Tuesday, 31 March 2015

आदमी जानवर है

साभार : http://hindizen.com/men-vs-beasts/

(चित्र स्वेच्छा अनुसार)

आदमी कुछ भी कर सकता है, कुछ भी. मैं इसपर यकीन करता हूं. यही वज़ह है कि जब ईराक में लोगों के सर काटे जाने लगे तब मुझे बिलकुल हैरत नहीं हुई. यह सब देखकर यहाँ लोगों के दिल दहल गए और वे चिल्लाने लगे “सर काट दिए! धड़ से अलग कर दिए”! लेकिन हम किस बात पर अचरज करें!? यह मानव स्वभाव की अतियों का एक और नमूना ही तो है! और किसे परवाह है कि ओकलाहोमा के किसी इंजीनियर का सर काट दिया गया? होता है यार! जैक, तुम अपना सर नहीं कटवाना चाहते हो तो ओक्लाहोमा में ही रहना, बाहर मत निकलना! जहाँ तक मेरी जानकारी है वे लोग ओकलाहोमा में सर नहीं काट रहे हैं. लेकिन एक बात मैं ज़रूर कहूँगा : जैक, यदि तुम एक बन्दूक लोड करके धडधडाते हुए किसी के मुल्क में घुस जाते हो तो तुम्हें बदले की कार्रवाई के लिए तैयार रहना चाहिए. कुछ मामलों में लोग अपना आपा खो देते हैं. और मैं तुमसे कहता हूँ कि… ये कोई शब्दाडम्बर नहीं बल्कि नैतिक प्रश्न है जिसका मैं उत्तर ढूंढ रहा हूँ कि एक या दो, तीन, पांच, या दस आदमियों का सर धड़ से अलग कर देने में और किसी अस्पताल पर बमों की बारिश करके दर्जनों बीमार बच्चों की जान ले लेने में कितना अंतर है? क्या तुम्हें किसी ने कभी बताया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? अब अगर तुम यह सोच रहे हो कि मैं सर काट देने या यातना देने की और दूसरी घटनाओं में इतनी रुचि क्यों ले रहा हूँ मैं कहूँगा कि इन सब वाकयात से मेरी यह सोच पक्की होती जाती है कि इंसान असल में एक दरिन्दे जानवर से कोई ख़ास बेहतर नहीं है. तुम भी सतह तक जाकर देखो तो यही पाओगे कि इंसान और एक जंगली जानवर में कोई ख़ास अंतर नहीं है. जंगली दरिन्दे! आज से पच्चीस हजार साल पहले रहने वाले क्रो मैगनन आदिमानव से बेहतर नहीं. बिलकुल नहीं. पिछले एक लाख सालों में हमारे डीएनए में कोई ख़ास अंतर नहीं आया है. हम अभी भी अपने निचले मष्तिष्क द्वारा नियंत्रित होते हैं. ठीक वैसे ही जैसे सरीसृप. लड़ो या भागो. मारो या मार दिए जाओ. हमने कम्प्युटर, हवाई जहाज, पनडुब्बियाँ बनाई है और हम गीत लिखते हैं, चित्र बना सकते हैं तो हम सोचते हैं कि हम विकास की दौड़ में बहुत अग्रणी और श्रेष्ठ हो गए हैं.  लेकिन तुम जानते हो… हम इस धरती पर जंगल से बाहर ही हैं. बेसबाल कैप लगाये हुए ऑटोमैटिक गन से लैस अर्धसभ्य जानवर ही हैं हम. –जॉर्ज कार्लिन

