Sunday, 31 May 2015

धार्मिकता – भेद से अभेद में छलांग

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alice popkorn flower
मैं ईश्वर भीरु नहीं हूँ. भय ईश्वर तक नहीं ले जाता है. उसे पाने की भूमिका अभय है.
मैं किसी अर्थ में श्रद्धालु भी नहीं हूँ. श्रद्धा मात्र अंधी होती है. और अंधापन परम सत्य तक कैसे ले जा सकता है?
मैं किसी धर्म का अनुयायी भी नहीं हूँ, क्योंकि धर्म को विशेषणों में बाटना संभव नहीं है. वह एक और अभिव्यक्त है.
कल जब मैंने यह कहा तो किसी ने पूछा, “फिर क्या आप नास्तिक हैं?”
मै न नास्तिक हूँ, न आस्तिक ही. वे भेद सतही और बौद्धिक हैं. सत्ता से उनका कोई संबंध नहीं है. सत्ता ‘है’ और ‘न है’ में विभक्त नहीं है. भेद मन का है, इसलिए नास्तिकता और आस्तिकता दोनों मानसिक हैं. आत्मा को वे नहीं पहुंच पाती हैं. आत्मिक विधेय और नकार दोनों का अतिक्रमण कर जाता है.
‘जो है’ वह विधेय और नकार के अतीत है. या फिर वे दोनों एक हैं और उनमें कोई भेद-रेखा नहीं है. बुद्धि से स्वीकार की गई किसी भी धारण की वहाँ कोई गति नहीं है.
वस्तुत: आस्तिक को आस्तिकता छोड़नी होती है और नास्तिक को नास्तिकता, तब कहीं वे सत्य में प्रवेश कर पाते हैं. वे दोनों ही बुद्धि के आग्रह हैं. आग्रह आरोपण हैं. सत्य कैसा है, यह निर्णय नहीं करना होता है; वरन अपने को खोलते ही वह जैसा है, उसका दर्शन हो जाता है.
यह स्मरण रखें कि सत्य का निर्णय नहीं, दर्शन करना होता है. जो सब बौद्धिक निर्णय छोड़ देता है, जो सब तार्किक धारणाएं छोड़ देता है, जो समस्त मानसिक आग्रह और अनुमान छोड़ देता है, वह उस निर्दोष चित्त-स्थिति में सत्य के प्रति अपने के खोल रहा है, जैसे फूल प्रकाश के प्रति अपने को खोलते हैं.
इस खोलने में दर्शन की घटना संभव होती है.
इसलिए, जो न आस्तिक है न नास्तिक है, उसे मैं धार्मिक कहता हूँ. धार्मिकता भेद से अभेद में छलांग है.
विचार जहाँ नहीं, निर्विचार है; विकल्प जहाँ नहीं, निर्विकल्प है; शब्द जहाँ नहीं, शून्य है- वहाँ धर्म में प्रवेश है.
ओशो के पत्रों के संकलन ‘क्रांतिबीज’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र

