Saturday, 31 January 2015

एक कहानी/निशा निमंत्रण/हरिवंशराय बच्चन

एक कहानी
(१)
कहानी है सृष्टि के प्रारम्भ की। पृथ्वी पर मनुष्य था, मनुष्य में हृदय था, हृदय में पूजा की भावना थी, पर देवता न थे। वह सूर्य को अर्ध्यदान देता था, अग्नि को हविष समर्प्ति कर्ता था, पर वह इतने से ही संतुष्ट न था। वह कुछ और चाहता था।
उसने ऊपर की ओर हाथ उठाकर प्रार्थना की, ’हे स्वर्ग ! तूने हमारे लिए पृथ्वी पर सब सुविधाएँ दीं, पर तूने हमारे लिए कोई देवता नहीं दिया। तू देवताओं से भरा हुआ है, हमारे लिए एक देवता भेज दे जिसे हम अपनी भेंट चढा सकें, जो हमारी भेंट पाकर मुस्कुरा सके, जो हमारे हृदय की भावनाओं को समझ सके। हमें एक साक्षात देवता भेज दे।’
पृथ्वी के बाल-काल के मनुष्य की उस प्रार्थना में इतनी सरलता थी, इतनी सत्यता थी कि स्वर्ग पसीज उठा। आकाशवाणी हुई, ’जा मंदिर बना, शरद ॠतु की पूर्णिमा को जिस समय चंद्र बिंब क्षितिज के ऊपर उठेगा उसी समय मंदिर में देवता प्रकट होंगे। जा, मंदिर बना।’ मनुष्य का हृदय आनन्द से गद्गद हो उठा। उसने स्वर्ग को बारबार प्रणाम किया।
पृथ्वी पर देवता आयेंगे!—इस प्रत्याशा ने मनुष्य के जीवन में अपरिमित स्फूर्ति भर दी। अल्पकाल में ही मन्दिर का निर्माण हो गया। चंदन का द्वार लग गया। पुजारी की नियुक्ति हो गई। शरद पूर्णिमा भी आ गई। भक्तगण सवेरे से ही जलपात्र और फूल अक्षत के थाल ले-लेकर मंदिर के चारों ओर एकत्र होने लगे। संध्या तक अपार जन समूह इकट्ठा हो गया। भक्तों की एक आँख पूर्व क्षितिज पर थी और दूसरी मंदिर के द्वार पर। पुजारी को आदेश था कि देवता के प्रकट होते ही वह शंखध्वनि करे और मंदिर के द्वार खोल दे।
पुजारी देवता की प्रतीक्षा में बैठ था—अपलक नेत्र, उत्सुक मन। सहसा देवता प्रकट हो गए। वे कितने सुंदर थे, कितने सरल थे, कितने सुकुमार थे, कितने कोमल ! देवता देवता ही थे।
बाहर भक्तों ने चंद्र बिंब देख लिया था। अगणित कंठों ने एक साथ नारे लगाए। देवता की जय ! देवता की जय !- इस महारव से दशों दिशाएँ गूँज उठीं, पर मंदिर से शंखध्वनि न सुन पड़ी।
पुजारी ने झरोखे से एक बार इस अपार जनसमूह को देखा और एक बार सुंदर, सुकुमार, सरल देवता को। पुजारी काँप उठा।
समस्त जन समूह क्रुद्ध कंठस्वर से एक साथ चिल्लाने लगा, ’मंदिर का द्वार खोलो, खोलो।’ पुजारी का हाथ कितनी बार साँकल तक जा-जाकर लौट आया।
हजारों हाथ एक साथ मंदिर के कपाट पीटने लगे, धक्के देने लगे। देखते ही देखते चंदन का द्वार टूट कर गिर पड़ा, भक्तगण मंदिर में घुस पड़े। पुजारी अपनी आँखें मूँदकर एक कोने में खड़ा हो गया।
देवता की पूजा होने लगी। बात की बात में देवता फूलों से लद गए, फूलों में छिप गए, फूलों से दब गए। रात भर भक्तगण इस पुष्प राशि को बढ़ाते रहे।
और सबेरे जब पुजारी ने फूलों को हटाया तो उसके नीचे थी देवता की लाश।

