Thursday, 30 April 2015

इंसानी जीवन का सच

निशांत जी के ब्लॉग से साभार

हम  इंसान अपने बजूद को जिन्दा रखने के लिए जिंदगी भर लड़ते है एक दूसरे से लड़ते , परस्थितिओं  से लड़ते है और कभी- कभी पीढ़ी दर्द पीढ़ी लड़ते है अपने होने के बजूद हम इंसान जमा कर जाते है बिलकुल मुन्नवर राणा साहव के शेर की तरह ...

मुमकिन है मेरे बाद की नस्लें मुझे  ढूंढ़ें
बुनियाद में इस नाम का पत्थर भी लगा दो.

लेकिन ये प्रकृति जिसके गोद में हम पल रहे है ये भी चुपचाप हंसती होगी  और फिर एक दिन  एक झटके में हमारे बजूद को मिटा जाती है और हम फिर से जुट जाते अपने बजूद को बनाने में ! यही इंसानी जीवन होने का संघर्ष है हम मिटते है बनते और फिर बनते है  !!

Wednesday, 29 April 2015

लो दिन बीता लो रात गयी / हरिवंशराय बच्चन

सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा,
डूबा, संध्या आई, छाई,
सौ संध्या सी वह संध्या थी,
क्यों उठते-उठते सोचा था
दिन में होगी कुछ बात नई
लो दिन बीता, लो रात गई

धीमे-धीमे तारे निकले,
धीरे-धीरे नभ में फ़ैले,
सौ रजनी सी वह रजनी थी,
क्यों संध्या को यह सोचा था,
निशि में होगी कुछ बात नई,
लो दिन बीता, लो रात गई

चिडियाँ चहकी, कलियाँ महकी,
पूरब से फ़िर सूरज निकला,
जैसे होती थी, सुबह हुई,
क्यों सोते-सोते सोचा था,
होगी प्रात: कुछ बात नई,
लो दिन बीता, लो रात गई

Tuesday, 28 April 2015

मानव का अभिमान / पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

तुष्ट मानव का नहीं अभिमान।
जिन वनैले जंतुओं से
था कभी भयभीत होता,
भागता तन-प्राण लेकर,
सकपकाता, धैर्य खोता,
बंद कर उनको कटहरों में बना इंसान।
तुष्ट मानव का नहीं अभिमान।
प्रकृति की उन शक्तियों पर
जो उसे निरुपाय करतीं,
ज्ञान लघुता का करातीं,
सर्वथा असहाय करतीं,
बुद्धि से पूरी विजय पाकर बना बलवान।
तुष्ट मानव का नहीं अभिमान।
आज गर्वोन्मत्त होकर
विजय के रथ पर चढ़ा वह,
कुचलने को जाति अपनी
आ रहा बरबस बढ़ा वह;
मनुज करना चाहता है मनुज का अपमान।
तुष्ट मानव का नहीं अभिमान।

Monday, 27 April 2015

बाबरे मन लौट आ ...

मेरे मित्र निशांत यादव जी के ब्लॉग से साभार


बाबरे मन लौट आ आवारगी के दिन गए ।                                            
देख लंबा रास्ता , अब मस्तियों के दिन गए ।। 

राह पथरीली मिले या फ़ूल की चादर मिले ।
चल समय पर छोड़ दे , पर बाबरे मन लौट आ ।।

चुन लिया है फूल को काँटों के संग इस राह में ।
कौन जाने छोड़ दे  ...  एक  साथी वास्ता ।।

राह फूलों की चुने , सब काँटों से किसका वास्ता ।
नींद सुख की सब जियें , दुःख से है किसका वास्ता ।।

आ अंधेरो से लड़े , अब रौशनी की लौ लिए ।
चल जला दें  राह में रौशन किये लाखो दीये ।।

छोड़ दे अब साथ उसका जिसने अँधेरे दिए ।
बाबरे मन लौट आ आवारगी के दिन गए ।।

रौशनी की एक लौ है काफी ,  मन के अँधेरे तेरे लिए ।
देख फिर भी लाया हूँ मैं , आशा के लाखो दीये ।।