Saturday, 30 May 2015

मनुष्यता

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lao tzu quote

पूर्णिमा है, लेकिन आकाश बादलों से ढका है. मैं राह से आया हूं. एक रेत के ढेर पर कुछ बच्चे खेल रहे थे. उन्होंने रेत के कुछ घर बनाए और उस पर से ही उनके बीच में झगड़ा हो गया था. रेत के घरों पर ही सारे झगड़े होते हैं. वे तो बच्चे ही थे, पर थोड़ी देर में जो बच्चे नहीं थे वे भी उसमें सम्मिलित हो गये. बच्चों के झगड़े में बाद में उनके बड़े भी सम्मिलित हो गये थे.
मैं किनारे खड़ा सोचता रहा कि बच्चों और बड़ों का विभाजन कितना कृत्रिम है! आयु वस्तुत: कोई भेद नहीं लाती और उससे प्रौढ़ता का कोई संबंध नहीं है.
हममें से अधिक बच्चे ही मर जाते हैं. लाओ-त्सु के संबंध में कथा है कि वह बूढ़ा ही पैदा हुआ था. यह बात बहुत अस्वाभाविक लगती है. पर क्या इससे भी अधिक अस्वाभाविक घटना यह नहीं है कि कोई मरते समय तक भी प्रौढ़ता को उपलब्ध न हो पाये! शरीर विकसित हो जाते हैं पर चित्त वहीं का वहीं ठहरा रह जाता है. तभी तो संभव है कि रेत के घरों पर झगड़े चलें और आदमी आदमी के वस्त्रों को उतार क्षण में नग्न हो जाये और जाहिर कर दे कि विकास की सारी बातें व्यर्थ हैं. और कौन कहता है कि मनुष्य पशु से पैदा हुआ है? मनुष्य के पशु से पैदा होने की बात गलत है, क्योंकि वह तो अभी भी पशु ही है.
क्या कभी मनुष्य पैदा नहीं हुआ है?
मनुष्य को गहरा देखने में जो उत्तर मिलता है. वह ‘हां’ में नहीं मिलता है. डायोजनीज दिन को, भरी दोपहरी में भी अपने साथ एक जलती हुई लालटेन लिये रहता था और कहता था कि मैं मनुष्य को खोज रहा हूं. वह जब वृद्ध हो गया था, तो किसी ने उससे पूछा, “क्या तुम्हारे भीतर मनुष्य को खोजने की आशा अभी जीवित है?” उसने कहा, “हां’, क्योंकि लालटेन अभी भी जल रही है”.
मैं खड़ा रहा हूं और उस रेत के ढेर के पास बहुत भीड़ इकट्ठी हो गयी है. लोग गाली-गलौज का और एक-दूसरे को डराने-धमकाने का बहुत रस-मुग्ध हो आनंद ले रहे हैं. जो लड़ रहे हैं, उनकी आंखों में भी बहुत चमक मालूम हो रही है. कोई पाशविक आनंद जरूर उनकी आंखों और गतिविधियों में प्रवाहित हो रहा है.
खलील जिब्रान ने लिखा है, ‘एक दिन मैंने खेत में खड़े एक काठ के पुतले से पूछा, ‘क्या तुम इस खेत में खड़े-खड़े उकता नहीं जाते हो?’ उसने उत्तर दिया, ‘ओह! पक्षियों को डराने का आनंद इतना है कि समय कब बीत जाता है, कुछ पता ही नहीं चलता’. मैंने क्षण भर सोचकर कहा, ‘यह सत्य है, क्योंकि मुझे भी इस आनंद का अनुभव है.’ पुतला बोला, ‘हां, वे ही व्यक्ति जिनके शरीर में घास-फूस भरा है, इस आनंद से परिचित हो सकते हैं!’ पर इस आनंद से तो सभी परिचित मालूम हाते हैं. क्या हम सबके भीतर घास-फूस ही नहीं भर हुआ है? और क्या हम भी खेत में खड़े झूठे आदमी ही नहीं हैं?
उस रेत के ढेर पर यही आनंद देखकर लौटा हूं और क्या सारी पृथ्वी के ढेर पर भी यही आनंद नहीं चल रहा है?
यह अपने से पूछता हूं और रोता हूं. उस मनुष्य के लिए रोता हूं, जो कि पैदा हो सकता है, पर पैदा नहीं हुआ है. जो कि प्रत्येक के भीतर है, पर वैसे ही छिपा है, जैसे राख में अंगारे छिपा होता है.
वस्तुत: शरीर घास-फूस के ढेर से ज्यादा नहीं है. जो उस पर समाप्त है, अच्छा था कि वह किसी खेत में होता, तो कम से कम फसलों को पक्षियों से बचाने के काम तो आ जाता. मनुष्य की सार्थकता तो उतनी भी नहीं है!
शरीर से जो अतीत है, उसे जाने बिना कोई मनुष्य नहीं बनता है. आत्मा को जाने बिना कोई मनुष्य नहीं बनता है. मनुष्य की भांति पैदा हो जाना एक बात है, मनुष्य होना बिलकुल दूसरी बात है.
मनुष्य को तो स्वयं के भीतर स्वयं को जन्म देना होता है. यह वस्त्रों की भांति नहीं है कि उसे ओढ़ा जा सके. मनुष्यता के वस्त्रों को ओढ़कर कोई मनुष्य नहीं बनता है, क्योंकि वे उसी समय तक उसे मनुष्य बनाये रखते हैं, जब तक कि मनुष्यता की वस्तुत: कोई आवश्यकता नहीं पड़ती है. आवश्यकता आते ही वे कब गिर जाते हैं, ज्ञात भी नहीं हो पाता है.
बीज जैसे अपने प्राणों को परिवर्तित का अंकुर बनता है – किन्हीं वस्त्रों को धारण करके नहीं – वैसे ही मनुष्य को भी अपनी समस्त प्राण-सत्ता एक नये ही आयाम में अंकुरित करनी होती है, तभी उसका जन्म होता है और परिवर्तन होता है.
और तब उसका आनंद कांटों को फेंकने में नहीं, कांटों को उठाने में और फूलों को बिखेरने में परिणत हो जाता है. वह घड़ी ही यह घोषणा करती है कि अब वह घास-फूस नहीं है – मनुष्य है, देह नहीं, आत्मा है.
जॉर्ज गुरजिएफ ने कहा है, ‘इस भ्रम को छोड़ दें कि प्रत्येक के पास आत्मा है.’ सच ही जो सोया है, उसके पास आत्मा है या नहीं, इससे क्या अंतर पड़ता है! वही वास्तविक है- जो है. आत्मा सबकी संभावना है, पर उसे जो सत्य बनाता है, वही उसे पाता है.
ओशो के पत्रों के संकलन ‘क्रांतिबीज’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र.