(२)
अब भी पृथ्वी पर मनुष्य था, मनुष्य में हृदय था, हृदय में पूजा की भावना थी, पर देवता न थे। अब भी वह सूर्य को अर्ध्यदान देता था, अग्नि को हविष समर्पित करता था, पर अब उसका असंतोष पहले से कहीं अधिक था। एक बार देवता की प्राप्ति ने उसकी प्यास जगा दी थी, उसकी चाह बढा दी थी। वह कुछ और चाहता था।
मनुष्य ने अपराध किया था और इस कारण लज्जित था। देवता की प्राप्ति ने उसकी प्यास जगा दी थी, उसकी चाह बढा दी थी। वह कुछ और चाहता था।
मनुष्य ने अपराध किया था और इस कारण लज्जित था। देवता की प्राप्ति स्वर्ग से ही हो सकती थी, पर वह स्वर्ग के सामने जाए किस मुँह से। उसने सोचा, स्वर्ग का हॄदय महान है, मनुष्य के एक अपराध को भी क्या वह क्षमा न करेगा।
उसने सर नीचा करके कहा, ’हे स्वर्ग, हमारा अपराध क्षमा कर, अब हमसे ऐसी भूल न होगी, हमारी फिर वही प्रार्थना है—पहले वाली।’
मनुष्य उत्तर की प्रत्याशा में खड़ा रहा। उसे कुछ भी उत्तर न मिला।
बहुत दिन बीत गए। मनुष्य ने सोचा समय सब कुछ भुला देता है, स्वर्ग से फिर प्रार्थना करनी चाहिए।
उसने हाथ जोड़कर विनय की, ’हे स्वर्ग, तू अगणित देवताओं का आवास है, हमें केवल एक देवता का प्रसाद और दे, हम उन्हें बहुत सँभाल कर रक्खेंगे।’
मनुष्य का ही स्वर दिशाओं से प्रतिध्वनित हुआ। स्वर्ग मौन रहा।
बहुत दिन फिर बीत गए। मनुष्य हार नहीं मानेगा। उसका यत्न नहीं रुकेगा। उसकी आवाज स्वर्ग को पहुँचनी होगी।
उसने दृढता के साथ खड़े होकर कहा, ’हे स्वर्ग, जब हमारे हृदय में पूजा की भावना है तो देवता पर हमारा अधिकार है। तू हमार अधिकार हमें क्यों नहीं देता?’
आकाश से गड़गड़ाहट का शब्द हुआ और कई शिला खंड़ पृथ्वी पर आ गिरे।
मनुष्य ने बड़े आश्चर्य से उन्हें देखा और मत्था ठोक कर बोला, ’वाह रे स्वर्ग, हमने तुझसे माँगा था देवता और तूने हमें भेजा है पत्थर ! पत्थर !
स्वर्ग बोला, ’हे महान मनुष्य, जबसे मैंने तेरी प्रार्थना सुनी तब से मैं एक पाँव से देवताओं के द्वार-द्वार घूमता रहा हूँ। मनुष्य की पूजा स्वीकार करने का प्रस्ताव सुनकर देवता थरथर काँपते हैं। तेरी पूजा देवताओं को अस्वीकृत नहीं, असह्य है। तेर एक पुष्प जब तेरे आत्मसमर्पण की भावना को लेकर देवता पर चढता है तो उसका भार समस्त ब्रह्मांड के भार को हल्का कर देता है। तेरा एक बूँद अर्ध्य जल जब तेरे विगलित हॄदय के अश्रुओं का प्रतीक बनकर देवता को अर्पित होता है तब सागर अपनी लघुता पर हाहाकार कर उठता है। छोटे देवों ने मुझसे क्या कहा, उसे क्या बताऊँ। देवताओं में सबसे अधिक तेजोपुंज सूर्य ने कहा था, मनुष्य पृथ्वी से मुझे जल चढाता है, मुझे भय है किसी न किसी दिन मैं अवश्य ठंढा पड़ जाऊँगा और मनुष्य किसी अन्य सूर्य की खोज करेगा। हे विशाल मानव, तेरी पूजा को सह सकने की शक्ति केवल इन पाषाणों में है।’
उसी दिन से मनुष्य ने पत्थरों को पूजना आरम्भ किया था और यह जानकर हिमालय सिहर उठा था।

Friday, 30 January 2015

चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है / आनंद बख़्शी

सुनना तो अलग था, पढ़ कर ही आँखें भर आई।

चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है
चिट्ठी आई है आई है चिट्ठी आई है
चिट्ठी है वतन से चिट्ठी आयी है
बड़े दिनों के बाद, हम बेवतनों को याद 
बड़े दिनों के बाद, हम बेवतनों को याद 
वतन की मिट्टी आई है, चिट्ठी आई है ...

