Thursday, 29 January 2015

समाजसेवा से राजसेवा की ओर, पर क्या काजसेवा होगी?

अरविन्द केजरीवाल और किरण बेदी, इन दोनों को किसी परिचय की ज़रुरत नहीं है, दोनों ने अन्ना के जनलोकपाल आंदोलन को कारगर बनाने में एक अहम योगदान दिया। एक ऐसा आंदोलन जहाँ हर इंसान, या यूं कहूँ की हर भारतीय इस आंदोलन से जुड़ा था। आपको याद ही होगा जब लगभग हर भारतीय ये नारा दे रहा था,'मैं भी अन्ना, तू भी अन्ना, अब तो सारा देश है अन्ना' और वो नेहरू टोपी जिसे गांधी टोपी बता दिया गया था, वास्तव में अन्ना टोपी के रूप में प्रसिद्ध हो गई थी।


वो दौर था जब केजरीवाल और बेदी दोनों ही किसी भी पार्टी में ना जाने की बात करते थे और साथ ही किसी नयी पार्टी को बनाने के भी, और दोनों एक ही सुर में गाया करते थे।

पर आज सुर बेसुरे हो गए है। आज वो एक के साथ नहीं चलते। जहाँ एक ओर केजरीवाल ने अपनी पार्टी बना ली है, वही कल तक भारतीय जनता पार्टी का विरोध करने वाली किरण बेदी ने हवा को देखते हुए सत्ताधारी लोगों से हाथ मिला लिए है और इसका फायदा भी उन्हें मिला है, उन्हें फ़ौरन ही एक टिकट भी मिल गया और दिल्ली चुनाव में वो अपनी पार्टी की मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार भी। इसे कहते है पाँचों उँगलियाँ घी में। बस ड़र है की कहीं सर कढ़ाई में ना हो जाए। ये तो हकीकत है की भारतीय जनता पार्टी ने पहले जगदीश मुखी को अपना मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार चुना था, मगर ना तो उनको जनता जानती थी और ना ही ज़्यादातर कार्यकर्ता। हाँ, विजय गोएल की बात और है, क्योंकि वो अपने बेतुके बयानों के कारण अख़बारों में थोड़ी बहुत जगह बनाने में सफल रहे थे।

49 दिनों की सरकार में केजरीवाल ने कुछ काम किया था तो वही उनके नेताओ ने उनकी मिट्टी भी पलीत की थी। अब दूसरी ओर उनकी अपनी पुरानी सहयोगी है, जिसे वो अब अवसरवादी कह रहे है। वैसे कहने को कुछ भी कहिए,'ये पब्लिक है, ये सब जानती है'। कल तक ग़लबाहे डाले घूमने वाले, आज एक दूसरे के विरोधी है। ये तो हम सब जानते है की केंद्र की सरकार भी भारतीय जनता पार्टी की है, और गर दिल्ली में भी उन्ही की सरकार होगी तो असल में बन्दूक चलेगी केंद्र से और मजबूरन दिल्ली की मुख्यमंत्री 'मनमोहन' मोड में काम कर रही होंगी।

यहाँ मैं ये स्पष्ट कर दूँ की मैं किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष में नहीं कह रहा हूँ। मैं तो बस इतना कह रहा हूँ की वोट सोच समझ कर कीजिए और ज़रूर कीजिए।

Friday, 23 January 2015

भगवान की बिक्री / रामधारी सिंह "दिनकर"

लोगे कोई भगवान? टके में दो दूँगा।
लोगे कोई भगवान? बड़ा अलबेला है।
साधना-फकीरी नहीं, खूब खाओ, पूजो,
भगवान नहीं, असली सोने का ढेला है।

Thursday, 22 January 2015

जबाँ/ अमित शुक्ल

ये कविता एकाएक मेरे जहन में आई कुछ ख्यालों का मूर्त रूप है। आनंद उठाइए।

जबाँ,
है नहीं हड्डियाँ इसमें पर,
रिश्तों को तोड़ने का दम रखती है,
सोच समझ कर बोलिए क्योंकि,
सोचने का काम नहीं करती है,

क्या दिल में, क्या दिमाग में,
ये दोनों की खबर रखती है,
ज़िन्दगी के नाज़ुक डोर को,
मरोड़ने का हुनर रखती है।

Saturday, 17 January 2015

उसे यह फ़िक्र है हरदम / भगतसिंह

उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?
दहर से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही,
आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमान हूँ,
ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।
मेरी हवाओं में रहेगी,
ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,
रहे रहे न रहे।

Friday, 2 January 2015

पी के का विरोध क्यों?


जो लोग इस वक़्त फिल्म का विरोध कर रहे है उन्हें ये समझना चाहिए की ये एक फिल्म है, सिर्फ एक फिल्म जिसमे आपकी रूढ़िवादी सोच और दकियानूसी भरे खयालातों से पर्दा हटाने की कोशिश की गयीहै, मगर हम हिंदुस्तानी है, और ख़ास तौर पर इंसान है, इसलिए हमें कोई भी अच्छी बात या परिवर्तन हमेशा ही बुरा लगता है.

पहले पहल तो हमें ये समझने की ज़रुरत है की इस फिल्म में सिर्फ उस मुद्दे को उठाने का प्रयास किया गया है, जिसके तहत आपको आपकी रूढ़िवादी सोच को बदलना पड़े, मगर हम हैं की धाक के तीन पात ही रहना चाहते है. हमें कभी भी सही चीज़ें पसंद नही.

उस फिल्म में कहाँ आपके किसी भी भगवान या खुद या किसी और धर्म की अवहेलना की गई, मगर कुछ धूर्त लोग है जो इस फिल्म के बारे में दुष्प्रचार कर रहे है. ज़रुरत है की वो मूर्ख लोग इस फिल्म को देखें और इतने अद्भुत मैसेज को देखे और समझे।