Monday, 30 March 2015

पांच मिनट

http://hindizen.com/five-minutes/
ghost hkd

रेगिस्तान में एक आदमी के पास यमदूत आया लेकिन आदमी उसे पहचान नहीं सका और उसने उसे पानी पिलाया.
“मैं मृत्युलोक से तुम्हारे प्राण लेने आया हूँ” – यमदूत ने कहा – “लेकिन तुम अच्छे आदमी लगते हो इसलिए मैं तुम्हें पांच मिनट के लिए नियति की पुस्तक दे सकता हूँ. इतने समय में तुम जो कुछ बदलना चाहो, बदल सकते हो”.
यमदूत ने उसे नियति की पुस्तक दे दी. पुस्तक के पन्ने पलटते हुए आदमी को उसमें अपने पड़ोसियों के जीवन की झलकियाँ दिखीं. उनका खुशहाल जीवन देखकर वह ईर्ष्या और क्रोध से भर गया.
“ये लोग इतने अच्छे जीवन के हक़दार नहीं हैं” – उसने कहा, और कलम लेकर उनके भावी जीवन में भरपूर बिगाड़ कर दिया.
अंत में वह अपने जीवन के पन्नों तक भी पहुंचा. उसे अपनी मौत अगले ही पल आती दिखी. इससे पहले कि वह अपने जीवन में कोई फेरबदल कर पाता, मौत ने उसे अपने आगोश में ले लिया.
अपने जीवन के पन्नों तक पहुँचते-पहुँचते उसे मिले पांच मिनट पूरे हो चुके थे.

Sunday, 29 March 2015

मेरे साथ अत्याचार / हरिवंशराय बच्चन

मेरे साथ अत्याचार।

प्यालियाँ अगणित रसों की
सामने रख राह रोकी,
पहुँचने दी अधर तक बस आँसुओं की धार।
मेरे साथ अत्याचार।

भावना अगणित हृदय में,
कामना अगणित हृदय में,
आह को ही बस निकलने का दिया अधिकार।
मेरे साथ अत्याचार।

हर नहीं तुमने लिया क्या,
तज नहीं मैंने दिया क्या,
हाय, मेरी विपुल निधि का गीत बस प्रतिकार।
मेरे साथ अत्याचार।

Saturday, 28 March 2015

जितना कम सामान रहेगा / गोपालदास "नीरज"

अपने मित्र निशांत यादव के ब्लॉग से साभार।http://www.nishantyadav.in/2015/03/blog-post_11.html?m=1

श्री गोपाल दास नीरज के संग्रह " बादलो से सलाम लेता हूँ " से 

जितना कम सामान रहेगा
उतना सफ़र आसान रहेगा

जितनी भारी गठरी होगी
उतना तू हैरान रहेगा

उससे मिलना नामुमक़िन है
जब तक ख़ुद का ध्यान रहेगा

हाथ मिलें और दिल न मिलें
ऐसे में नुक़सान रहेगा

जब तक मन्दिर और मस्जिद हैं
मुश्क़िल में इन्सान रहेगा

‘नीरज’ तो कल यहाँ न होगा
उसका गीत-विधान रहेगा

Friday, 27 March 2015

ए वुमन अलोन

इतने अद्भुत अभिनय के लिए स्तब्ध और निशब्द हूँ. इस नाटक के माध्यम से स्टेरियटाइप पर सवाल उठाए गए है और अरविंद गौड़ का अद्भुत निर्देशन.

























Thursday, 26 March 2015

कवि की वासना / हरिवंशराय बच्चन

कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!



सृष्टि के प्रारंभ में 
मैने उषा के गाल चूमे,
बाल रवि के भाग्य वाले 
दीप्त भाल विशाल चूमे, 
प्रथम संध्या के अरुण दृग 
चूम कर मैने सुला‌ए, 
तारिका-कलि से सुसज्जित 
नव निशा के बाल चूमे, 
वायु के रसमय अधर 
पहले सके छू होठ मेरे
मृत्तिका की पुतलियो से 
आज क्या अभिसार मेरा? 
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

२ 

विगत-बाल्य वसुंधरा के
उच्च तुंग-उरोज उभरे,
तरु उगे हरिताभ पट धर
काम के धव्ज मत्त फहरे,
चपल उच्छृंखल करों ने
जो किया उत्पात उस दिन,
है हथेली पर लिखा वह,
पढ़ भले ही विश्व हहरे;
प्यास वारिधि से बुझाकर
भी रहा अतृप्त हूँ मैं,
कामिनी के कंच-कलश से
आज कैसा प्यार मेरा!
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

३ 

इन्द्रधनु पर शीश धरकर
बादलों की सेज सुखकर
सो चुका हूँ नींद भर मैं
चंचला को बाहों में भर,
दीप रवि-शशि-तारकों ने
बाहरी कुछ केलि देखी,
देख, पर, पाया न को‌ई
स्वप्न वे सुकुमार सुंदर
जो पलक पर कर निछावर
थी ग‌ई मधु यामिनी वह;
यह समाधि बनी हु‌ई है
यह न शयनागार मेरा!
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

