Friday, 31 July 2015

जुगनू / हरिवंशराय बच्चन

अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
उठी ऐसी घटा नभ में
छिपे सब चांद औ' तारे,
उठा तूफान वह नभ में
गए बुझ दीप भी सारे,
मगर इस रात में भी लौ लगाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
गगन में गर्व से उठउठ,
गगन में गर्व से घिरघिर,
गरज कहती घटाएँ हैं,
नहीं होगा उजाला फिर,
मगर चिर ज्योति में निष्ठा जमाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
तिमिर के राज का ऐसा
कठिन आतंक छाया है,
उठा जो शीश सकते थे
उन्होनें सिर झुकाया है,
मगर विद्रोह की ज्वाला जलाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
प्रलय का सब समां बांधे
प्रलय की रात है छाई,
विनाशक शक्तियों की इस
तिमिर के बीच बन आई,
मगर निर्माण में आशा दृढ़ाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
प्रभंजन, मेघ दामिनी ने
न क्या तोड़ा, न क्या फोड़ा,
धरा के और नभ के बीच
कुछ साबित नहीं छोड़ा,
मगर विश्वास को अपने बचाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?
प्रलय की रात में सोचे
प्रणय की बात क्या कोई,
मगर पड़ प्रेम बंधन में
समझ किसने नहीं खोई,
किसी के पथ में पलकें बिछाए कौन बैठा है?
अँधेरी रात में दीपक जलाए कौन बैठा है?

Thursday, 30 July 2015

नीड का निर्माण / हरिवंशराय बच्चन

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

वह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा,
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँति घेरा,

रात-सा दिन हो गया, फिर
रात आ‌ई और काली,
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा,

रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

वह चले झोंके कि काँपे
भीम कायावान भूधर,
जड़ समेत उखड़-पुखड़कर
गिर पड़े, टूटे विटप वर,

हाय, तिनकों से विनिर्मित
घोंसलो पर क्या न बीती,
डगमगा‌ए जबकि कंकड़,
ईंट, पत्थर के महल-घर;

बोल आशा के विहंगम,
किस जगह पर तू छिपा था,
जो गगन पर चढ़ उठाता
गर्व से निज तान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों
में उषा है मुसकराती,
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती;

एक चिड़िया चोंच में तिनका
लि‌ए जो जा रही है,
वह सहज में ही पवन
उंचास को नीचा दिखाती!

नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

Wednesday, 29 July 2015

को‌ई गाता मैं सो जाता / हरिवंशराय बच्चन

संस्रिति के विस्तृत सागर में
सपनो की नौका के अंदर
दुख सुख कि लहरों मे उठ गिर
बहता जाता, मैं सो जाता ।

आँखों में भरकर प्यार अमर
आशीष हथेली में भरकर
को‌ई मेरा सिर गोदी में रख
सहलाता, मैं सो जाता ।

मेरे जीवन का खाराजल
मेरे जीवन का हालाहल
को‌ई अपने स्वर में मधुमय कर
बरसाता मैं सो जाता ।

को‌ई गाता मैं सो जाता
मैं सो जाता
मैं सो जाता

Tuesday, 28 July 2015

तीर पर कैसे रुकूँ मैं आज लहरों में निमंत्रण! / हरिवंशराय बच्चन

तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!
रात का अंतिम प्रहर है, झिलमिलाते हैं सितारे,
वक्ष पर युग बाहु बाँधे, मैं खड़ा सागर किनारे
वेग से बहता प्रभंजन, केश-पट मेरे उड़ाता,
शून्य में भरता उदधि-उर की रहस्यमयी पुकारें,
इन पुकारों की प्रतिध्वनि, हो रही मेरे हृदय में,
है प्रतिच्छायित जहाँ पर, सिंधु का हिल्लोल - कंपन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,आज लहरों में निमंत्रण!

विश्व की संपूर्ण पीड़ा सम्मिलित हो रो रही है,
शुष्क पृथ्वी आँसुओं से पाँव अपने धो रही है,
इस धरा पर जो बसी दुनिया यही अनुरूप उसके--
इस व्यथा से हो न विचलित नींद सुख की सो रही है,
क्यों धरणि अब तक न गलकर लीन जलनिधि में गई हो?
देखते क्यों नेत्र कवि के भूमि पर जड़-तुल्य जीवन?
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!