Friday, 29 May 2015

वे आत्‍माजीवी थे काया से कहीं परे / हरिवंशराय बच्चन

वे आत्‍माजीवी थे काया से कहीं परे,
वे गोली खाकर और जी उठे, नहीं मरे,
जब तक तन से चढ़काचिता हो गया राख-घूर,
तब से आत्‍मा
की और महत्‍ता
जना गए।

उनके जीवन में था ऐसा जादू का रस,
कर लेते थे वे कोटि-कोटि को अपने बस,
उनका प्रभाव हो नहीं सकेगा कभी दूर,
जाते-जाते
बलि-रक्‍त-सुरा
वे छना गए।

यह झूठ कि, माता, तेरा आज सुहाग लुटा,
यह झूठ कि तेरे माथे का सिंदूर छुटा,
अपने माणिक लोहू से तेरी माँग पूर
वे अचल सुहागिन


तुझे अभागिन,
बना गए।

Thursday, 28 May 2015

मकान सारे कच्चे थे – पद्मभूषण डॉ हरिवंश राय बच्चन

मकान चाहे कच्चे थे
लेकिन रिश्ते सारे सच्चे थे…
चारपाई पर बैठते थे
पास पास रहते थे…
सोफे और डबल बेड आ गए
दूरियां हमारी बढा गए….
छतों पर अब न सोते हैं
बात बतंगड अब न होते हैं..
आंगन में वृक्ष थे
सांझे सुख दुख थे…
दरवाजा खुला रहता था
राही भी आ बैठता था…
कौवे भी कांवते थे
मेहमान आते जाते थे…
इक साइकिल ही पास था
फिर भी मेल जोल था…
रिश्ते निभाते थे
रूठते मनाते थे…
पैसा चाहे कम था
माथे पे ना गम था…
मकान चाहे कच्चे थे
रिश्ते सारे सच्चे थे…
अब शायद कुछ पा लिया है
पर लगता है कि बहुत कुछ गंवा दिया
जीवन की भाग-दौड़ में –
क्यूँ वक़्त के साथ रंगत खो जाती है?
हँसती-खेलती ज़िन्दगी भी आम हो जाती है।
एक सवेरा था जब हँस कर उठते थे हम
और
आज कई बार
बिना मुस्कुराये ही शाम हो जाती है!!
कितने दूर निकल गए,
रिश्तो को निभाते निभाते
खुद को खो दिया हमने,
अपनों को पाते पाते

Wednesday, 27 May 2015

स्वयं से पूछो, “मैं कौन हूं?”


alice popkorn photo

”मैं कौन हूं?” जो स्वयं से इस प्रश्न को नहीं पूछता है, उसके लिए ज्ञान के द्वार बंद ही रह जाते हैं. उस द्वार को खोलने की कुंजी यही है. स्वयं से पूछो कि ”मैं कौन हूं?” और जो प्रबलता से और समग्रता से पूछता है, वह स्वयं से ही उत्तर भी पा जाता है.
कारलाइल बूढ़ा हो गया था. उसका शरीर अस्सी वसंत देख चुका था. और जो देह कभी अति सुंदर और स्वस्थ थी, वह अब जर्जर और ढीली हो गई थी. जीवन संध्या के लक्षण प्रकट होने लगे थे. ऐसे बुढ़ापे की एक सुबह की घटना है. कारलाइल स्नानगृह में था. स्नान के बाद वह जैसे ही शरीर को पोंछने लगा, उसने अचानक देखा कि वह देह तो कब की जा चुकी है, जिसे कि वह अपनी मान बैठा था! शरीर तो बिलकुल ही बदल गया है. वह काया अब कहां है जिसे उसने प्रेम किया था? जिस पर उसने गौरव किया था, उसकी जगह यह खंडहर ही तो शेष रह गया है. पर साथ ही एक अत्यंत अभिनव-बोध भी उसके भीतर अकुंडलित होने लगा : ”शरीर तो वही नहीं है, लेकिन वह तो वही है. वह तो नहीं बदला है.” और तब उसने स्वयं से ही पूछा था, ”आह! तब फिर मैं कौन हूं?”
यही प्रश्न प्रत्येक को अपने से पूछना होता है. यही असली प्रश्न है. प्रश्नों का प्रश्न यही है. जो इसे नहीं पूछते, वे कुछ भी नहीं पूछते हैं. और, जो पूछते ही नहीं, वे उत्तर कैसे पा सकगें?
पूछो. अपने अंतरतम की गहराइयों में इस प्रश्न को गूंजने दो, ”मैं कौन हूं?”
जब प्राणों की पूरी शक्ति से कोई पूछता है, तो अवश्य ही उत्तर उपलब्ध होता है. और, वह उत्तर जीवन की सारी दिशा और अर्थ को परिवर्तित कर देता है. उसके पूर्व मनुष्य अंधा है. उसके बाद ही वह आंखों को पाता है.
ओशो के पत्रों के संकलन ‘पथ के प्रदीप’ से. प्रस्तुति – ओशो शैलेन्द्र.