४ 

आज मिट्टी से घिरा हूँ
पर उमंगें हैं पुरानी,
सोमरस जो पी चुका है
आज उसके हाथ पानी,
होठ प्यालों पर टिके तो
थे विवश इसके लिये वे,
प्यास का व्रत धार बैठा;
आज है मन, किन्तु मानी;
मैं नहीं हूँ देह-धर्मों से 
बिधा, जग, जान ले तू,
तन विकृत हो जाये लेकिन
मन सदा अविकार मेरा!
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

५ 

निष्परिश्रम छोड़ जिनको
मोह लेता विश्व भर को,
मानवों को, सुर-असुर को,
वृद्ध ब्रह्मा, विष्णु, हर को,
भंग कर देता तपस्या
सिद्ध, ऋषि, मुनि सत्तमों की
वे सुमन के बाण मैंने, 
ही दिये थे पंचशर को;
शक्ति रख कुछ पास अपने
ही दिया यह दान मैंने,
जीत पा‌एगा इन्हीं से
आज क्या मन मार मेरा!
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

६ 

प्राण प्राणों से सकें मिल
किस तरह, दीवार है तन,
काल है घड़ियां न गिनता,
बेड़ियों का शब्द झन-झन
वेद-लोकाचार प्रहरी
ताकते हर चाल मेरी,
बद्ध इस वातावरण में
क्या करे अभिलाष यौवन!
अल्पतम इच्छा यहां
मेरी बनी बंदी पड़ी है,
विश्व क्रीडास्थल नहीं रे
विश्व कारागार मेरा!
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

७ 

थी तृषा जब शीत जल की
खा लिये अंगार मैंने,
चीथड़ों से उस दिवस था
कर लिया श्रृंगार मैंने
राजसी पट पहनने को
जब हु‌ई इच्छा प्रबल थी,
चाह-संचय में लुटाया
था भरा भंडार मैंने;
वासना जब तीव्रतम थी
बन गया था संयमी मैं,
है रही मेरी क्षुधा ही
सर्वदा आहार मेरा!
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

८ 

कल छिड़ी, होगी ख़तम कल 
प्रेम की मेरी कहानी,
कौन हूँ मैं, जो रहेगी 
विश्व में मेरी निशानी? 
क्या किया मैंने नही जो 
कर चुका संसार अबतक? 
वृद्ध जग को क्यों अखरती 
है क्षणिक मेरी जवानी? 
मैं छिपाना जानता तो 
जग मुझे साधू समझता,
शत्रु मेरा बन गया है 
छल-रहित व्यवहार मेरा! 
कह रहा जग वासनामय 
हो रहा उद्गार मेरा!

Wednesday, 25 March 2015

मुझसे चांद कहा करता है | हरिवंशराय बच्चन

मुझसे चाँद कहा करता है

चोट कड़ी है काल प्रबल की,
उसकी मुस्कानों से हल्की,
राजमहल कितने सपनों का पल में नित्य ढहा करता है|

मुझसे चाँद कहा करता है,
तू तो है लघु मानव केवल,
पृथ्वी-तल का वासी निर्बल,
तारों का असमर्थ अश्रु भी नभ से नित्य बहा करता है।
मुझ से चाँद कहा करता है

तू अपने दुख में चिल्लाता,
आँखो देखी बात बताता,
तेरे दुख से कहीं कठिन दुख यह जग मौन सहा करता है।
मुझसे चाँद कहा करता है

Tuesday, 24 March 2015

किसान की पीड़ा

http://www.nishantyadav.in/2015/03/blog-post_12.html

मैं भारत का किसान हूँ
मेरी पीड़ाएँ अनंत है
अन्नदाता हूँ देवता समान 
दाता किन्तु खुद निर्धन 

इन बेमौसम बारिश और हवाओं में 
लोग पकोड़े तलते आहा वाहा करते है 
लेकिन तुमसे दूर कहीं 
किसानो के घर  चूल्हे नहीं जलते है 

इन काली निरीह रातो में 
बारिश से लिपटे हवा के झोको से 
हर पल होते वज्र घात 
खेतों में गिरी फसल
खत्म हुए गेहूं के दाने 
बिखरे सपने आने से पहले 

हर वर्ष ठगा गया हूँ में 
संसद  में बैठे झूठे पेरेकारो से 
अब फिर से पटवारी आएगा 
एक नया सर्वे करवाएगा 
हर वर्ष की तरह ...
बर्बादी को सरकारी  तराजू पर तोलेगा 
वर्षो बाद सरकारी सिक्के आएंगे 
भरे घाव फिर से कुरेद जायेंगे ........ 