जड़ जगत में वास कर भी, जड़ नहीं व्यवहार कवि का
भावनाओं से विनिर्मित, और ही संसार कवि का,
बूँद के उच्छ्वास को भी, अनसुनी करता नहीं वह,
किस तरह होता उपेक्षा-पात्र पारावार कवि का,
विश्व-पीड़ा से, सुपरिचित, हो तरल बनने, पिघलने,
त्याग कर आया यहाँ कवि, स्वप्न-लोकों के प्रलोभन।
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण। 

जिस तरह मरु के हृदय में, है कहीं लहरा रहा सर,
जिस तरह पावस-पवन में, है पपीहे का छिपा स्वर
जिस तरह से अश्रु-आहों से, भरी कवि की निशा में
नींद की परियाँ बनातीं, कल्पना का लोक सुखकर
सिंधु के इस तीव्र हाहाकार ने, विश्वास मेरा,
है छिपा रक्खा कहीं पर, एक रस-परिपूर्ण गायन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण

नेत्र सहसा आज मेरे, तम-पटल के पार जाकर
देखते हैं रत्न-सीपी से, बना प्रासाद सुन्दर
है खड़ी जिसमें उषा ले, दीप कुंचित रश्मियों का,
ज्योति में जिसकी सुनहरली, सिंधु कन्याएँ मनोहर
गूढ़ अर्थों से भरी मुद्रा, बनाकर गान करतीं
और करतीं अति अलौकिक, ताल पर उन्मत्त नर्तन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!

मौन हो गंधर्व बैठे, कर श्रवण इस गान का स्वर,
वाद्य-यंत्रों पर चलाते, हैं नहीं अब हाथ किन्नर,
अप्सराओं के उठे जो, पग उठे ही रह गए हैं,
कर्ण उत्सुक, नेत्र अपलक, साथ देवों के पुरन्दर
एक अद्भुत और अविचल, चित्र-सा है जान पड़ता,
देव बालाएँ विमानों से, रहीं कर पुष्प-वर्णन।
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!

दीर्घ उर में भी जलधि के, हैं नहीं खुशियाँ समाती,
बोल सकता कुछ न उठती, फूल वारंवार छाती,
हर्ष रत्नागार अपना, कुछ दिखा सकता जगत को,
भावनाओं से भरी यदि, यह फफककर फूट जाती,
सिन्धु जिस पर गर्व करता, और जिसकी अर्चना को
स्वर्ग झुकता, क्यों न उसके, प्रति करे कवि अर्घ्य अर्पण।
तीर पर कैसे रुकूँ में, आज लहरों में निमंत्रण!

आज अपने स्वप्न को मैं, सच बनाना चाहता हूँ,
दूर की इस कल्पना के, पास जाना चाहता हूँ,
चाहता हूँ तैर जाना, सामने अंबुधि पड़ा जो,
कुछ विभा उस पार की, इस पार लाना चाहता हूँ,
स्वर्ग के भी स्वप्न भू पर, देख उनसे दूर ही था,
किन्तु पाऊँगा नहीं कर आज अपने पर नियंत्रण।
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण,

लौट आया यदि वहाँ से, तो यहाँ नव युग लगेगा,
नव प्रभाती गान सुनकर, भाग्य जगती का जगेगा,
शुष्क जड़ता शीघ्र बदलेगी, सरल चैतन्यता में,
यदि न पाया लौट, मुझको, लाभ जीवन का मिलेगा,
पर पहुँच ही यदि न पाया, व्यर्थ क्या प्रस्थान होगा?
कर सकूँगा विश्व में फिर भी नए पथ का प्रदर्शन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!

स्थल गया है भर पथों से, नाम कितनों के गिनाऊँ,
स्थान बाकी है कहाँ पथ, एक अपना भी बनाऊँ?
विश्व तो चलता रहा है, थाम राह बनी-बनाई
किंतु इनपर किस तरह मैं, कवि-चरण अपने बढ़ाऊँ?
राह जल पर भी बनी है, रूढ़ि, पर, न हुई कभी वह,
एक तिनका भी बना सकता, यहाँ पर मार्ग नूतन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!

देखता हूँ आँख के आगे नया यह क्या तमाशा -
कर निकलकर दीर्घ जल से हिल रहा करता मना-सा,
है हथेली-मध्य चित्रित नीर मग्नप्राय बेड़ा!
मैं इसे पहचानता हूँ, हैं नहीं क्या यह निराशा?
हो पड़ी उद्दाम इतनी, उर-उमंगे, अब न उनको
रोक सकता भय निराशा का, न आशा का प्रवंचन।
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!

पोत अगणित इन तरंगों ने, डुबाए मानता मैं,
पार भी पहुँचे बहुत-से, बात यह भी जानता मैं,
किन्तु होता सत्य यदि यह भी, सभी जलयान डूबे,
पार जाने की प्रतिज्ञा आज बरबस ठानता मैं,
डूबता मैं, किंतु उतराता सदा व्यक्तित्व मेरा
हों युवक डूबे भले ही है कभी डूबा न यौवन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!