Tuesday, 26 May 2015

अपने-अपने सलीब

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अम्ब्रिया (इटली) के एक गाँव में एक आदमी रहता था जो हमेशा अपने दुखों का रोना रोते रहता था. वह ईसाई था और उसे यह लगता था कि उसके कंधों पर रखा सलीब ही सबसे भारी है.
एक रात सोने से पहले उसने ईश्वर से प्रार्थना की – “प्रभु, मेरे दुखों का भार कुछ कम कर दो!”
उस रात उसने एक स्वप्न देखा कि ईश्वर उसे एक भंडार में ले गए हैं और उससे कह रहे हैं – “तुम खुद ही अपनी पसंद का सलीब चुन लो”.
आदमी पूरे भंडार में घूमता है. वहां हर आकार-प्रकार के सलीब रखे हैं जिनपर उनके मालिकों का नाम लिखा हुआ है. वह मंझोले आकार का एक सलीब उठाता है और उसपर लिखा नाम पढता है… वह सलीब तो उसके एक मित्र का है. वह उसे वहीं छोड़ देता है.
तब ईश्वर उससे कहते हैं कि वह चाहे तो सबसे छोटा सलीब भी चुन सकता है.
आदमी यह देखकर हैरत में पड़ जाता है कि सबसे छोटे सलीब पर उसका ही नाम लिखा हुआ है.
पाउलो कोएलो की कहानी 

Monday, 25 May 2015

दीप अभी जलने दे, भाई / पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

दीप अभी जलने दे, भाई!

निद्रा की मादक मदिरा पी,
सुख स्वप्नों में बहलाकर जी,
रात्रि-गोद में जग सोया है, पलक नहीं मेरी लग पाई!
दीप अभी जलने दे, भाई!

आज पड़ा हूँ मैं बनकर शव,
जीवन में जड़ता का अनुभव,
किसी प्रतीक्षा की स्मृति से ये पागल आँखें हैं पथराई!
दीप अभी जलने दे, भाई!

दीप शिखा में झिल-मिल, झिल-मिल,
प्रतिपल धीमे-धीमे हिल-हिल,
जीवन का आभास दिलाती कुछ मेरी तेरी परछाईं!
दीप अभी जलने दे, भाई!

Sunday, 24 May 2015

भलाई का बदला

उस युवक का नाम फ्लेमिंग था और वह एक गरीब स्कॉटिश किसान था. एक दिन, जब वह जंगल में कुछ खाने का सामान ढूंढ रहा था तभी उसे कहीं से किसी लड़के के चिल्लाने की आवाज़ सुनाई दी. अपना सामान उधर ही पटक कर वह आवाज़ की दिशा में दौड़ा.
उसने देखा कि एक दलदली गड्ढे में एक लड़का छाती तक फंसा हुआ है और बचने के लिए छटपटा रहा है. फ्लेमिंग ने किसी तरह लकडी आदि की सहायता से उसे खींचकर बाहर निकाला. ज़रा सी देर और हो जाती तो वह लड़का उस दलदल में समा जाता.
अगले दिन फ्लेमिंग की गरीब बस्ती में एक लकदक बग्घी आकर रुकी. एक कुलीन सज्जन उसमें से उतरे और उन्होंने फ्लेमिंग को बताया कि वे उस लड़के के पिता थे जिसकी जान फ्लेमिंग ने बचाई थी.
“मैं आपको कुछ देना चाहता हूँ” – उन्होंने फ्लेमिंग से कहा – “आपने मेरे पुत्र की जान बचाई है”.
“नहीं, माफ़ करें लेकिन मैं इसके लिए आपसे कुछ नहीं ले सकता” – फ्लेमिंग ने कहा. इसी बीच उनकी बातचीत सुनकर फ्लेमिंग का छोटा बेटा झोपड़ी से बाहर आ गया.
“क्या ये तुम्हारा बेटा है?” – कुलीन सज्जन ने फ्लेमिंग से पूछा. फ्लेमिंग ने गर्व से कहा – “हाँ, वह बहुत होनहार है”.
“मैं चाहता हूँ कि मैं उसकी शिक्षा-दीक्षा का खर्च वहन करूँ. यदि वह भी अपने पिता की ही भांति है तो एक दिन उसपर सभी गर्व करेंगे” – कुलीन सज्जन ने कहा.
इस प्रकार बालक फ्लेमिंग की पढ़ाई विधिवत अच्छे स्कूल में शुरू हुई. उसने लन्दन के सेंट मेरी मेडिकल कॉलेज से चिकित्सा में स्नातक की उपाधि प्राप्त की. आगे चलकर उसने विश्व की पहली एंटी-बायोटिक पेनीसिलीन की खोज की. उसकी इस खोज के लिए उसे नोबल पुरस्कार दिया गया. हम सब उसे सर अलेकजेंडर फ्लेमिंग के नाम से जानते हैं.
सालों बाद उस कुलीन सज्जन के उसी पुत्र को निमोनिया हो गया जिसकी जान पिता फ्लेमिंग ने बचाई थी. उसकी चिकित्सा अलेकजेंडर फ्लेमिंग की देखरेख में पेनीसिलीन की सहायता से की गई.
उस कुलीन सज्जन का नाम था लॉर्ड रैन्डोल्फ चर्चिल और उसके बेटे को दुनिया सर विंस्टन चर्चिल कहकर याद करती है.
(अलेक्जेंडर फ्लेमिंग का चित्र विकिपीडिया से लिया गया है)