                                                                                .......निशान्त यादव

Monday, 23 March 2015

एक दिन की देशभक्ति



एक दिन के लिए हम सब बहुत बड़े देशभक्त बन जाते है, सारी देशभक्ति उमड़ आती है फेसबुक, ट्विटर पर, क्योंकि आज २३ मार्च को देश के तीन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी शहीद भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव देश के लिए फाँसी के तख्तों पर झूल गए थे।

ज़ाहिर सी बात है की उनके अतुलनीय बलिदान के लिए शब्द कम है। उन्हें नमन करने के लिए भावनाएँ शिथिल, मगर आलम देखिए की लोग आज एक दिन उमड़ पड़ते है उनकी सांकेतिक मूर्तियों को फूल माला पहनाने, ओजस्वी गीत गाने, उन्हें नमन करने के लिए समाधि स्थल पर जाकर, या गाँव जाकर, और खुद को एक सच्चा देशभक्त कहलवाने के लिए।

आलम ये है की आज एक दिन सब उनकी तस्वीरें लेंगे, चारो तरफ डालेंगे, खुद को देशभक्त का तमगा दिलवाएंगे और अगले दिन? अगले दिन इन्ही मूर्तियों और पार्कों का स्वागत कर रहे होंगे कूड़े के ढेर, गन्दगी, प्रेम में डूबे जोड़े और पंछियों की बीट। शर्म आती है ये सोचकर की हम सब ऑनलाइन भक्त बनकर रह गए है। शुक्र है की आजादी के वक़्त सोशल मीडिया नहीं था वरना हमें आज़ादी भी शायद उसी पर मिल जाती।

अगर सच में देशभक्त हो तो उनकी सोच को आत्मसात करो, उनके आदर्शों को समझो, उनके सपने कैसे साकार हो सकते है, ये सोचो, ना की अपने भाषणों में कभी उन्हें पांडिचेरी की जेल में पहुँचा कर, उनकी समाधि स्थल जाकर, सोशल मीडिया पर प्रचार और प्रोपोगंडा कर के अपनी रोटियां सेको, या उनके गाँव जाकर रोकर खुद को देशभक्त साबित करो।

शर्मनाक ये है की हम भूल गए की २३ मार्च को सिर्फ इन तीन सपूतों का ही जीवनांत नहीं हुआ था, बल्कि एक बहुत ही अद्भुत लेखक और कवि अवतार सिंह संधु'पाश' का भी खून हुआ था खालिस्तानी आतंकवादियों के द्वारा।

दिखावो पर ना जाकर, आदर्शों पर जाए, अपनी अक्ल लगाए

Sunday, 22 March 2015

कवि का गीत / हरिवंशराय बच्चन

गीत कह इसको न दुनियाँ 
यह दुखों की माप मेरे ! 

     :१:

काम क्या समझूँ न हो यदि 
गाँठ उर की खोलने को ?
संग क्या समझूँ किसी का 
हो न मन यदि बोलने को ?
          जानता क्या क्षीण जीवन ने 
          उठाया भार कितना,
    बाट में रखता न यदि 
    उच्छ्वास अपने तोलने को ?
हैं वही उच्छ्वास कल के
आज सुखमय राग जग में,
आज मधुमय गान, कल के
दग्ध कंठ प्रलाप मेरे.
गीत कह इसको न, दुनिया,
यह दुखों की माप मेरे !

      :२: 

उच्चतम गिरि के शिखर को
लक्ष्य जब मैंने बनाया,
गर्व से उन्मत होकर
शीश मानव ने उठाया,
          ध्येय पर पहुँचा, विजय के
          नाद से संसार गूंजा,
    खूब गूंजा किंतु कोई 
    गीत का सुन स्वर न पाया;
आज कण-कण से ध्वनित
झंकार होगी नूपुरों की,
खड्ग-जीवन-धार पर अब
है उठे पद काँप मेरे. 
गीत कह इसको न, दुनिया,
यह दुखों की माप मेरे !

