Saturday, 28 March 2015

जितना कम सामान रहेगा / गोपालदास "नीरज"

अपने मित्र निशांत यादव के ब्लॉग से साभार।http://www.nishantyadav.in/2015/03/blog-post_11.html?m=1

श्री गोपाल दास नीरज के संग्रह " बादलो से सलाम लेता हूँ " से 

जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा

उससे मिलना नामुमक़िन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा

हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुक़सान रहेगा

जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं
मुश्क़िल में इन्सान रहेगा

‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा

Friday, 27 March 2015

ए वुमन अलोन

इतने अद्भुत अभिनय के लिए स्तब्ध और निशब्द हूँ. इस नाटक के माध्यम से स्टेरियटाइप पर सवाल उठाए गए है और अरविंद गौड़ का अद्भुत निर्देशन.

























Tuesday, 24 March 2015

किसान की पीड़ा

http://www.nishantyadav.in/2015/03/blog-post_12.html

मैं भारत का किसान हूँ
मेरी पीड़ाएँ अनंत है
अन्नदाता हूँ देवता समान 
दाता किन्तु खुद निर्धन 

इन बेमौसम बारिश और हवाओं में 
लोग पकोड़े तलते आहा वाहा करते है 
लेकिन तुमसे दूर कहीं 
किसानो के घर  चूल्हे नहीं जलते है 

इन काली निरीह रातो में 
बारिश से लिपटे हवा के झोको से 
हर पल होते वज्र घात 
खेतों में गिरी फसल
खत्म हुए गेहूं के दाने 
बिखरे सपने आने से पहले 

हर वर्ष ठगा गया हूँ में 
संसद  में बैठे झूठे पेरेकारो से 
अब फिर से पटवारी आएगा 
एक नया सर्वे करवाएगा 
हर वर्ष की तरह ...
बर्बादी को सरकारी  तराजू पर तोलेगा 
वर्षो बाद सरकारी सिक्के आएंगे 
भरे घाव फिर से कुरेद जायेंगे ........ 

                                                                                .......निशान्त यादव

Monday, 23 March 2015

एक दिन की देशभक्ति



एक दिन के लिए हम सब बहुत बड़े देशभक्त बन जाते है, सारी देशभक्ति उमड़ आती है फेसबुक, ट्विटर पर, क्योंकि आज २३ मार्च को देश के तीन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव देश के लिए फाँसी के तख्तों पर झूल गए थे।

ज़ाहिर सी बात है की उनके अतुलनीय बलिदान के लिए शब्द कम है। उन्हें नमन करने के लिए भावनाएँ शिथिल, मगर आलम देखिए की लोग आज एक दिन उमड़ पड़ते है उनकी सांकेतिक मूर्तियों को फूल माला पहनाने, ओजस्वी गीत गाने, उन्हें नमन करने के लिए समाधि स्थल पर जाकर, या गाँव जाकर, और खुद को एक सच्चा देशभक्त कहलवाने के लिए।

आलम ये है की आज एक दिन सब उनकी तस्वीरें लेंगे, चारो तरफ डालेंगे, खुद को देशभक्त का तमगा दिलवाएंगे और अगले दिन? अगले दिन इन्ही मूर्तियों और पार्कों का स्वागत कर रहे होंगे कूड़े के ढेर, गन्दगी, प्रेम में डूबे जोड़े और पंछियों की बीट। शर्म आती है ये सोचकर की हम सब ऑनलाइन भक्त बनकर रह गए है। शुक्र है की आजादी के वक़्त सोशल मीडिया नहीं था वरना हमें आज़ादी भी शायद उसी पर मिल जाती।

अगर सच में देशभक्त हो तो उनकी सोच को आत्मसात करो, उनके आदर्शों को समझो, उनके सपने कैसे साकार हो सकते है, ये सोचो, ना की अपने भाषणों में कभी उन्हें पांडिचेरी की जेल में पहुँचा कर, उनकी समाधि स्थल जाकर, सोशल मीडिया पर प्रचार और प्रोपोगंडा कर के अपनी रोटियां सेको, या उनके गाँव जाकर रोकर खुद को देशभक्त साबित करो।

शर्मनाक ये है की हम भूल गए की २३ मार्च को सिर्फ इन तीन सपूतों का ही जीवनांत नहीं हुआ था, बल्कि एक बहुत ही अद्भुत लेखक और कवि अवतार सिंह संधु'पाश' का भी खून हुआ था खालिस्तानी आतंकवादियों के द्वारा।

दिखावो पर ना जाकर, आदर्शों पर जाए, अपनी अक्ल लगाए

Wednesday, 4 March 2015

मझधार क्या है

अपने मित्र निशांत यादव के ब्लॉग से साभार।



संघर्ष पथ पर चल दिया
फिर सोच और विचार क्या
जो भी मिले स्वीकार है
यह जीत क्या वह हार क्या
संसार है सागर अगर 
इस पार क्या उस पार क्या
पानी जहाँ गहरा वहीँ
गोता लगाना है मुझे
तुम तीर को तरसा करो
मेरे लिए मझधार क्या।


आदरणीय Ashok Chakradhar की वाल से उनके पिता की ये कविता।

Tuesday, 3 March 2015

क्या बहरे हो रहे है हम?

बदलते वक़्त के साथ हमारी ज़रूरतों में भी बदलाव आया है। हम सब सिर्फ खुद पर ही ध्यान देते है। खुद के लिए सब कुछ चाहते है, मगर यदि हमें अपने लिए छोड़कर किसी और के लिए कुछ करने की इच्छा रखें तो क्या उसे धकियानूसी समझना चाहिए?

ये वही दुनिया है, वही लोग, मगर अब हमारी सोच सिर्फ खुद पर केंद्रित हो गई है। हम अपने लिए कोई भी कमी नहीं रखते, अपनों के लिए दुनिया से लड़ जाते है, मगर अगर कोई रास्ते में बेहोश मिले तो उसको मदद भी नहीं देना चाहते।

इतने व्यस्त हो गए है हम की जैसे ही हमें कोई आसपास नहीं दिखता, हम सब अपने कानो में एक यन्त्र ड़ाल लेते है जो हमें दुनिया से दूर कर देता है और हम बहरे हो जाते है।

सोचिए ज़रूर की ज़िन्दगी में इसी तरह से बहरे होकर जीना है या कुछ ऐसा करना है की जब आप ख़त्म हो, आपको ख़ुशी हो की आप बहरे नहीं थे। सोचिए।

Monday, 2 March 2015

अँधेरा छंट जायेगा

अपने मित्र निशांत यादव के ब्लॉग से साभार

रुको !  डरते क्यों हूँ इस अँधेरे से
ये तो छंट  जायेगा
नयी सुबह का हिम्मत से इंतजार करो
अंतर्मन के अँधेरे से लड़ो
देखो हर तरफ उजाला है
रात का अँधेरा तो क्षणिक है
हर रात के बाद नयी सुबह जो है
चमकते जुगनुओं को देखो
दिन के उजाले को समेटकर
अँधेरे को आइना दिखाता है वो
अँधेरे और उजाले का सफर अनवरत है
उत्साह के बाद निराशा का होना सार्थक है
जैसे असफलता के बाद सफलता का होना
ये लड़ाई अनवरत है !
कृत्रिम और मन के अंधरे से !!!

-निशांत यादव