ऊपर मेरा नाम लिखा हैं, अंदर ये पैगाम लिखा हैं 
ऊपर मेरा नाम लिखा हैं, अंदर ये पैगाम लिखा हैं 
ओ परदेस को जाने वाले, लौट के फिर ना आने वाले
सात समुंदर पार गया तू, हमको ज़िंदा मार गया तू
खून के रिश्ते तोड़ गया तू, आँख में आँसू छोड़ गया तू
कम खाते हैं कम सोते हैं, बहुत ज़्यादा हम रोते हैं, चिट्ठी ...

सूनी हो गईं शहर की गलियाँ, कांटे बन गईं बाग की कलियाँ 
सूनी हो गईं शहर की गलियाँ, कांटे बन गईं बाग की कलियाँ 
कहते हैं सावन के झूले, भूल गया तू हम नहीं भूले
तेरे बिन जब आई दीवाली, दीप नहीं दिल जले हैं खाली
तेरे बिन जब आई होली, पिचकारी से छूटी गोली
पीपल सूना पनघट सूना घर शमशान का बना नमूना 
पीपल सूना पनघट सूना घर शमशान का बना नमूना 
फ़सल कटी आई बैसाखी, तेरा आना रह गया बाकी, चिट्ठी ...

पहले जब तू ख़त लिखता था कागज़ में चेहरा दिखता था 
पहले जब तू ख़त लिखता था कागज़ में चेहरा दिखता था 
बंद हुआ ये मेल भी अब तो, खतम हुआ ये खेल भी अब तो
डोली में जब बैठी बहना, रस्ता देख रहे थे नैना 
डोली में जब बैठी बहना, रस्ता देख रहे थे नैना 
मैं तो बाप हूँ मेरा क्या है, तेरी माँ का हाल बुरा है
तेरी बीवी करती है सेवा, सूरत से लगती हैं बेवा
तूने पैसा बहुत कमाया, इस पैसे ने देश छुड़ाया
पंछी पिंजरा तोड़ के आजा, देश पराया छोड़ के आजा
आजा उमर बहुत है छोटी, अपने घर में भी हैं रोटी, चिट्ठी ..

Thursday, 29 January 2015

समाजसेवा से राजसेवा की ओर, पर क्या काजसेवा होगी?

अरविन्द केजरीवाल और किरण बेदी, इन दोनों को किसी परिचय की ज़रुरत नहीं है, दोनों ने अन्ना के जनलोकपाल आंदोलन को कारगर बनाने में एक अहम योगदान दिया। एक ऐसा आंदोलन जहाँ हर इंसान, या यूं कहूँ की हर भारतीय इस आंदोलन से जुड़ा था। आपको याद ही होगा जब लगभग हर भारतीय ये नारा दे रहा था,'मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना' और वो नेहरू टोपी जिसे गांधी टोपी बता दिया गया था, वास्तव में अन्ना टोपी के रूप में प्रसिद्ध हो गई थी।


वो दौर था जब केजरीवाल और बेदी दोनों ही किसी भी पार्टी में ना जाने की बात करते थे और साथ ही किसी नयी पार्टी को बनाने के भी, और दोनों एक ही सुर में गाया करते थे।

पर आज सुर बेसुरे हो गए है। आज वो एक के साथ नहीं चलते। जहाँ एक ओर केजरीवाल ने अपनी पार्टी बना ली है, वही कल तक भारतीय जनता पार्टी का विरोध करने वाली किरण बेदी ने हवा को देखते हुए सत्ताधारी लोगों से हाथ मिला लिए है और इसका फायदा भी उन्हें मिला है, उन्हें फ़ौरन ही एक टिकट भी मिल गया और दिल्ली चुनाव में वो अपनी पार्टी की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार भी। इसे कहते है पाँचों उँगलियाँ घी में। बस ड़र है की कहीं सर कढ़ाई में ना हो जाए। ये तो हकीकत है की भारतीय जनता पार्टी ने पहले जगदीश मुखी को अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार चुना था, मगर ना तो उनको जनता जानती थी और ना ही ज़्यादातर कार्यकर्ता। हाँ, विजय गोएल की बात और है, क्योंकि वो अपने बेतुके बयानों के कारण अख़बारों में थोड़ी बहुत जगह बनाने में सफल रहे थे।