Saturday, 21 March 2015

लहरों का निमंत्रण/ हरिवंशराय बच्चन

तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !

     :१:
रात का अंतिम प्रहर है,
झिलमिलाते हैं सितारे ,
वक्ष पर युग बाहु बाँधे
मैं खड़ा सागर किनारे,
         वेग से बहता प्रभंजन
         केश पट मेरे उड़ाता,
    शून्य में भरता उदधि -
    उर की रहस्यमयी पुकारें;
इन पुकारों की प्रतिध्वनि 
हो रही मेरे ह्रदय में,
है प्रतिच्छायित जहाँ पर 
सिंधु का हिल्लोल कंपन .
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !

       :२:

विश्व की संपूर्ण पीड़ा
सम्मिलित हो रो रही है,
शुष्क पृथ्वी आंसुओं से 
पाँव अपने धो रही है,
          इस धरा पर जो बसी दुनिया 
          यही अनुरूप उनके--
    इस व्यथा से हो न विचलित 
    नींद सुख की सो रही है;
क्यों धरनि अबतक न गलकर
लीन जलनिधि में हो गई हो ?
देखते क्यों नेत्र कवि के
भूमि पर जड़-तुल्य जीवन ?
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !

      :३:

  जर जगत में वास कर भी 
  जर नहीं ब्यबहार कवि का,
  भावनाओं से विनिर्मित
  और ही संसार कवि का,
         बूँद से उच्छ्वास को भी 
         अनसुनी करता नहीं वह
किस तरह होती उपेक्षा -
पात्र पारावार कवि का ,
  विश्व- पीड़ा से , सुपरिचित
  हो तरल बनने, पिघलने ,
  त्याग कर आया यहाँ कवि
  स्वप्न-लोकों के प्रलोभन .
  तीर पर कैसे रुकूं मैं,
  आज लहरों में निमंत्रण  ! 

      :४:

  जिस तरह मरू के ह्रदय में
  है कहीं लहरा रहा सर ,
  जिस तरह पावस- पवन में
  है पपीहे का छुपा स्वर ,
         जिस तरह से अश्रु- आहों से
         भरी कवि की निशा में 
नींद की परियां बनातीं
कल्पना का लोक सुखकर,
  सिंधु के इस तीव्र हाहा-
  कर ने , विश्वास मेरा ,
  है छिपा रक्खा कहीं पर
  एक रस-परिपूर्ण गायन.
  तीर पर कैसे रुकूं मैं 
  आज लहरों में निमंत्रण !

      :५:

  नेत्र सहसा आज मेरे
  तम पटल के पार जाकर 
  देखते हैं रत्न- सीपी से
  बना प्रासाद सुंदर ,
         है ख जिसमें उषा ले 
         दीप कुंचित रश्मियों का ;
ज्योति में जिसकी सुनहली 
सिंधु कन्याएँ मनोहर
  गूढ़ अर्थो से भरी मुद्रा
  बनाकर गान करतीं
  और करतीं अति अलौकिक
  ताल पर उन्मत्त नर्तन .
  तीर पर कैसे रुकूं मैं
  आज लहरों में निमंत्रण !

     :६:

  मौन हो गन्धर्व बैठे 
  कर स्रवन इस गान का स्वर,
  वाद्ध्य - यंत्रो पर चलाते 
  हैं नहीं अब हाथ किन्नर,
         अप्सराओं के उठे जो 
         पग उठे ही रह गए हैं,
कर्ण उत्सुक, नेत्र अपलक 
साथ देवों के पुरंदर
  एक अदभुत और अविचल
  चित्र- सा है जान पड़ता,
  देव- बालाएँ विमानो से 
  रहीं कर पुष्प- वर्षण.
  तीर पर कैसे रुकूं मैं,
  आज लहरों में निमंत्रण !