आ रहीं प्राची क्षितिज से खींचने वाली सदाएँ,
मानवों के भाग्य-निर्णायक सितारों! दो दुआएँ,
नाव, नाविक, फेर ले जा, हैं नहीं कुछ काम इसका,
आज लहरों से उलझने को फड़कती हैं भुजाएँ
प्राप्त हो उस पार भी इस पार-सा चाहे अंधेरा,
प्राप्त हो युग की उषा चाहे लुटाती नव किरन-धन!
तीर पर कैसे रुकूँ मैं, आज लहरों में निमंत्रण!

Monday, 27 July 2015

तुम गा दो मेरा गान अमर हो जाये / हरिवंशराय बच्चन

तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए!

मेरे वर्ण-वर्ण विश्रंखल,
चरण-चरण भरमाए,
गूंज-गूंज कर मिटने वाले
मैनें गीत बनाये;

कूक हो गई हूक गगन की
कोकिल के कंठो पर,

तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए!



जब-जब जग ने कर फैलाए,
मैनें कोष लुटाया,
रंक हुआ मैं निज निधि खोकर
जगती ने क्या पाया!

भेंट न जिसमें मैं कुछ खोऊं,
पर तुम सब कुछ पाओ,

तुम ले लो, मेरा दान अमर हो जाए!
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए!



सुन्दर और असुन्दर जग में
मैनें क्या न सराहा,
इतनी ममतामय दुनिया में
मैं केवल अनचाहा;

देखूं अब किसकी रुकती है
आ मुझ पर अभिलाषा,

तुम रख लो, मेरा मान अमर हो जाए!
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए!




दुख से जीवन बीता फिर भी
शेष अभी कुछ रहता,
जीवन की अंतिम घडियों में
भी तुमसे यह कहता

सुख की सांस पर होता
है अमरत्व निछावर,

तुम छू दो, मेरा प्राण अमर हो जाए!
तुम गा दो, मेरा गान अमर हो जाए!

Saturday, 25 July 2015

जैसा गाना था गा न सका / हरिवंशराय बच्चन

जैसा गाना था, गा न सका!

गाना था वह गायन अनुपम,
क्रंदन दुनिया का जाता थम,
अपने विक्षुब्ध हृदय को भी मैं अब तक शांत बना न सका!
जैसा गाना था, गा न सका!

जग की आहों को उर में भर
कर देना था, मुझको सस्वर,
निज आहों के आशय को भी मैं जगती को समझा न सका!
जैसा गाना था, गा न सका!

जन-दुख-सागर पर जाना था,
डुबकी ले थाह लगाना था,
निज आँसू की दो बूँदों में मैं कूल-किनारा पा न सका!
जैसा गाना था, गा न सका!

Friday, 24 July 2015

गीत मेरे / हरिवंशराय बच्‍चन

गीत मेरे, देहरी का दीप-सा बन।
एक दुनिया है हृदय में, मानता हूँ,
वह घिरी तम से, इसे भी जानता हूँ,
छा रहा है किंतु बाहर भी तिमिर-घन,
गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन।
प्राण की लौ से तुझे जिस काल बारुँ,
और अपने कंठ पर तुझको सँवारूँ,
कह उठे संसार, आया ज्‍योति का क्षण,
गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन।
दूर कर मुझमें भरी तू कालिमा जब,
फैल जाए विश्‍व में भी लालिमा तब,
जानता सीमा नहीं है अग्नि का कण,
गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन।
जग विभामय न तो काली रात मेरी,
मैं विभामय तो नहीं जगती अँधेरी,
यह रहे विश्‍वास मेरा यह रहे प्रण,
गीत मेरे, देहरी का द‍ीप-सा बन।

Thursday, 23 July 2015

यात्रा और यात्री / हरिवंशराय बच्चन

साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

चल रहा है तारकों का
दल गगन में गीत गाता,
चल रहा आकाश भी है
शून्य में भ्रमता-भ्रमाता,
पाँव के नीचे पड़ी
अचला नहीं, यह चंचला है,
एक कण भी, एक क्षण भी
एक थल पर टिक न पाता,
शक्तियाँ गति की तुझे
सब ओर से घेरे हु‌ए है;
स्थान से अपने तुझे
टलना पड़ेगा ही, मुसाफिर!
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