Saturday, 23 May 2015

ऊँट और आलोचक


camel by alicepopkorn

एक प्रशासक, एक कवि, एक चित्रकार, और एक आलोचक – ये चारों एक ऊँट के साथ रेगिस्तान से गुज़र रहे थे. 
एक रात यूंही वक़्त बिताने के लिए उन्होंने सोचा कि वे यात्रा के साथी अपने ऊँट का वर्णन करें.
प्रशासक टेंट में गया और दस मिनट में उसने ऊँट के महत्व को दर्शानेवाला एक व्यवस्थित और वस्तुनिष्ठ निबंध लिख दिया.
कवि ने भी लगभग दस मिनट में ही अनुपम छंदों में यह लिख दिया कि ऊँट किस प्रकार एक उत्कृष्ट प्राणी है.
चित्रकार ने भी अपनी तूलिका उठाई और कुछ सधे हुए स्ट्रोक्स लगाकर ऊँट की बेहतरीन छवि की रचना कर दी.
अब आलोचक की बारी थी. वह कागज़-कलम लेकर टेंट में चला गया.
उसे भीतर गए दो घंटे बीत गए. बाहर बैठे तीनों लोग बेहद उकता चुके थे.
वह बाहर आया और बोला, “मैंने ज्यादा देर नहीं लगाई… अंततः मैंने इस जानवर के कुछ नुस्ख खोज ही लिए.”
“इसकी चाल बड़ी बेढब है. यह ज़रा भी आरामदेह नहीं है. बदसूरत भी है”
इसके साथ ही उसने अपने दोस्तों को कागज़ का एक पुलिंदा थमा दिया. उसपर लिखा था ‘आदर्श ऊँट – जैसा ईश्वर को रचना चाहिए था’.
(पाउलो कोएलो के ब्लौग से)

Friday, 22 May 2015

मुसीबत

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नसरुद्दीन एक शाम अपने घर से निकला. उसे किन्हीं मित्रों के घर उसे मिलने जाना था. वह चला ही था कि दूर गाँव से उसका एक दोस्त जलाल आ गया. नसरुद्दीन ने कहा, “तुम घर में ठहरो, मैं जरूरी काम से दो-तीन मित्रों को मिलने जा रहा हूँ और लौटकर तुमसे मिलूंगा. अगर तुम थके न हो तो मेरे साथ तुम भी चल सकते हो”.
जलाल ने कहा, “मेरे कपड़े सब धूल-मिट्टी से सन गए हैं. अगर तुम मुझे अपने कपड़े दे दो तो मैं तुम्हारे साथ चलता हूँ. तुम्हारे बगैर यहां बैठकर मैं क्या करूंगा? इसी बहाने मैं भी तुम्हारे मित्रों से मिल लूँगा”.
नसरुद्दीन ने अपने सबसे अच्छे कपड़े जलाल को दे दिए और वे दोनों निकल पड़े.
जिस पहले घर वे दोनों पहुंचे वहां नसरुद्दीन ने कहा, “मैं इनसे आपका परिचय करा दूं, ये हैं मेरे दोस्त जलाल. और जो कपड़े इन्होंने पहने हैं वे मेरे हैं”.
जलाल यह सुनकर बहुत हैरान हुआ. इस सच को कहने की कोई भी जरुरत न थी. बाहर निकलते ही जलाल ने कहा, “कैसी बात करते हो, नसरुद्दीन! कपड़ों की बात उठाने की क्या जरूरत थी? अब देखो, दूसरे घर में कपड़ों की कोई बात मत उठाना”.
वे दूसरे घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, “इनसे परिचय करा दूं. ये हैं मेरे पुराने मित्र जलाल; रही कपड़ों की बात, सो इनके ही हैं, मेरे नहीं हैं”.
जलाल फिर हैरान हुआ. बाहर निकलकर उसने कहा, “तुम्हें हो क्या गया है? इस बात को उठाने की कोई क्या जरूरत थी कि कपड़े किसके हैं? और यह कहना भी कि इनके ही हैं, शक पैदा करता है, तुम ऐसा क्यों कर रहे हो?”
नसरुद्दीन ने कहा, “मैं मुश्किल में पड़ गया. वह पहली बात मेरे मन में गूंजती रह गई, उसकी प्रतिक्रिया हो गई. सोचा कि गलती हो गई. मैंने कहा, कपड़े मेरे हैं तो मैंने कहा, सुधार कर लूं, कह दूं कि कपड़े इन्हीं के हैं”. जलाल ने कहा, “अब ध्यान रखना कि इसकी बात ही न उठे. यह बात यहीं खत्म हो जानी चाहिए”.
वे तीसरे मित्र के घर पहुंचे. नसरुद्दीन ने कहा, “ये हैं मेरे दोस्त जलाल. रही कपड़ों की बात, सो उठाना उचित नहीं है”. नसरुद्दीन ने जलाल से पूछा, “ठीक है न, कपड़ों की बात उठाने की कोई ज़रुरत ही नहीं है. कपड़े किसी के भी हों, हमें क्या लेना देना, मेरे हों या इनके हों. कपड़ों की बात उठाने का कोई मतलब नहीं है”.
बाहर निकलकर जलाल ने कहा, “अब मैं तुम्हारे साथ और नहीं जा सकूंगा. मैं हैरान हूं, तुम्हें हो क्या रहा है?”
नसरुद्दीन बोला, “मैं अपने ही जाल में फंस गया हूं. मेरे भीतर, जो मैं कर बैठा, उसकी प्रतिक्रियाएं हुई चली जा रही हैं. मैंने सोचा कि ये दोनों बातें भूल से हो गयीं, कि मैंने अपना कहा और फिर तुम्हारा कहा. तो मैंने तय किया कि अब मुझे कुछ भी नहीं कहना चाहिए, यही सोचकर भीतर गया था. लेकिन बार-बार यह होने लगा कि यह कपड़ों की बात करना बिलकुल ठीक नहीं है. और उन दोनों की प्रतिक्रिया यह हुई कि मेरे मुंह से यह निकल गया और जब निकल गया तो समझाना जरूरी हो गया कि कपड़े किसी के भी हों, क्या लेना-देना”.
यह जो नसरुद्दीन जिस मुसीबत में फंस गया होगा बेचारा, पूरी मनुष्य जाति ऐसी मुसीबत में फंसी है. एक सिलसिला, एक गलत सिलसिला शुरू हो गया है. और उस गलत सिलसिले के हर कदम पर और गलती बढ़ती चली जाती है. जितना हम उसे सुधारने की कोशिश करते हैं, वह बात उतनी ही उलझती चली जाती है.
प्रस्तुति ः ओशो शैलेंद्र