फिर से न विखरेगा तू , आज ये वादा तो कर ।
देख ले आया हूँ मैं, निशाँ मंजिलो के ढूंढ कर ।।

लौट आ अब देख ले , जिंदगी दरवाजे खड़ी ।
बाबरे मन लौट आ , आवारगी के दिन गए ।।

........निशान्त यादव

Sunday, 26 April 2015

हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई / पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई।

आ उजेली रात कितनी बार भागी,
सो उजेली रात कितनी बार जागी,
पर छटा उसकी कभी ऐसी न छाई;
हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई।

चाँदनी तेरे बिना जलती रही है,
वह सदा संसार को छलती रही है,
आज ही अपनी तपन उसने मिटाई;
हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई।

आज तेरे हास में मैं भी नहाया,
आज अपना ताप मैंने भी मिटाया,
मुसकराया मैं, प्रकृति जब मुसकराई;
हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई।

ओ अँधेरे पाख, क्‍या मुझको डरता,
अब प्रणय की ज्‍योति के मैं गीत गाता,
प्राण में मेरे समाई यह जुन्‍हाई;
हास में तेरे नहाई यह जुन्‍हाई।

Saturday, 25 April 2015

स्वयं पर हँसना सीखिए।


इस वीडियो से जुड़े हुए सभी अधिकार संदीप जी और उनकी टीम के पास सुरक्षित। ये प्रेरणादायक लगा, इसलिए साझा किया।

Friday, 24 April 2015

तन उजियारे, काले मन

http://www.nishantyadav.in/2015/04/blog-post_24.html

माया और काया पर निर्भर है व्यक्ति यहाँ ।
तन का रंग सब देख रहे मन के रंग से अनिभिज्ञ यहाँ ।।
माया काली ,उजियारे तन की माँग यहाँ ।
काले तन ,उजियारे मन को ले जाऊँ कहाँ ।।
हे ! कृष्ण बताओ क्या  तुमने भी झेला दंश यहाँ ।
देखो रंग, प्रेम पर भारी , हे ! कृष्ण यहाँ ।।
रंगो के इस भेद भाव में जीती दुनिया सारी ।
माया के काले  पाश बंधी दुनिया सारी ।।
हे ! शनि काला रंग अपना ले जाओ ।
या फिर माया पाश  से मुक्ति दे जाओ ।।
मन के काले जग में उजियारा मिले कहाँ ।
हे ! सूर्य कृपा कर उजियारे मन कर जाओ ।।
हे ! चंद्र रात्रि से लड़ जाओ ।
सब काले मन उजियारे से भर जाओ ।।

Thursday, 23 April 2015

बीता इकतीस बरस जीवन / हरिवंशराय बच्चन

बीता इकतीस बरस जीवन!

वे सब साथी ही हैं मेरे,
जिनको गृह-गृहिणी-शिशु घेरे,
जिनके उर में है शान्ति बसी, जिनका मुख है सुख का दर्पण!
बीता इकतीस बरस जीवन!

कब उनका भाग्य सिहाता हूँ,
उनके सुख में सुख पाता हूँ,
पर कभी-कभी उनसे अपनी तुलना कर उठता मेरा मन!
बीता इकतीस बरस जीवन!

मैं जोड़ सका यह निधि सयत्न-
खंड़ित आशाएँ, स्वप्न भग्न,
असफल प्रयोग, असफल प्रयत्न,
कुछ टूटे फूटे शब्दों में अपने टूटे दिल का क्रंदन!
बीता इकतीस बरस जीवन!

Wednesday, 22 April 2015

आगे हिम्मत करके आओ / हरिवंशराय बच्चन

आगे हिम्मत करके आओ!

मधुबाला का राग नहीं अब,
अंगूरों का बाग नहीं अब,
अब लोहे के चने मिलेंगे दाँतों को अजमाओ!
आगे हिम्मत करके आओ!