थे जहाँ पर गर्त पैरों
को ज़माना ही पड़ा था,
पत्थरों से पाँव के
छाले छिलाना ही पड़ा था,
घास मखमल-सी जहाँ थी
मन गया था लोट सहसा,
थी घनी छाया जहाँ पर
तन जुड़ाना ही पड़ा था,
पग परीक्षा, पग प्रलोभन
ज़ोर-कमज़ोरी भरा तू
इस तरफ डटना उधर
ढलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

शूल कुछ ऐसे, पगो में
चेतना की स्फूर्ति भरते,
तेज़ चलने को विवश
करते, हमेशा जबकि गड़ते,
शुक्रिया उनका कि वे
पथ को रहे प्रेरक बना‌ए,
किन्तु कुछ ऐसे कि रुकने
के लि‌ए मजबूर करते,
और जो उत्साह का
देते कलेजा चीर, ऐसे
कंटकों का दल तुझे
दलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

सूर्य ने हँसना भुलाया,
चंद्रमा ने मुस्कुराना,
और भूली यामिनी भी
तारिका‌ओं को जगाना,
एक झोंके ने बुझाया
हाथ का भी दीप लेकिन
मत बना इसको पथिक तू
बैठ जाने का बहाना,
एक कोने में हृदय के
आग तेरे जग रही है,
देखने को मग तुझे
जलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

वह कठिन पथ और कब
उसकी मुसीबत भूलती है,
साँस उसकी याद करके
भी अभी तक फूलती है;
यह मनुज की वीरता है
या कि उसकी बेहया‌ई,
साथ ही आशा सुखों का
स्वप्न लेकर झूलती है
सत्य सुधियाँ, झूठ शायद
स्वप्न, पर चलना अगर है,
झूठ से सच को तुझे
छलना पड़ेगा ही, मुसाफिर;
साँस चलती है तुझे
चलना पड़ेगा ही मुसाफिर!