Thursday, 21 May 2015

दो नगीने

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किसी शहर में एक रब्बाई (यहूदी पुजारी) अपनी गुणवती पत्नी और दो प्यारे बच्चों के साथ रहता था. एक बार उसे किसी काम से बहुत दिनों के लिए शहर से बाहर जाना पड़ा. जब वह दूर था तब एक त्रासद दुर्घटना में उसके दोनों पुत्र मारे गये.
ऐसी दुःख की घड़ी में रब्बाई की पत्नी ने खुद को बड़ी मुश्किल से संभाला. वह बहुत हिम्मती थी और ईश्वर में उसकी आस्था अटूट थी. लेकिन उसे यह चिंता थी कि रब्बाई के लौटने पर वह उसे यह दुखद समाचार किस प्रकार देगी. रब्बाई स्वयं बहुत आस्थावान व्यक्ति था लेकिन वह दिल का मरीज़ था और पूर्व में अस्पताल में भी भर्ती रह चुका था. पत्नी को यह आशंका थी कि वह यह सदमा नहीं झेल पायेगा.
पति के आगमन की पूर्व संध्या को उसने दृढ़तापूर्वक प्रार्थना की और शायद उसे अपनी समस्या का कोई समाधान मिल गया.
अगली सुबह रब्बाई घर पहुँच गया. बड़े दिनों के बाद घर वापसी पर वह पत्नी से गर्मजोशी से मिला और लड़कों के बारे में पूछा.
पत्नी ने कहा, “उनकी चिंता मत कीजिये. आप नहा-धोकर आराम करिए”.
कुछ समय के बाद वे भोजन करने के लिए बैठे. पत्नी ने उससे यात्रा के बारे में पूछा. रब्बाई ने उसे इस बीच घटी बातों की जानकारी दी और कहा कि ईश्वर की दया से सब ठीक हुआ. फिर उसने बच्चों के बारे में पूछा.
पत्नी कुछ असहज तो थी ही, फिर भी उसने कहा, “उनके बारे में सोचकर परेशान मत होइए. हम उनकी बात बाद में करेंगे. मैं इस वक़्त किसी और उलझन में हूँ, आप मुझे उसका उपाय बताइए”.
रब्बाई समझ रहा था कि कोई-न-कोई बात ज़रूर थी. उसने पूछा, “क्या हुआ? कोई बात तो है जो तुम्हें भीतर-ही-भीतर खाए जा रही है. मुझे बेखटके सब कुछ सच-सच बता दो और हम साथ बैठकर ईश्वर की मदद से उसका हल ज़रूर निकाल लेंगे”.
पत्नी ने कहा, “आप जब बाहर थे तब हमारे एक मित्र ने मुझे दो बेशकीमती नगीने अहतियात से सहेजकर रखने के लिए दिए. वे वाकई बहुत कीमती और नायाब नगीने हैं! मैंने उन जैसी अनूठी चीज़ और कहीं नहीं देखी है. अब वह उन्हें लेने के लिए आनेवाला है और मैं उन्हें लौटाना नहीं चाहती. मैं चाहती हूँ कि वे हमेशा मेरे पास ही रहें. अब आप क्या कहेंगे?”
“तुम कैसी बातें कर रही हो? ऐसी तो तुम नहीं थीं? तुममें यह संसारिकता कहाँ से आ गयी?”, रब्बाई ने आश्चर्य से कहा.
“सच यही है कि मैं उन्हें अपने से दूर होते नहीं देखना चाहती. अगर मैं उन्हें अपने ही पास रख सकूं तो इसमें क्या बुरा है?”, पत्नी ने कहा.
रब्बाई बोला, “जो हमारा है ही नहीं उसके खोने का दुःख कैसा? उन्हें अपने पास रख लेना तो उन्हें चुराना ही कहलायेगा न? हम उन्हें लौटा देंगे और मैं यह कोशिश करूंगा कि तुम्हें उनसे बिछुड़ने का अफ़सोस नहीं सताए. हम आज ही यह काम करेंगे, एक साथ”.
“ठीक है. जैसा आप चाहें. हम वह संपदा लौटा देंगे. और सच यह है कि हमने वह लौटा ही दी है. हमारे बच्चे ही वे बेशकीमती नगीने थे. ईश्वर ने उन्हें सहेजने के लिए हमारे सुपुर्द किया था और आपकी गैरहाजिरी में उसने उन्हें हमसे वापस ले लिया. वे जा चुके हैं…”.
रब्बाई ने अपनी पत्नी को भींच लिया और वे दोनों अपनी आंसुओं की धारा में भीगते रहे. रब्बाई को अपनी पत्नी की कहानी के मर्म का बोध हो गया था. उस दिन के बाद वे साथ-साथ उस दुःख से उबरने का प्रयास करने लगे.
(पाउलो कोएलो के ब्लॉग से)