दीपक हैं नभ के अंगारे,
चलो इन्हीं के साथ सहारे,
राह? नहीं है राह यहाँ पर, अपनी राह बनाओ!
आगे हिम्मत करके आओ!

लपट लिपटने को आती है,
निर्भय अग्नि गान गाती है,
आलिंगन के भूखे प्राणी, अपने भुज फैलाओ!
आगे हिम्मत करके आओ!

Tuesday, 21 April 2015

कल भेंट होगी

आज व्यस्तता के कारण अनुपस्थित हूँ। कल भेंट होगी।

Monday, 20 April 2015

दहेज़

ये कविता मैने तब लिखी थी जब मैं ७वी या आठवी कक्षा में था। आशा करता हूँ आपको पसंद आएगी।



दहेज़
दहेज़ तूने कितनो की सेज़,
को अर्थी में बदल दिया,
कर दिया तूने कितनी,
माओ की कोख़ सूनी,
आँचल उठा के रो रही है,
अब उनकी आँखें रोनी,

क्या उनका कसूर था,
क्या उनका गुनाह था,
क्यूँ कर दिया तुमने उनके,
जीवन का ख़त्म प्रवाह था,

क्या धन ही है,
सबकुछ तुम्हारे जीवन में,
क्या स्त्री का कोई मान,
नहीं तुम्हारे जीवन में,

क्यूँ भूल जाते है हम,
की जो आज हमारी बहू है,
वह किसी की बेटी है,
और जो आज हमारी बेटी है,
कल वो भी किसी कि बहू होंगी,

क्यूँ होता है यह फर्क,
क्यूँ है ये दहेज़ का नर्क,
क्या कभी समाप्त हो पाएगा,
यह बहूँ-बेटी का फर्क,

क्या ये सोच है प्रधान,
या है ये कोरा ज्ञान,
की जो बन आई बहूँ,
वह है पैसे की खान,
क्या इस विकृत सोच से,
बना दिए है घर शमशान,

संस्कारों की बलि-वेदि पर,
कब तक होंगी बेटियाँ कुर्बान,
कब तक कल्पनीय भय से,
हम सहते रहे यह अपमान,

बदल सकता यह रूप तभी,
जब बहूँ का दर्ज़ा हो बेटी समान,
जब सिर्फ बेटी ही नहीं बल्कि,
बहूँ का भी हो सम्मान,

तब पिता भी यह कह सकेगा,
जाओ खुश रहो बिटिया रानी,
सास करेगी माँ सा प्यार,
तब सत्य होगी यह कहानी।
                                            -अमित शुक्ल


Sunday, 19 April 2015

'हे राम' - खचित यह वही चौतरा, भाई / पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

'हे राम' - खचित यह वही चौतरा, भाई,
जिस पर बापू पर ने अंतिम सेज डसाई,
जिस पर लपटों के साथ लिपट वे सोए,
गलती की हमने
जो वह आग बुझाई।

पारसी अग्नि जो फारस से लाए,
हैं आज तलक वे उसे ज्‍वलंत बनाए,
जो आग चिता पर बापू के जगी थी
था उचित उसे
हम रहते सदा जगाए।

है हमको उनकी यादगार बनवानी,
सैकड़ों सुझाव देंगे पंडित-ज्ञानी,
लेकिन यदि हम वह ज्‍वाल लगाए रहते,
होती उनकी
सबसे उपयुक्‍त
निशानी।

तम के समक्ष वे ज्‍योति एक अविचल थे,
आँधी-पानी में पड़कर अडिग-अटल थे,
तप के ज्‍वाला के अंदर पल-पल जल-जल
वे स्‍वयं अग्नि-से
अकलुष थे,
निर्मल थे।

वह ज्‍वाला हमको उनकी याद दिलाती,
वह ज्‍वाला हमको उनका पथ दिखलाती,
वह ज्‍वाला भारत के घर-घर में जाती,
संदेश अग्निमय
जन-जन को
पहुँचाती।