      :७:

  दीर्घ उर में भी जलधि के 
  है नहीं खुशियाँ समाती,
  बोल सकता कुछ न उठती
  फूल बारंबार छाती;
         हर्ष रत्नागार अपना 
         कुछ दिखा सकता जगत को 
भावनाओं से भरी यदि
यह फफककर फूट जाती;
  सिंधु जिस पर गर्व करता 
  और जिसकी अर्चना को 
  स्वर्ग झुकता, क्यों न उसके 
  प्रति करे कवि अर्ध्य अर्पण .
  तीर पर कैसे रुकूं मैं,
  आज लहरों में निमंत्रण !

         :८:

   आज अपने स्वप्न को मैं 
   सच बनाना चाहता हूँ ,
   दूर कि इस कल्पना के 
   पास जाना चाहता हूँ
         चाहता हूँ तैर जाना 
         सामने अंबुधि पड़ा जो ,
कुछ विभा उस पार की
इस पार लाना चाहता हूँ;
   स्वर्ग के भी स्वप्न भू पर 
   देख उनसे दूर ही था,
   किंतु पाऊँगा नहीं कर 
   आज अपने पर नियंत्रण .
   तीर पर कैसे रुकूं मैं ,
   आज लहरों में निमंत्रण !

        :९:

   लौट आया यदि वहाँ से 
   तो यहाँ नवयुग लगेगा ,
   नव प्रभाती गान सुनकर 
   भाग्य जगती का जागेगा ,
          शुष्क जड़ता शीघ्र बदलेगी 
          सरस चैतन्यता में ,
यदि न पाया लौट , मुझको 
लाभ जीवन का मिलेगा;
   पर पहुँच ही यदि न पाया 
   ब्यर्थ क्या प्रस्थान होगा?
कर सकूंगा विश्व में फिर 
भी नए पथ का प्रदर्शन.
तीर पर कैसे रुकू मैं ,
आज लहरों में निमंत्रण ! 


      :१०:

    स्थल गया है भर पथों से 
    नाम कितनों के गिनाऊँ,
    स्थान बाकी है कहाँ पथ
    एक अपना भी बनाऊं?
          विशव तो चलता रहा है 
          थाम राह बनी-बनाई,
किंतु इस पर किस तरह मैं 
कवि चरण अपने बढ़ाऊँ?
    राह जल पर भी बनी है 
    रुढि,पर, न हुई कभी वह,
    एक तिनका भी बना सकता 
    यहाँ पर मार्ग नूतन !
    तीर पर कैसे रुकूं मैं,
    आज लहरों में निमंत्रण!

           :११:

    देखता हूँ आँख के आगे 
    नया यह क्या तमाशा --
    कर निकलकर दीर्घ जल से 
    हिल रहा करता माना- सा 
            है हथेली मध्य चित्रित 
            नीर भग्नप्राय बेड़ा!
मै इसे पहचानता हूँ ,
है नहीं क्या यह निराशा ?
    हो पड़ी उद्दाम इतनी 
    उर-उमंगें , अब न उनको 
    रोक सकता हाय निराशा का,
    न आशा का प्रवंचन.
    तीर पर कैसे रुकूं मैं ,
    आज लहरों में निमंत्रण!

         :१२: 

    पोत अगणित इन तरंगों ने 
    डुबाए मानता मैं 
    पार भी पहुचे बहुत से --
    बात यह भी जनता मैं ,
          किंतु होता सत्य यदि यह 
          भी, सभी जलयान डूबे,
पार जाने की प्रतिज्ञा 
आज बरबस ठानता मैं,
    डूबता मैं किंतु उतराता
    सदा व्यक्तित्व मेरा,
    हों युवक डूबे भले ही 
    है कभी डूबा न यौवन !
    तीर पर कैसे रुकूं मैं,
    आज लहरों में निमंत्रण !

          :१३:

    आ रहीं प्राची क्षितिज से 
    खींचने वाली सदाएं 
    मानवों के भाग्य निर्णायक 
    सितारों! दो दुआए ,
           नाव, नाविक फेर ले जा ,
           है नहीं कुछ काम इसका ,
आज लहरों से उलझने को 
फड़कती हैं भुजाएं;
     प्राप्त हो उस पार भी इस 
     पार-सा चाहे अँधेरा ,
     प्राप्त हो युग की उषा 
     चाहे लुटाती नव किरण-धन.
     तीर पर कैसे रुकूं मैं ,
     आज लहरों में निमंत्रण!