Wednesday, 20 May 2015

भावाकुल मन की कौन कहे मजबूरी / हरिवंशराय बच्चन

भावाकुल मन की कौन कहे मजबूरी।
बोल उठी है मेरे स्वर में
तेरी कौन कहानी,
कौन जगी मेरी ध्वनियों में
तेरी पीर पुरानी,
अंगों में रोमांच हुआ, क्यों
कोर नयन के भीगे,
भावाकुल मन की कौन कहे मजबूरी।

मैंने अपना आधा जीवन
गाकर गीत गँवाया,
शब्दों का उत्साह पदों ने
मेरे बहुत कमाया,
मोती की लड़ियाँ तो केवल
तूने इनपर वारीं,
निर्धन की झोली आज गई भर पूरी।
भावाकुल मन की कौन कहे मजबूरी।

Saturday, 16 May 2015

पहाड़-हिरन : घेड़ा : हाथी / पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

नील
गगन भेदती,
धवल
बादल-कुँहरे में धँसी,
सत्‍य पर अर्ध सत्‍य, फिर अर्ध स्‍वप्‍न-सी खड़ी
चोटियों का आमंत्रण-
जैसे बंसी-टेर
कभी पुचकार,
कभी मनुहार,
कभी अधिकार
जनाती बुला रही है।
यह हिरण!
चार चरणों पर
विद्युत्-किरण
धरा की धीरे-धीरे उठन,
क्षितिज पर पल-पल नव सिहरन।
हिरण का चाल
हवा से होड़,
चौकड़ी से नपता भू-खंड
झारियाँ-झुरमुट-लता-वितान,
कुंज पर कुंज;
अभी, ले, इस चढ़व का ओर,
अभी, ले, उस उतार का छोर;
और अब निर्झर-शीतल तीर,
ध्‍वनित गिरि-चरणों में मं‍जीर,
स्‍फटिक-सा नीर,
तृषा कर शांत,
भ्रांत, ऊपर से ही तो फूट
अमृत की धार बही है।
यह घोड़ा!
जिस पर न सवारी
कभी किसी ने गाँठी,
गाड़ी खिंचवाकर
नहीं गया जो तोड़ा,
जो वन्‍य, पर्वती, उद्धृत,
जिसको छू न सका है
कभी किसी का कोड़ा।
(यह अर्द्ध सत्‍य;
भीतर जो चलता उसे किसी ने देखा?)
अब लेता श्रंग उठानें,
चट्टानों के ऊपर चढ़ती चट्टानें।
टापों के नीचे
वे टप-टप-टप करतीं
ध्‍वनियाँ, प्रतिध्‍वनियाँ
घाटी-घाटी भरतीं।
वह ऊपर-ऊपर चढ़ा निरंतर जाता,
वह कहीं नहीं क्षणभर को भी सुस्‍ताता
ले, देवदारु बन आया;
सुखकर, श्रमहार
होती है इसकी छाया।
हर चढ़नेवाला पाता ही है चोटी-
पगले
तुझसे किसने यह बात कहीं है?
यह हाथी!
बाहर-भीतर यह कितना भरकम-भारी!
जैसे जीवन की की सब घडि़याँ,
सब सुधियाँ, उपलब्धियाँ,
दु:ख-सुख, हार-जीत,
चिंता, शंकाएँ सारी,
हो गई भार में परिवर्तित,
वृद्धावस्‍था की काया में, मन में संचित।
अब सीढ़ी-सीढ़ी खड़ी हुई हैं
हिम से ढँकी शिलाएँ
अब शीत पवन के झकझोरे
लगते हैं आगे-पीछे, दाएँ-बाएँ,
अब धुंध-कुहासे में हैं
खोई-खोई हुई दिशाएँ।
अब पथ टटोलकर चलना है,
चलना तो, ऊपर चढ़ना है,
हर एक क़दम,
पर, ख़ूब संभलकर धरना है।
(सबसे भारी अंकुश होता है भार स्‍वयं)
सब जगती देख रही है;
गजराज फिसलकर गिरा हुआ!-
दुनिया का कोई दृश्‍य
बंधु, इससे दयनीय नहीं है।