49 दिनों की सरकार में केजरीवाल ने कुछ काम किया था तो वही उनके नेताओ ने उनकी मिट्टी भी पलीत की थी। अब दूसरी ओर उनकी अपनी पुरानी सहयोगी है, जिसे वो अब अवसरवादी कह रहे है। वैसे कहने को कुछ भी कहिए,'ये पब्लिक है, ये सब जानती है'। कल तक ग़लबाहे डाले घूमने वाले, आज एक दूसरे के विरोधी है। ये तो हम सब जानते है की केंद्र की सरकार भी भारतीय जनता पार्टी की है, और गर दिल्ली में भी उन्ही की सरकार होगी तो असल में बन्दूक चलेगी केंद्र से और मजबूरन दिल्ली की मुख्यमंत्री 'मनमोहन' मोड में काम कर रही होंगी।

यहाँ मैं ये स्पष्ट कर दूँ की मैं किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में नहीं कह रहा हूँ। मैं तो बस इतना कह रहा हूँ की वोट सोच समझ कर कीजिए और ज़रूर कीजिए।

Wednesday, 28 January 2015

हैरान सा ईमान वहां भी था, यहां भी!

हर घर में चिता जलती थी, लहराते थे शोले
हर शहर में शमशान वहां भी था, यहां भी!
गीता की कोई सुनता, ना कुरान की सुनता
हैरान सा ईमान वहां भी था, यहां भी!
- कैफ़ी आज़मी

Tuesday, 27 January 2015

मैंने ऐसी दुनिया जानी / हरिवंशराय बच्चन

मैंने ऐसी दुनिया जानी|

इस जगती मे रंगमंच पर
आऊँ मैं कैसे, क्या बनकर,
जाऊँ मैं कैसे, क्या बनकर-
सोचा, यत्न किया भी जी भर,
किंतु कराती नियति नटी है मुझसे बस मनमानी।
मैंने ऐसी दुनिया जानी|

आज मिले दो यही प्रणय है,
दो देहों में एक हृदय है,
एक प्राण है, एक श्वास है,
भूल गया मैं यह अभिनय है;
सबसे बढ़कर मेरे जीवन की थी यह नादानी।
मैंने ऐसी दुनिया जानी|

यह लो मेरा क्रीड़ास्थल है,
यह लो मेरा रंग-महल है,
यह लो अंतरहित मरुथल है,
ज्ञात नहीं क्या अगले पल है,
निश्चित पटाक्षेप की घटिका भी तो है अनजानी।
मैंने ऐसी दुनिया जानी|

Sunday, 25 January 2015

भारत महिमा / जयशंकर प्रसाद

हिमालय के आँगन में उसे, प्रथम किरणों का दे उपहार 
उषा ने हँस अभिनंदन किया और पहनाया हीरक-हार

जगे हम, लगे जगाने विश्व, लोक में फैला फिर आलोक 
व्योम-तम पुँज हुआ तब नष्ट, अखिल संसृति हो उठी अशोक 

विमल वाणी ने वीणा ली, कमल कोमल कर में सप्रीत 
सप्तस्वर सप्तसिंधु में उठे, छिड़ा तब मधुर साम-संगीत 

बचाकर बीज रूप से सृष्टि, नाव पर झेल प्रलय का शीत 
अरुण-केतन लेकर निज हाथ, वरुण-पथ पर हम बढ़े अभीत 

सुना है वह दधीचि का त्याग, हमारी जातीयता विकास 
पुरंदर ने पवि से है लिखा, अस्थि-युग का मेरा इतिहास 

सिंधु-सा विस्तृत और अथाह, एक निर्वासित का उत्साह 
दे रही अभी दिखाई भग्न, मग्न रत्नाकर में वह राह 

धर्म का ले लेकर जो नाम, हुआ करती बलि कर दी बंद 
हमीं ने दिया शांति-संदेश, सुखी होते देकर आनंद 

विजय केवल लोहे की नहीं, धर्म की रही धरा पर धूम 
भिक्षु होकर रहते सम्राट, दया दिखलाते घर-घर घूम 

यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि 
मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि 

किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं 
हमारी जन्मभूमि थी यहीं, कहीं से हम आए थे नहीं 

जातियों का उत्थान-पतन, आँधियाँ, झड़ी, प्रचंड समीर 
खड़े देखा, झेला हँसते, प्रलय में पले हुए हम वीर 

चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा संपन्न 
हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न 

हमारे संचय में था दान, अतिथि थे सदा हमारे देव 
वचन में सत्य, हृदय में तेज, प्रतिज्ञा मे रहती थी टेव 

वही है रक्त, वही है देश, वही साहस है, वैसा ज्ञान 
वही है शांति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आर्य-संतान 

जियें तो सदा इसी के लिए, यही अभिमान रहे यह हर्ष
निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष

Saturday, 24 January 2015

Friday, 23 January 2015

भगवान की बिक्री / रामधारी सिंह "दिनकर"