पुश्‍तहापुश्‍त यह आग देखने आतीं,
इससे अतीत की सुधियाँ सजग बनातीं,
भारत के अमर तपस्‍वी की इस धूनी
से ले भभूत
अपने सिर-माथ
चढ़ातीं।

पर नहीं आग की बाकी यहाँ निशानी,
प्रह्लाद-होलिका फिर घटी कहानी,
बापू ज्‍वाला से निकल अछूते आए,
मिल गई राख-
मिट्टी में चिता
भवानी।

अब तक दुहरातीं मस्जिद की मिलारें,
अब तक दुहरात‍ीं घर घर की दीवारें,
दुहराती पेड़ों की हर तरु कतारें,
दुहराते दरिया के जल-कूल-कगारे,
चप्‍पे-चप्‍पे इस राजघाट के रटते
जो लोग यहाँ थे चिता-शाम के नारे-
हो गए आज बापू अमर हमारे,
हो गए आज बापू अमर हमारे!

Saturday, 18 April 2015

आत्‍मपरिचय /पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्‍चन

मैं जग-जीवन का भार लिए फिरता हूँ,

फिर भी जीवन में प्‍यार लिए फिरता हूँ;

कर दिया किसी ने झंकृत जिनको छूकर

मैं सासों के दो तार लिए फिरता हूँ!


मैं स्‍नेह-सुरा का पान किया करता हूँ,

मैं कभी न जग का ध्‍यान किया करता हूँ,

जग पूछ रहा है उनको, जो जग की गाते,

मैं अपने मन का गान किया करता हूँ!


मैं निज उर के उद्गार लिए फिरता हूँ,

मैं निज उर के उपहार लिए फिरता हूँ;

है यह अपूर्ण संसार ने मुझको भाता

मैं स्‍वप्‍नों का संसार लिए फिरता हूँ!


मैं जला हृदय में अग्नि, दहा करता हूँ,

सुख-दुख दोनों में मग्‍न रहा करता हूँ;

जग भ्‍ाव-सागर तरने को नाव बनाए,

मैं भव मौजों पर मस्‍त बहा करता हूँ!


मैं यौवन का उन्‍माद लिए फिरता हूँ,

उन्‍मादों में अवसाद लए फिरता हूँ,

जो मुझको बाहर हँसा, रुलाती भीतर,

मैं, हाय, किसी की याद लिए फिरता हूँ!


कर यत्‍न मिटे सब, सत्‍य किसी ने जाना?

नादन वहीं है, हाय, जहाँ पर दाना!

फिर मूढ़ न क्‍या जग, जो इस पर भी सीखे?

मैं सीख रहा हूँ, सीखा ज्ञान भूलना!


मैं और, और जग और, कहाँ का नाता,

मैं बना-बना कितने जग रोज़ मिटाता;

जग जिस पृथ्‍वी पर जोड़ा करता वैभव,

मैं प्रति पग से उस पृथ्‍वी को ठुकराता!


मैं निज रोदन में राग लिए फिरता हूँ,

शीतल वाणी में आग लिए फिरता हूँ,

हों जिसपर भूपों के प्रसाद निछावर,

मैं उस खंडर का भाग लिए फिरता हूँ!


मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,

मैं फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;

क्‍यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,

मैं दुनिया का हूँ एक नया दीवाना!


मैं दीवानों का एक वेश लिए फिरता हूँ,

मैं मादकता नि:शेष लिए फिरता हूँ;

जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,

मैं मस्‍ती का संदेश लिए फिरता हूँ!