Thursday, 14 May 2015

और नौकरी चली गई

जी हाँ, ये सच है, एक हफ्ते की नौकरी के बाद, आज बड़ी ही बेढ़ंगी तरीके से नौकरी चली गई. ऐसा लगा जैसे कोई आँधी आई और मुझे उड़ा के ले गई. ऑफिस के बड़े लोगों ने निर्णय किआ और मुझे बता दिया।

चलिए अब फिर से नई नौकरी की तलाश चालू।

Wednesday, 13 May 2015

सो न सकूँगा और न तुझको सोने दूँगा, हे मन बीने / हरिवंशराय बच्चन

सो न सकूँगा और न तुझको सोने दूँगा, हे मन बीने।

इसीलिए क्या मैंने तुझसे
साँसों के संबंध बनाए,
मैं रह-रहकर करवट लूँ तू
मुख पर डाल केश सो जाए,
रैन अँधेरी, जग जा गोरी,
माफ़ आज की हो बरजोरी
सो न सकूँगा और न तुझको सोने दूँगा, हे मन बीने।

सेज सजा सब दुनिया सोई
यह तो कोई तर्क नहीं है,
क्या मुझमें-तुझमें, दुनिया में
सच कह दे, कुछ फर्क नहीं है,
स्वार्थ-प्रपंचों के दुःस्वप्नों
में वह खोई, लेकिन मैं तो
खो न सकूँगा और न तुझको खोने दूँगा, हे मन बीने।
सो न सकूँगा और न तुझको सोने दूँगा, हे मन बीने।

Tuesday, 12 May 2015

भावाकुल मन की कौन कहे मजबूरी / हरिवंशराय बच्चन

भावाकुल मन की कौन कहे मजबूरी।
बोल उठी है मेरे स्वर में
तेरी कौन कहानी,
कौन जगी मेरी ध्वनियों में
तेरी पीर पुरानी,
अंगों में रोमांच हुआ, क्यों
कोर नयन के भीगे,
भावाकुल मन की कौन कहे मजबूरी।

मैंने अपना आधा जीवन
गाकर गीत गँवाया,
शब्दों का उत्साह पदों ने
मेरे बहुत कमाया,
मोती की लड़ियाँ तो केवल
तूने इनपर वारीं,
निर्धन की झोली आज गई भर पूरी।
भावाकुल मन की कौन कहे मजबूरी।

Monday, 11 May 2015

क्यों जीता हूँ / हरिवंशराय बच्चन

आधे से ज़्यादा जीवन
जी चुकने पर मैं सोच रहा हूँ-
क्यों जीता हूँ?
लेकिन एक सवाल अहम
इससे भी ज़्यादा,
क्यों मैं ऎसा सोच रहा हूँ?

संभवत: इसलिए
कि जीवन कर्म नहीं है अब
चिंतन है,
काव्य नहीं है अब
दर्शन है।

जबकि परीक्षाएँ देनी थीं
विजय प्राप्त करनी थी
अजया के तन मन पर,
सुन्दरता की ओर ललकना और ढलकना
स्वाभाविक था।
जबकि शत्रु की चुनौतियाँ बढ कर लेनी थी।
जग के संघर्षों में अपना
पित्ता पानी दिखलाना था,
जबकि हृदय के बाढ़ बवंड़र
औ' दिमाग के बड़वानल को 
शब्द बद्ध करना था,
छंदो में गाना था,
तब तो मैंने कभी न सोचा
क्यों जीता हूँ?
क्यों पागल सा
जीवन का कटु मधु पीता हूँ?

आज दब गया है बड़वानल,
और बवंडर शांत हो गया,
बाढ हट गई,
उम्र कट गई,
सपने-सा लगता बीता है,
आज बड़ा रीता रीता है
कल शायद इससे ज्यादा हो
अब तकिये के तले
उमर ख़ैय्याम नहीं है,
जन गीता है।