Saturday, 6 June 2015

भागते रहते है बस हम सब

ये ज़रूरी नहीं की मेरी हर इक बात से आप इत्तेफाक रखें, और ना ही मैं ऐसी कोई उम्मीद लगाता हूँ, क्योंकि इसकी उम्मीद करना खुद से बेईमानी कहलाएगी पर जैसा मेरे ब्लॉग का टाइटल कहता है मैं ऐसा मानता हूँ की हम सब भागमभाग में व्यस्त है।

एक ऐसी भागमभाग जो हमारे जन्म लेते ही शुरू हुई थी और हमारे ख़त्म होते ही ख़त्म हो जाएगी। ये भाग दौड़ किसलिए? कही इसका मकसद पैसा कमाना तो नहीं, फिर चाहे वो किसी की ज़ेब काट के मिले या गर्दन? या इसका मकसद है नाम कमाना? नाम कमाने की चाह वैसे तो सबमे होती है मगर इसकी इतनी चाह क्यों जबकि अपने जन्म से लेकर अपनी मौत तक हमारे नाम को हमसे ज़्यादा जानने वाले इस्तेमाल करते है, कभी बुलाने के लिए, कभी परिचय करवाने के लिए या कभी अन्य कारणों से।

ये कमाल की बात है की दिन भर हम सब अपने मालिक/ कर्मचारियों से ये उम्मीद करते है की वो हमारी इस भागमभाग के बदले हमें कुछ माली बढ़त देंगे, मगर ऐसा ना होने पर हम निराश भी होते है, पर इस भागमभाग की वजह क्या है? अपने भविष्य को सुधारना, या अपने बच्चों का? ये जानते हुए भी की भविष्य हमारे हाथ में नहीं होता और वर्तमान में जब हमें समझ, शांति और विवेक से काम करना चाहिए हम भाग रहे होते है, जैसे की हमारे सामने कोई जंग चल रही हो, एक ऐसी जँग जिसके हम हिस्सेदार है, मगर क्या वाकई इस तरह से हम कहीं पहुँचते भी है?

एक नौकरी, फिर दूसरी नौकरी, या फिर एक बिज़नस, फ़िर दूसरा, बस हमेशा काम निकालने की जुगाड़बाजी में लगे रहते है हम, एक घरौंदा बनाने की कोशिश में। जिनके घरौंदे बस गए है उन्हें बधाई, जिनके नहीं, उनके लिए बस यही कहूँगा:

ए खुदा, मुझे इतनी तो मयस्सर कर दे,
मैं जिस मकान में रहता हूँ, उसको घर कर दे।

मगर ये भागमभाग किसलिए? ये भागमभाग करते करते कहीं हम खुद से तो नहीं भाग रहे? क्या इस बात का एहसास कभी हमने किया है की इस 'Rat Race' के चक्कर में हम कही खुद रैट तो नहीं बन गए, जिसको अपना होश नहीं, कोई खबर नहीं, बस एक रेस में बचपन से पड़े हुए थे, अपनों को देखा इस तरह दौड़ते तो हम भी दौड़ने लगे, क्योंकि खुद कभी सोचने का वक़्त नहीं मिला या कभी खुद को वो वक़्त दिया नहीं।

सोचिए, और अपनी राय मुझे ज़रूर दें।

-अमित शुक्ला