Friday, 17 April 2015

युग का जुआ / हरिवंशराय बच्चन

युग के युवा,
मत देख दाएँ,
और बाएँ, और पीछे,
झाँक मत बग़लें,
न अपनी आँख कर नीचे;
अगर कुछ देखना है,
देख अपने वे
वृषम कंधे
जिन्‍हें देता निमंत्रण
सामने तेरे पड़ा
युग का जुआ,
युग के युवा!तुझको अगर कुछ देखना है,
देख दुर्गम और गहरी
घाटियाँ
जिनमें करड़ों संकटकों के
बीच में फँसता, निकलता
यह शकट
बढ़ता हुआ
पहुँचा यहाँ है।

दोपहर की धूप में
कुछ चमचमाता-सा
दिखाई दे रहा है
घाटियों में।
यह नहीं जल,
यह नहीं हिम-खंड शीतल,
यह नहीं है संगमरमर,
यह न चाँदी, यह न सोना,
यह न कोई बेशक़ीमत धातु निर्मल।

देख इनक‍ी ओर,
माथे को झुका,
यह कीर्ति उज्‍ज्‍वल
पूज्‍य तेरे पूर्वजों की
अस्थियाँ हैं।
आज भी उनके
पराक्रमपूर्ण कंधों का
महाभारत
लिखा युग के जुए पर।
आज भी ये अस्थियाँ
मुर्दा नहीं हैं;
बोलती हैं :
"जो शकट हम
घाटियों से
ठेलकर लाए यहाँ तक,
अब हमारे वंशजों की
आन
उसको खींच ऊपर को चढ़ाएँ
चोटियों तक।"

गूँजती तेरी शिराओं में
गिरा गंभीर यदि यह,
प्रतिध्‍वनित होता अगर है
नाद नर इन अस्थियों का
आज तेरी हड्डियों में,
तो न डर,
युग के युवा,
मत देख दाएँ
और बाएँ और पीछे,
झाँक मत बग़लें,
न अपनी आँख कर नीचे;
अगर कुछ देखना है
देख अपने वे
वृषभ कंधे
जिन्‍हें देता चुनौती
सामने तेरे पड़ा
युग का जुआ।
इसको तमककर तक,
हुमककर ले उठा,
युग के युवा!

लेकिन ठहर,
यह बहुत लंबा,
बहुत मेहनत औ' मशक्‍़क़त
माँगनेवाला सफ़र है।
तै तुझे करना अगर है
तो तुझे
होगा लगाना
ज़ोर एड़ी और चोटी का बराबर,
औ' बढ़ाना
क़दम, दम से साध सीना,
और करना एक
लोहू से पसीना।
मौन भी रहना पड़ेगा;
बोलने से
प्राण का बल
क्षीण होता;
शब्‍द केवल झाग बन
घुटता रहेगा बंद मुख में।
फूलती साँसें
कहाँ पहचानती हैं
फूल-कलियों की सुरभि को
लक्ष्‍य के ऊपर
जड़ी आँखें
भला, कब देख पातीं
साज धरती का,
सजीलापन गगन का।

वत्‍स,
आ तेरे गले में
एक घंटी बाँध दूँ मैं,
जो परिश्रम
के मधुरतम
कंठ का संगीत बनाकर
प्राण-मन पुलकित करे
तेरा निरंतर,
और जिसकी
क्‍लांत औ' एकांत ध्‍वनि
तेरे कठिन संघर्ष की
बनकर कहानी
गूँजती जाए
पहाड़ी छातियों में।
अलविदा,
युग के युवा,
अपने गले में डाल तू
युग का जुआ;
इसको समझ जयमाल तू;
कवि की दुआ!

Thursday, 16 April 2015

वे आत्‍माजीवी थे काया से कहीं परे / पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

वे आत्‍माजीवी थे काया से कहीं परे,
वे गोली खाकर और जी उठे, नहीं मरे,
जब तक तन से चढ़काचिता हो गया राख-घूर,
तब से आत्‍मा
की और महत्‍ता
जना गए।
उनके जीवन में था ऐसा जादू का रस,
कर लेते थे वे कोटि-कोटि को अपने बस,
उनका प्रभाव हो नहीं सकेगा कभी दूर,
जाते-जाते
बलि-रक्‍त-सुरा
वे छना गए।
यह झूठ कि, माता, तेरा आज सुहाग लुटा,
यह झूठ कि तेरे माथे का सिंदूर छुटा,
अपने माणिक लोहू से तेरी माँग पूर
वे अचल सुहागिन
तुझे अभागिन,
बना गए।

Wednesday, 15 April 2015

किसान पस्त, पी.एम. मस्त


ये २०१५ का भारत है साहब, जी हाँ, वही भारत जिसमे अच्छे दिन लाने का सपना लोगबाग को दिखाकर मोदी साहब देश के प्रधानमन्त्री बन गए। प्रधानमंत्री मतलब देश का केंद्र बिंदु। प्रधानमंत्री मतलब लोगों की तकलीफों को समझने वाला, उनका निवारण करने के तरीके बनाने वाला, मगर क्या ऐसा है?