Wednesday, 22 July 2015

अफ्रीकी लोक-कथा : चींटियाँ भारी बोझा क्यूँ ढोती हैं

Republished from Hindizen

अनानसी और उसका बेटा कवेकू – दोनों बहुत चतुर किसान थे. उन दोनों के खेत अलग-अलग थे और हर साल उनमें लहलहाती फसल होती थी. एक साल दुर्भाग्यवश उन्होंने अपने सबसे अच्छे बीज खेत में बोए लेकिन बारिश नहीं होने के कारण उनके खेत में कुछ भी न उगा.
उदास कवेकू अपने सूखे खेत में घूम रहा था और सोच रहा था कि इस साल उसके परिवार को अन्न कहाँ से मिलेगा. उसने खेत की मेड़ पर एक कुबड़े बौने को बैठा देखा. बौने ने कवेकू से उदास होने का कारण पूछा. कवेकू के बताने पर बौने ने कहा कि वह खेत में बारिश लाने में उसकी मदद करेगा. उसने कवेकू से कहा कि वह कहीं से दो छोटी लकडियाँ ले आए और उन्हें उसके कूबड़ पर ढ़ोल की तरह बजाए. कवेकू ने ऐसा ही किया. वे दोनों गाने लगे:
“पानी, पानी ऊपर जाओ;
बारिश बनकर नीचे आओ!”
यह देखकर कवेकू की ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा कि गाते-गाते ज़ोरदार बारिश होने लगी और खेत की मिटटी ने पूरे पानी को सोख लिया. अगले ही दिन बीजों से अंकुर फूट पड़े और बढ़िया फसल होने लगी.
अनानसी को जल्द ही कवेकू के खेत में बढ़िया फसल होने की खबर मिल गई. उसका खुद का खेत तो सूखा ही पड़ा था. वह कवेकू के पास गया और उसने कवेकू से बारिश होने का कारण पूछा. कवेकू का मन साफ़ था और उसने कुबड़े बौने वाली बात अपने पिता को बता दी.
अनानसी ने भी उसी तरह से अपने खेत में पानी लाने का निश्चय किया. उसने दो मोटी लकडियाँ ले लीं और सोचा – “मेरे बेटे ने कुबड़े बौने से छोटी लकड़ियों से काम लिया. मैं मोटी लकडियां इस्तेमाल करके उससे दुगनी बारिश करवाऊँगा.”
जब उसने कुबड़े बौने को अपनी ओर आते देखा उसने सावधानी से दोनों लकडियाँ छुपा दीं. पहले की तरह कुबड़े बौने ने अनानसी से उदास होने का कारण पूछा और अनानसी ने उसे अपनी समस्या बता दी. कुबड़े ने उससे कहा – “कहीं से दो छोटी लकडियाँ ले आओ और उन्हें मेरे कूबड़ पर ढोल की तरह बजाओ. मैं बारिश को बुला दूंगा.”
लेकिन अनानसी ने अपनी मोटी लकडियां निकाल लीं और उनसे उसने कुबड़े बौने को इतनी जोर से पीटा कि बेचारा बौना मर गया. अनानसी यह देखकर बहुत डर गया क्योंकि उसे मालूम था कि बौना वहां के राजा का चहेता जोकर था. वह सोचने लगा कि इस घटना का दोष वह किसके मत्थे मढे. उसने बौने का मृत शरीर उठाया और उसे एक कोला के पेड़ के पास ले गया. उसने मृत बौने को पेड़ की ऊपरी शाखा पर बिठा दिया और पेड़ के नीचे बैठकर किसी के आने की प्रतीक्षा करने लगा.
इस बीच कवेकू यह देखने के लिए आया कि उसने पिता को बारिश कराने में सफलता मिली या नहीं. उसने अपने पिता को पेड़ के नीचे अकेले बैठे देखा और उससे पूछा – “पिताजी, क्या आपको कुबड़ा बौना नहीं मिला?”
अनानसी ने कहा – “मिल गया. लेकिन वह पेड़ पर चढ़कर कोला लेने गया है और मैं उसकी प्रतीक्षा कर रहा हूँ.”
“मैं ऊपर चढ़कर उसे नीचे लिवा लाता हूँ” – कवेकू ने कहा और वह फ़ौरन पेड़ पर चढ़ गया. पेड़ के ऊपर उसने जैसे ही बौने को छुआ, बौना धड़ाम से नीचे गिर गया.”
“अरे, ये तुमने क्या कर दिया!” – कपटी अनानसी चिल्लाया – “तुमने राजा के चहेते जोकर को मार डाला!
“हाँ!” – कवेकू ने कहा. अब तक वह अपने पिता की चाल को समझ चुका था. वह बोला – “राजा उससे बहुत नाराज़ है और उसने कुबड़े बौने को मारने वाले को एक थैली सोना देने की मुनादी की है. मैं अब जाकर अपना ईनाम लूँगा.”
“नहीं! नहीं!” – अनानसी चिल्लाया – “ईनाम मैं लूँगा! मैंने उसे दो मोटी लकड़ियों से पीटकर मारा है. उसे मैं राजा के पास ले जाऊंगा!”
“ठीक है” – कवेकू ने कहा – “अगर आपने उसे मारा है तो आप ही ले जाओ”.
ईनाम मिलने के लालच में अनानसी बौने की लाश को ढोकर ले गया. राजा अपने प्रिय बौने की मृत्यु के बारे में जानकार बड़ा क्रोधित हुआ. उसने बौने की लाश को एक बड़े बक्से में बंद करके यह आदेश दिया कि अनानसी सजा के रूप में उस बक्से को हमेशा अपने सर के ऊपर ढोएगा. राजा ने बक्से पर ऐसा जादू-टोना करवा दिया कि बक्सा कभी भी जमीन पर न उतारा जा सके. अनानसी उस बक्से को किसी और के सर पर रखकर ही उससे मुक्ति पा सकता था और कोई भी ऐसा करने को राज़ी नहीं था.
अनानसी उस बक्से को अपने सर पर ढोकर दुहरा सा हो गया. एक दिन उसे रास्ते में एक चींटी मिली. अनानसी ने चींटी से कहा – “क्या तुम कुछ देर के लिए इस बक्से को अपने सर पर रख लोगी? मुझे बाज़ार जाकर कुछ ज़रूरी सामान खरीदना है”.
चींटी ने अनानसी से कहा – “अनानसी, मैं तुम्हारी सारी चालाकी समझती हूँ. तुम इस बक्से से छुटकारा पाना चाहते हो”.
“नहीं, नहीं. ऐसा नहीं है. मैं सच कह रहा हूँ कि मैं जल्द ही वापस आ जाऊँगा और तुमसे ये बक्सा ले लूँगा!” – अनानसी बोला.
बेचारी भोली-भाली चींटी अनानसी के बहकावे में आ गई. उसने वह बक्सा अपने सर पर रखवा लिया. अनानसी वहां से जाने के बाद फिर कभी वापस नहीं आया. चींटी ज़िन्दगी भर उसकी राह देखती रही और एक दिन मर गई. उसी चींटी की याद में सारी चींटियाँ अपने शरीर से भी बड़े और भारी बोझ ढोती रहती हैं.
(African folktale – why ants carry heavy loads on their back – in Hindi)