तीन सपूतों का ही जीवनांत नहीं हुआ था, बल्कि एक बहुत ही अद्भुत लेखक और कवि अवतार सिंह संधु'पाश' का भी खून हुआ था खालिस्तानी आतंकवादियों के द्वारा।

दिखावो पर ना जाकर, आदर्शों पर जाए, अपनी अक्ल लगाए

Wednesday, 4 March 2015

मझधार क्या है

अपने मित्र निशांत यादव के ब्लॉग से साभार।



संघर्ष पथ पर चल दिया
फिर सोच और विचार क्या
जो भी मिले स्वीकार है
यह जीत क्या वह हार क्या
संसार है सागर अगर 
इस पार क्या उस पार क्या
पानी जहाँ गहरा वहीँ
गोता लगाना है मुझे
तुम तीर को तरसा करो
मेरे लिए मझधार क्या।


आदरणीय Ashok Chakradhar की वाल से उनके पिता की ये कविता।

Tuesday, 3 March 2015

क्या बहरे हो रहे है हम?

बदलते वक़्त के साथ हमारी ज़रूरतों में भी बदलाव आया है। हम सब सिर्फ खुद पर ही ध्यान देते है। खुद के लिए सब कुछ चाहते है, मगर यदि हमें अपने लिए छोड़कर किसी और के लिए कुछ करने की इच्छा रखें तो क्या उसे धकियानूसी समझना चाहिए?

ये वही दुनिया है, वही लोग, मगर अब हमारी सोच सिर्फ खुद पर केंद्रित हो गई है। हम अपने लिए कोई भी कमी नहीं रखते, अपनों के लिए दुनिया से लड़ जाते है, मगर अगर कोई रास्ते में बेहोश मिले तो उसको मदद भी नहीं देना चाहते।

इतने व्यस्त हो गए है हम की जैसे ही हमें कोई आसपास नहीं दिखता, हम सब अपने कानो में एक यन्त्र ड़ाल लेते है जो हमें दुनिया से दूर कर देता है और हम बहरे हो जाते है।

सोचिए ज़रूर की ज़िन्दगी में इसी तरह से बहरे होकर जीना है या कुछ ऐसा करना है की जब आप ख़त्म हो, आपको ख़ुशी हो की आप बहरे नहीं थे। सोचिए।

Monday, 2 March 2015

अँधेरा छंट जायेगा

अपने मित्र निशांत यादव के ब्लॉग से साभार

रुको !  डरते क्यों हूँ इस अँधेरे से
ये तो छंट  जायेगा
नयी सुबह का हिम्मत से इंतजार करो
अंतर्मन के अँधेरे से लड़ो
देखो हर तरफ उजाला है
रात का अँधेरा तो क्षणिक है
हर रात के बाद नयी सुबह जो है
चमकते जुगनुओं को देखो
दिन के उजाले को समेटकर
अँधेरे को आइना दिखाता है वो
अँधेरे और उजाले का सफर अनवरत है
उत्साह के बाद निराशा का होना सार्थक है
जैसे असफलता के बाद सफलता का होना
ये लड़ाई अनवरत है !
कृत्रिम और मन के अंधरे से !!!

-निशांत यादव

Saturday, 28 February 2015

डूबता हुआ सूरज

डूबते हुए सूरज को कोई सलाम नहीं करता, हर किसी को लगता है की उगते सूरज में ही सारी ऊर्जा होती है। कोई अर्ध्य देता है, कोई मंत्र पढता है, कोई उसको सर आँखों पर बिठाता है। कोई उसकी रौशनी में अपने आँखों को डालकर उसकी रौशनी को अपने अंदर समेट लेना चाहता है।

मगर क्या डूबता हुआ सूरज वाकई में किसी काम का नहीं? शायद जिन्हें उठने का शौख है वो ये भूल जाते है की उगती हुई हर चीज़ का एक दिन अंत भी होता है। जो आज शिखर पर है वो कभी फर्श पर भी आएगा। शायद ये समझना ज़रूरी है की सूरज अगर डूबेगा नहीं तो समय की प्रक्रिया आगे कैसे बढ़ेगी। बिना सूरज के अस्त हुए रात नहीं आ सकती और बिना उसके आए वो सूरज जो कल डूब रहा था आज फिर से उग चुका है, उजाला करने के लिए, ज़िन्दगी देने के लिए।

ज़्यादा दूर नहीं जाता, बात साल १९९६ की है। सदी के महानायक पद्मविभूषण श्री अमिताभ बच्चन जी को एक आर्थिक समस्या हुई। ये वही था जो एक समय पर भारतीय सिनेमा का चमकता हुआ सूरज था। फिर वो वाक़या हुआ, और ये सूरज डूब गया। लोगों ने इस सूरज को अन्धकार में धकेल दिया और सोचा की अब ये सूरज कभी नहीं उगेगा मगर सूरज का तो नियम यही है। उगना, रौशनी देना, अस्त होना, रात को मौका देना और फिर आकर अपनी आभा को बिखेरना।

आखिरकार हम ये क्यों नहीं समझते की सूरज का काम ही यही है की वो अपने साथ साथ बाकियों को बजी चमकने का मौका देता है। देखिए ना, सूरज के होते हुए भी तारे टिमटिमाते है, आपके लिए शायद नहीं, मगर हक़ीक़त में वो होते है। वो खुद को अस्त करता है ताकि चाँद चमक सके, तारों की रौशनी लोगों को दिख सके। फिर भी डूबते हुए सूरज से इतनी बेरुखी क्यों?

डूबता हुआ सूरज किसी को पसंद नहीं

डूबता हुआ सूरज किसी को पसंद नहीं,
गिरता हुआ पत्थर किसी को पसंद नहीं,
वो गिर या डूब कर भी आपको निखारता है,
फिर हमको गिरने वालों की कद्र क्यों नहीं?

हारकर ही जीत सकते हो तुम ये जान लो,
फर्श से ही अर्श की है सीढ़ी ये पहचान लो,
अपनी नाकामियों से हमको प्यार क्यों नहीं?
डूबता हुआ सूरज किसी को पसंद नहीं,

गिरते हुए पत्थर को पत्थर नहीं देता सहारा,
परेशान इंसान को इंसान से नहीं मिलता सहारा,
गिरे हुए को उठाने की शक्ति का एहसास क्यों नहीं?
डूबता हुआ सूरज किसी को पसंद नहीं,

जिसने गिरे को उठाया, वो महान है,
बुरे-अच्छे वक़्त की उसको पहचान है,
इस मर्म का हमको भी एहसास क्यों नहीं?
डूबता हुआ सूरज किसी को पसंद नहीं,

जान लीजिए की ज़िन्दगी का यही काम है,
गिर कर चढ़ना, चढ़ कर गिरना दिलाता मुकाम है,
ये आसान सी बात समझना मुश्किल तो नहीं?
डूबता हुआ सूरज किसी को पसंद नहीं।
                                                                   -शुक्ल