पिछले कुछ वक़्त का हाल देखें तो ये साबित हो जाता है की देश में उसके अन्नदाता को उचित मूल्य नहीं मिल रहा है। जो किसान कभी लोगो की पेट की आग बुझाने के लिए दिन-रात,सुबह-शाम अपने खेतों में काम करते थे वो अब इस ख्याल से ख़ौफ़ज़दा है की कहीं बिगड़े मौसम और सरकार की अनदेखी के कारण वो अपने लगाए हुए पैसे भी पा पाएँगे या नहीं?

जी हाँ, शायद आपको इस बात का अंदाजा नहीं होगा की पहले तो ये किसान अपनी जमा पूँजी लगाकर अपने खेतों में फ़सल उगाते है, फिर उसे मिल में जमा करा देते है, क्योंकि वो एक वक़्त के बाद ही उन्हें पैसा देते है, और वो भी कौड़ियों के भाव। इस साल किसानों को लगभग ३ रूपए पर किलो का भाव मिल रहा है, जो की इस अन्नदाता के लिए एक तमाचा ही है।

आखिर जिसने अपना खून पसीना लगाकर इसको उगाया है उसे ही उसकी चीज़ से महरूम कर दिया जाए तो ये गलत होगा या नहीं? इस पर कमाल ये की जब ये किसान अपना हक़ लेने सरकारी अधिकारी के पास जाते है, तो उनसे रिश्वत मांगी जाती है, और मुआवज़े के नाम पर मिलता कुछ नहीं।

'कल तक जो अन्नदाता था, वो आज भिखारी बना बैठा है,
है किसान का ख्याल नहीं, ये कौन उल्लू सरताज बना बैठा है।'- शुक्ल

आगे शायद कहने की ज़रुरत नहीं की इतने बुरे वक़्त में, जब देश के प्रधानमन्त्री को स्वदेश में होना चाहिए, वो विदेश की सैर कर रहे है, बड़े बड़े होटलों में खाना खा रहे है, और किसान भूखों मर रहा है, या खुद को मार रहा है, क़र्ज़ के कारण, मुफलिसी के कारण।

उम्मीद है की इस बार राशन खराब नहीं किया जाएगा, या खुले में सड़ने को नहीं ड़ाल दिया जाएगा।

Tuesday, 14 April 2015

अम्बेडकर-गाँधी के विचारों का मंचन

आज बाबासाहेब की जयंती है। आज बहुत से कार्यक्रम होंगे, मगर कल देर शाम अस्मिता थिएटर द्वारा जे.एन.यू. में राजेश कुमार द्वारा लिखित 'अम्बेडकर और गाँधी' का मंचन किया गया। मैं भी वहाँ कल दर्शक दीर्घा में था और सोच रहा था की इन दो महान हस्तियों के चरित्रों को एक साथ एक मंच पर देखना या दिखाना बहुत ही अनूठा अनुभव होगा।

यकीन मानिए मेरा अंदाज़ा गलत नहीं था। अस्मिता के वरिष्ठ अभिनेता बजरंगबली सिंह ने जैसे ही स्टेज पर बाबा साहब का चरित्र निभाना शुरू किया, मेरे रोंगटे खड़े हो गए।

एक अद्भुत वार्तालाप का माहौल बन गया, जिसमे बापू और बाबा साहब के बीच अश्पृश्यता के मुद्दे पर बहस शुरू हुई, एक बातचीत, विचारों का आदान प्रदान आरम्भ हुआ। वो बातचीत, जिसमे अस्पृश्यता को मिटाने की बातचीत थी, वर्ण व्यवस्था पर मतभेद था।