लोगे कोई भगवान? टके में दो दूँगा।
लोगे कोई भगवान? बड़ा अलबेला है।
साधना-फकीरी नहीं, खूब खाओ, पूजो,
भगवान नहीं, असली सोने का ढेला है।

Thursday, 22 January 2015

जबाँ/ अमित शुक्ल

ये कविता एकाएक मेरे जहन में आई कुछ ख्यालों का मूर्त रूप है। आनंद उठाइए।

जबाँ,
है नहीं हड्डियाँ इसमें पर,
रिश्तों को तोड़ने का दम रखती है,
सोच समझ कर बोलिए क्योंकि,
सोचने का काम नहीं करती है,

क्या दिल में, क्या दिमाग में,
ये दोनों की खबर रखती है,
ज़िन्दगी के नाज़ुक डोर को,
मरोड़ने का हुनर रखती है।

Wednesday, 21 January 2015

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में / बशीर बद्र

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में
और जाम टूटेंगे इस शराब-ख़ाने में
मौसमों के आने में मौसमों के जाने में
हर धड़कते पत्थर को लोग दिल समझते हैं
उम्र बीत जाती है दिल को दिल बनाने में
फ़ाख़्ता की मजबूरी ये भी कह नहीं सकती
कौन साँप रहता है उसके आशियाने में
दूसरी कोई लड़की ज़िन्दगी में आयेगी
कितनी देर लगती है उसको भूल जाने में 

Tuesday, 20 January 2015

साधो, देखो जग बौराना / कबीर

साधो, देखो जग बौराना ।
साँची कही तो मारन धावै, झूठे जग पतियाना ।
हिन्दू कहत,राम हमारा, मुसलमान रहमाना ।
आपस में दौऊ लड़ै मरत हैं, मरम कोई नहिं जाना ।
बहुत मिले मोहि नेमी, धर्मी, प्रात करे असनाना ।
आतम-छाँड़ि पषानै पूजै, तिनका थोथा ज्ञाना ।
आसन मारि डिंभ धरि बैठे, मन में बहुत गुमाना ।
पीपर-पाथर पूजन लागे, तीरथ-बरत भुलाना ।
माला पहिरे, टोपी पहिरे छाप-तिलक अनुमाना ।
साखी सब्दै गावत भूले, आतम खबर न जाना ।
घर-घर मंत्र जो देन फिरत हैं, माया के अभिमाना ।
गुरुवा सहित सिष्य सब बूढ़े, अन्तकाल पछिताना ।
बहुतक देखे पीर-औलिया, पढ़ै किताब-कुराना ।
करै मुरीद, कबर बतलावैं, उनहूँ खुदा न जाना ।
हिन्दू की दया, मेहर तुरकन की, दोनों घर से भागी ।
वह करै जिबह, वो झटका मारे, आग दोऊ घर लागी ।
या विधि हँसत चलत है, हमको आप कहावै स्याना ।
कहै कबीर सुनो भाई साधो, इनमें कौन दिवाना ।

Monday, 19 January 2015

हर ओर कलियुग के चरण / भारत भूषण

हर ओर कलियुग के चरण
मन स्मरणकर अशरण शरण।

धरती रंभाती गाय सी
अन्तोन्मुखी की हाय सी
संवेदना असहाय सी
आतंकमय वातावरण।

प्रत्येक क्षण विष दंश है
हर दिवस अधिक नृशंस है
व्याकुल परम् मनु वंश है
जीवन हुआ जाता मरण।

सब धर्म गंधक हो गये
सब लक्ष्य तन तक हो गये
सद्भाव बन्धक हो गये
असमाप्त तम का अवतरण।

Sunday, 18 January 2015

अग्निपथ / हरिवंश राय बच्चन

वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
माँग मत, माँग मत, माँग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

तू न थकेगा कभी,
तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

Saturday, 17 January 2015

उसे यह फ़िक्र है हरदम / भगतसिंह

उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?
दहर से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही,
आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमान हूँ,
ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।
मेरी हवाओं में रहेगी,
ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,
रहे रहे न रहे।

Friday, 16 January 2015

नर हो, न निराश करो मन को / मैथिलीशरण गुप्त

बचपन में इस कविता को कितना गाता था मैं, इसका कितना पाठ किया है ये याद नहीं, मगर कुछ जानने वाले कहते है की दिन में हर वक़्त बस मैं इस कविता को कहता रहता था और एक और भी: 'कोशिश करने वालों की हार नहीं होती'

नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को

प्रभु ने तुमको दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को 

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के 
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को 

करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो