Tuesday, 30 June 2015

बंगाल का काल / हरिवंशराय बच्चन / पृष्ठ ५

मन से अब संतोष हटाओ,
असंतोष का नाद उठाओ,
करो क्रांति का नारा ऊँचा,
भूखों, अपनी भूख बढ़ाओ,
और भूख की ताकत समझो,
हिम्मत समझो,
जुर्रत समझो,
कूवत समझो;
देखो कौन तुम्हासरे आगे
नहीं झुका देता सिर अपना।

याद मुझे हो आई सहसा
एक पते की बात पुरानी,
हुए दस बरस,
जापानी कवि योन नगूची
भारत में था,
देख देश की अकर्मण्यता
उसने यह आदेश किया था--
’यू हैव टु गिव योर पीपुल
दि सेंस ऑफ़ हंगर,
’अपने देश वासियों को है तुम्हें बताना
अर्थ भूख का।’

जबकि पढ़ा था
खूब हँसा था,
जहाँ करोड़ों दिन भर मर-खप
आधा पेट नहीं भर पाते
एक बार भी जो जीवन में
नहीं अघाते,
और जहाँ का नेता-नेता
नहीं भूलता है दुहराना
देता भाषण,
स्टारविंग मिलियन--
भूखे अनगिन,
वहाँ सुनाना
’अपने देश वासियों को है तुम्हें बताना
अर्थ भूख का।’
कितना उपहासास्पद, सच है,
कवि ही ठहरे,
जल्प दिया जो जी में आया।

बीत गए दस बरस देश के,
पड़ा काल बंगाल भूमि पर
और पढ़ा पत्रों में मैंने,
कैसे भूखों के दल के दल
गहना-गुरिया, बर्तन-भाँड़ा
गैया-गोरू, बैल-बछेरू,
बोरी-बँधना, कपड़ा-लत्ता,
ज़र-ज़मीन सब बेच-बाचकर,
पुश्तैनी घर-बार छोड़कर,
चले आ रहे हैं कलकत्ता।

कैसे भूखों के दल के दल
दर-दर मारे-मारे फिरते,
दाने-दाने को बिललाते,
ग्रास-ग्रास के लिए तरसते,
कौर-कौर के लिए तड़पते,
मौत मर रहे हैं कुत्तों की;
अरे नहीं,
कुत्ता भी मरता नहीं इस तरह,
मौत मर रहे हैं कीड़ों की,
या इनसे भी निम्न कोटि की।
(उफ़ मनुष्य के महापतन की 
बनी न सीमा!)

और सुना जब मैंने यह भी,
भूखे देखे गए छीनकर
बच्चों से निज रोटी खाते,
या कि बेचते उनको हाटों
में कुछ ताँबे के टुकड़ों पर,
जिससे दो दिन और जिएँ वे
पशु का जीवन,
और फिरें फिर
घूरों पर
कूड़ाखानों पर,
और अधिक गंदी जगहों पर,
उठा दाँत से लेने को यदि--
मानवता को निंदित करते,
लज्जित करते,
मानव को मानव संज्ञा से
वंचित करते......

तब मैंने यह कहा कि हमने
अर्थ भूख का अभी न जाना,
हमें भूख का अर्थ बताना,
भूखों, इसको आज समझ लो,
मरने का यह नहीं बहाना!

फिर से जीवित,
फिर से जाग्रत,
फिर से उन्नत
होने का है भूख निमंत्रण,
है आवाहन।

भूख नहीं दुर्बल, निर्बल है,
भूख सबल है,
भूख प्रबल हे,
भूख अटल है,
भूख कालिका है, काली है,
या काली सर्व भूतेषु
क्षुधा रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,
नमस्तस्यै, नमोनम:!

भूख प्रचंड शक्तिशाली है,
या चंडी सर्व भूतेषु
क्षुधा रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै,
नमस्तस्यै, नमोनम:!

भूख अखंड शौर्यशाली है,
या देवी सर्व भूतेषु
क्षुधा रूपेण संस्थिता,
नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमोनम:!

भूख भवानी भयावनी है,
अगणित पद, मुख, कर वाली है,
बड़े विशाल उदरवाली है।
भूख धरा पर जब चलती है,
वह डगमग-डगमग हिलती है।
वह अन्याय चबा जाती है,
अन्यायी को खा जाती है,
और निगल जाती है पल में
अन्यायी का दु:सह शासन,
हड़प चुकी अब तक कितने ही
अत्याचारी सम्राटों के
छत्र, किरीट, दंड, सिंहासन!

Monday, 29 June 2015

बंगाल का काल / हरिवंशराय बच्चन / पृष्ठ ४

क्षीणकाय कुत्ते के आगे
से भी अगर हटा ले कोई
उसकी सूखी हड्डी-रोटी
शेर की तरह गुर्राता है;
कान फटककर,
देह झटककर,
विद्युत गति से
अपना थूथन ऊपर कर के,
लंबे, तीखे
दाँत निकाले
रोटी लेनेवाले की छाती के ऊपर
चढ़ जाता है,
बढ़ जाता है
ले लेने को अपना हिस्सा;
कोता क़िस्सा--
पशु को भी आता है अपने
अधिकारों पर लड़ना-मरना,
जो कि आज तुम भूल गए हो,
भूखे बंग देश के वासी!

छाई है मुरदनी मुखों पर,
आँखों में है धँसी उदासी;
विपद् ग्रस्त हो,
क्षुधा त्रस्त हो,
चारों ओर भटकते फिरते,
लस्त-पस्त हो
ऊपर को तुम हाथ उठाते,
और मनाते
’बरसो राम पटापट रोटी!’
क्योंकि सिखाया,
क्योंकि पढ़ाया,
क्योंकि रटाया,
तुम्हें गया है--
’निर्बल के बल राम!
(हाय किसी ने क्यों न सुझाया
निर्बल के बल राम नहीं हैं
निर्बल के बल हैं दो घूँसे!)

जब न राम टस से मस होते,
नहीं बरसते तुम पर रोटी,
सुरुआ-बोटी,
तुम हो अपना भाग्य कोसते,
मन मसोसते,
यही बदा था,
यही लिखा था,
’ह्वैहै वही जो राम रचि राखा,
को करि तर्क बढ़ावै शाखा--’
अंतिम साँसों से रट-रटकर
तुम जाते मर,
लेकिन जीवित भी रहने पर
कब तुम थे मुर्दों से बेहतर!
पच्छिम की है एक कहावत,
इसको सीखो,
इसको धोखो,
गॉड हेल्पस दोज़
हू हेल्प देमसेल्वज़
राम सहायक उनके होते
जो अपने हैं स्वयं सहायक
पूर्व जन्म के
धर्म-कर्म में,
भाग्य मर्म में
इस जीवन का अर्थ न खोजो।
यही कायरों के शरणस्थल,
यहीं छिपा करते हैं निर्बल
यहीं आड़ लेते हैं असफल।

मुझसे सुन लो,
नहीं स्वर्ग से अन्न‍ गिरेगा,
नहीं गिरेगी नभ से रोटी;
किन्तु समझ लो,
इस दुनिया की प्रति रोटी में,
इस दुनिया के हर दाने में,
एक तुम्हारा भाग लगा है,
एक तुम्हाररा निश्चित हिस्सा,
उसे बँटाने,
उसको लेने,
उसे छीनने,
औ' अपनाने
को जो कुछ भी तुम करते हो,
सब कुछ जायज,
सब कुछ रायज।

नए जगत में आँखें खालों,
नए जगगत की चालें देखों,
नहीं बुद्धि से कुछ समझा तो
ठोकर खाकर तो कुछ सीखों,
और भुलाओ पाठ पुराने।

अपना सारा हिस्सा खोकर,
तुम बैठे हो निश्वल होकर
कैसे कायर!
उठो भाग अब अपना माँगो,
बंग देश के भूखो जागो!

घोषित कर दो दिग दिगंत में
भूख नहीं है भीख चाहती,
भूख नहीं है भीख माँगती,
भीख माँगते केवल कादर,
केवल काहिल, 
केवल बुजदिल;
भूख बली है,
भूख चली है
अब अपने प्रति न्याय माँगने,
अब अपना अधिकार माँगने,
और न दो तो रार माँगने।

कम पर मत संतोष करो तुम,
होश करो तुम,
कर संतोष कहाँ तुम पहुँचे,
हटते-हटते,
कटते-कटते,
घटते-घटते,
वहाँ जहाँ संतोष मरण है।

संतो ने संतोष सिखाया?
इसी नतीजे पर पहुँचाया
है तुमको तो
मैं कहता हूँ
संत तुम्हारे महा लंठ थे,
पर चालाक तुम्हारे शासक,
पर चालाक तुम्हारे शोषक,
जो दे लंबे-चौड़े चंदे,
करा कीर्तन,
करा हरिभजन,
इन संतों की सरस बानियाँ
हैं तुम पर बरसाते रहते,
शांत रहो तुम,
भ्रांत रहो तुम,
और तुम्हारी आग न जागे,
असंतोष का राग न जागे,
और तुम्हारे मुँह के अंदर
अटका रहे राम का रोड़ा
जिससे मुख से शब्द क्रान्ति का निकल न पाए!

नए जगत में आँखें खोलो,
नए जगत की चालें देखो,
नहीं बुद्धि से कुछ समझा तो
ठोकर खाकर कुछ तो सीखो,
और भुलाओ पाठ पुराने।

Sunday, 28 June 2015

बंगाल का काल / हरिवंशराय बच्चन / पृष्ठ ३

बोल अमर पुत्रों की जननी--
जननी श्री विद्यासागर की,
राष्ट्र गीत विरची बंकिम की,
मेघनाद-वध महाकाव्य के
प्रखर प्रणेता मधुसूदन की,
मानवता के वर विज्ञानी,
शरच्चंद्र की,
विश्ववंद्य कवि श्री रवींद्र की,
पिकी हिंद की सरोजिनी की,
तोरुदत्त औ श्री द्विजेंद्र की
और अग्निवीणा के वादक
कवि क़ाज़ी नज़रुलिस्लाम की।

बोल अजर पुत्रों की जननी--
जननी, भावी के वर द्रष्टा,
राजा मोहन राय सुधी की,
रामकृष्ण से परम यती की,
योगीश्वर अरविंद ज्ञानरत
और विवेकानंद व्रती की;
देश प्रेम के प्रथमोन्मेषक
’लाल’ ’बाल’ के बन्धु ’पाल’ औ’
विद्यावाचस्पति सुरेन्द्र की,
जिसका नाम वीर अर्जुन की
अमर प्रतिज्ञा
’न पलायन’ की
आंग्ल प्रतिध्वनि
बनकर हृदय-हृदय में गूँजी--
सुरेंदर नाथ,
सरेंडर नाट!
जननी ऐसे नाम धनी की,
औ उनके समकक्षी-से ही
वाग्मि घोष की,
देशबंधु श्री चितरंजन की,
आसुतोष की,
श्री सुबोस की!

बोल अभय पुत्रों की जननी--
परदेशी के प्रथम विरोधी,
परदेशी को प्रथम चुनौती
देनेवाले
उससे लोहा लेने वाले,
कासिम औ सिराज वीर की,
और क्रान्ति के अग्रदूत
उस क्षुधीराम की
जिसने अपनी वय किशोर में
ही यह सिद्ध किया अब भी
बुझी राख में आग छिपी है;
उसी आग की चिनगारी-से,
परम-साहसी,
बंब प्रहारी
रास बिहारी की, जो अब भी
ऐसा सुनने में आता है,
अन्य देश में
छद्म वेष में घूम-घूमकर
अलख जगाता है हुब्बुल वतनी का।
और शहीद यतींद्र धीर की
जिसने बंदीघर के अंदर
पल-पल गल-गल,
पल-पल घुल-घुल,
तिल-तिल मिट-मिट,
एकसठ दिन तक
अनशन व्रत रखकर
प्राण त्यागकर
यह बतलाया था हो बंदी देह
मगर आत्मा स्वतंत्र है!

बोल अमर पुत्रों की जननी,
बोल अजर पुत्रों की जननी,
बोल अभय पुत्रों की जननी,
बोल बंग की वीर मेदिनी,
अब वह तेरा मान कहाँ है,
अब वह तेरी शान कहाँ है,
जीने का अरमान कहाँ है,
मरने का अभिमान कहाँ है!

बोल बंग की वीर मेदिनी,
अब वह तेरा क्रोध कहाँ है,
तेरा विगत विरोध कहाँ है,
अनयों का अवरोध कहाँ है!
भूलों का परिशोध कहाँ है!

बोल बंग की वीर मेदिनी,
अब वह तेरी आग कहाँ है,
आज़ादी का राग कहाँ है,
लगन कहाँ हैं, लाग कहाँ है!

बोल बंग की वीर मेदिनी,
अब तेरे सिरताज कहाँ हैं,
अब तेरे जाँबाज़ कहाँ हैं,
अब तेरी आवाज़ कहाँ हैं! 

बंकिम ने गर्वोन्नत ग्रीवा
उठा विश्व से
था यह पूछा,
'के बोले मा, तुमि अबले?'

मैं कहता हूँ,
तू अबला है।
तू होती, मा,
अगर न निर्बल,
अगर न दुर्बल,
तो तेरे यह लक्ष-लक्ष सुत
वंचित रहकर उसी अन्न से,
उसी धान्य से
जिसपर है अधिकार इन्हीं का,
क्योंकि इन्होंने अपने श्रम से
जोता, बोया,
इसे उगाया,
सींच स्वेद से
इसे बढ़ाया,
काटा, माड़ा, ढोया,
भूख-भूख कर,
सूख-सूखकर,
पंजर-पंजर,
गिर धरती पर,
यों न तोड़ देते अपना दम
और नपुंसक मृत्यु न मरते।