यकीनी तौर पर दोनों ही लोग बहुत ही शक्तिशाली प्रतीत होते है, मगर ये कहना गलत नहीं होगा की बाबासाहब वाकई में बहुत ही शक्तिशाली लगते है। इसका ये तात्पर्य नहीं की बापू कहीं से कमज़ोर थे, वो बस अपने विचारों को बहुत ही अलग रूप से प्रस्तुत करते थे।

रमाबाई का किरदार कर रही शिल्पी मारवाह का संवाद बहुत ही सुन्दर था,ख़ासतौर पर,

'आज तक महात्मा लोगों के प्राण बचाते थे, आप तो स्वयं महात्मा के प्राण बचाने जा रहे है।'

बाबासाहेब के इतने सारे और शक्तिशाली संवाद है की यदि उन्हें लिखने बैठा, तो रात से सुबह हो जाएगी। बापू के रूप में गौरव मिश्रा जी ने ये फिर साबित किया है की आप किसी भी किरदार में जान फूँक देते है। बापू का सधा हुआ चरित्र और व्यक्तित्व निभाने में उन्होंने कमाल कर दिया है।

सिर्फ नाटक के अंतिम संवाद पर मुझे थोडा सा कहना है, की बाबासाहेब ने बापू की मृत्यु के लिए हत्या शब्द का इस्तेमाल शायद कभी भी अपनी लेखनी और बातों में नहीं किया है, किन्तु नाटक के अंतिम संवाद में 'हत्या' शब्द का इस्तेमाल किया गया है। यदि लेखक और निर्देशक इसपर ध्यान दे दें तो अति कृपा होगी।

Monday, 13 April 2015

हानूश की कहानी, मेरी ज़बानी

हानूश की कहानी देखने और पढ़ने में एक आम सी कहानी लगती है मगर ध्यान देने पर लगता है की ये हम सब की ज़िन्दगी की कहानी है। एक कहानी जिसमे एक इंसान का जुनून, उसकी लगन, उसकी मेहनत, उसको मिलने वाली दुत्कार और लक्ष्य प्राप्ति पर उसका सत्कार, ये सब शामिल है।

हानूश की कहानी मुझे मेरी ज़िन्दगी के उस दौर की याद दिलाती है जब मेरी ज़िन्दगी मुफलिसी में थी। जब लोगों ने मेरे सपने को पाने में रूकावट पैदा की। उससे आज भी जूझता हूँ मगर जिस ख़ूबसूरती से अस्मिता थिएटर के अभिनेता गौरव मिश्रा ने हानूश का किरदार किया, उसके मन की पीड़ा, उसका लगाव उस घडी के साथ दिखाया, वो काबिल-ए-तारीफ है।

ये घड़ी सिर्फ एक सांकेतिक प्रदर्शन है, घड़ी की जगह आप कुछ भी कह सकते है, वो आपका सपना हो सकता है, आपका प्यार हो सकता है, या कुछ और। आप अपने जीवन में जो भी करना चाहे वो पा सकते है, अगर आप उस सपने को, उस इच्छा को अपना सर्वस्व दे दें। जिस प्रकार हानूश ने मुफलिसी में १३ साल गुज़ार दिए, मगर अपने सपने को ओझल ना होने दिया, उसके पूरा हो जाने के बाद अपनी आँखों से भी महरूम हो गया, मगर घड़ी बनाने की चाह और उसकी टिक-टिक से उसका कभी मन नहीं भरा।

जब आप कुछ नया करना चाहते है तो तकलीफ़े आती ही है, ठीक वैसे ही जैसे हानूश एक ताले बनाने वाले से, एक घड़ी बनाने वाला बनने की कोशिश करने लगा और इसके लिए हर चीज़ को कुर्बान करने पर आमादा था। एक बड़ी सीख है इस कहानी में की गर आप कुछ पूरे दिल से करना चाहते है तो उसके लिए जोख़िम उठाना ही पड़ेगा और आपको उसके लिए तैयार रहना ही पड़ेगा। हानूश के पादरी भाई में भी एक बात थी। वो कहता है की उसने ड़र-ड़र कर ही जीवन बिताया है, और उसका जीवन बुरी तरह नहीं बीता है, वही दूसरी ओर उसका भाई है जो सब कुछ लुटा देने को तैयार है अपने सपने को पाने के लिए। एक ओर वो भाई है जो लोगों की परवाह करता है, और दूसरा जो सबसे बेखबर सिर्फ चिड़िया की आँख पर ध्यान लगाए हुए है।

जब गौरव मिश्रा ने वो किरदार किया और वो स्टेज पर आए तो मुझे लगा जैसे मैं भी स्टेज पर हूँ, मैं भी वही कह रहा हूँ जो वो कह रहे है, उनकी बातों ने मुझे अपने दिन याद करा दिए।

यक़ीनी तौर पर मैं भीष्म साहनी जी, गौरव मिश्रा जी, और अरविन्द गौड़ साहब को बहुत बहुत शुक्रिया कहना चाहूँगा की उन्होंने इतने अद्भुत नाटक को मंच पर प्रस्तुत किया।

Sunday, 12 April 2015

मुफलिसी भी कमाल है

मुफलिसी भी कमाल है,
ये दौर बहुत बेमिसाल है,
उतरते है नकाब चेहरों से,
जब आप होते कंगाल है,
मुफलिसी भी कमाल है,

इस दौर की क्या सुनाए,
साथी दूर होकर दुत्कार लगाए,
जानते हुए भी पूछे मेरा हाल है,
मुफलिसी भी कमाल है,

एतबार करने वाले दगा देते है,
बाते करते है पीछे,देख भगा देते है,
देखकर कहते है क्यों हम भटेहाल है,
मुफलिसी भी कमाल है,

मदद पूछते है तो वो भिखारी समझते है,
एक परिवार कहते थे जो, अब पराया कहते है,
शुक्र है अपना परिवार नहीं कहता की आप कंगाल है,
मुफलिसी भी कमाल है,

खामख्याली से जागा हूँ, संभल गया हूँ,
बिखरने से पहले ही मैं सिमट गया हूँ,
असली-नकली की पहचान करा दी, ये धमाल है,
मुफलिसी भी कमाल है।

- अमित शुक्ल

Saturday, 11 April 2015

पैसा ही सब कुछ है?

सच है साहब। पैसा ही सब कुछ है। ये वो बात है जो बच्चे माँ के गर्भ में ही सीख लेते है, मगर मैंने 31 साल में भी नहीं समझा। पहले मुझे लगता था की इंसान का चरित्र, उसकी परवरिश, उनके संस्कार बहुत बड़ी चीज़ है, मगर अब लगता है की नहीं, ये सब ख़ामख्याली थी। आज की दुनिया के लिए पैसा ही सब कुछ है।

बीते कुछ महीनों में जिस किस्म की पैसों की तकलीफ देखी है, ये कहना गलत नहीं होगा की ज़िन्दगी बस कुछ ऐसी ही हो चली है।

सबक सिखाकर वो पल चला गया। अब ज़िन्दगी अनुभव पर ही ज़िंदा है।

Friday, 10 April 2015

आज आहत मान, आहत प्राण!/ पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

आज आहत मान, आहत प्राण!

कल जिसे समझा कि मेरा
मुकुर-बिंबित रूप,
आज वह ऐसा, कभी की हो न ज्यों पहचान।
आज आहत मान, आहत प्राण!

'मैं तुझे देता रहा हूँ 
प्यार का उपहार’,
’मूर्ख मैं तुझको बनाती थी निपट नादान।’
आज आहत मान, आहत प्राण!

चोट दुनिया-दैव की सह
गर्व था, मैं वीर,
हाय, ओड़े थे न मैंने
शब्द-भेदी-बाण।
आज आहत मान, आहत प्राण!