Monday, 31 August 2015

जीवन की ही जय हो / मैथिलीशरण गुप्त

मृषा मृत्यु का भय है
जीवन की ही जय है ।

जीव की जड़ जमा रहा है
नित नव वैभव कमा रहा है
यह आत्मा अक्षय है
जीवन की ही जय है।

नया जन्म ही जग पाता है
मरण मूढ़-सा रह जाता है
एक बीज सौ उपजाता है
सृष्टा बड़ा सदय है
जीवन की ही जय है।

जीवन पर सौ बार मरूँ मैं
क्या इस धन को गाड़ धरूँ मैं
यदि न उचित उपयोग करूँ मैं
तो फिर महाप्रलय है
जीवन की ही जय है।

Sunday, 30 August 2015

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं / अटल बिहारी वाजपेयी

भारत जमीन का टुकड़ा नहीं,
जीता जागता राष्ट्रपुरुष है।
हिमालय मस्तक है, कश्मीर किरीट है,
पंजाब और बंगाल दो विशाल कंधे हैं।
पूर्वी और पश्चिमी घाट दो विशाल जंघायें हैं।
कन्याकुमारी इसके चरण हैं, सागर इसके पग पखारता है।
यह चन्दन की भूमि है, अभिनन्दन की भूमि है,
यह तर्पण की भूमि है, यह अर्पण की भूमि है।
इसका कंकर-कंकर शंकर है,
इसका बिन्दु-बिन्दु गंगाजल है।
हम जियेंगे तो इसके लिये
मरेंगे तो इसके लिये।

Saturday, 29 August 2015

उसे यह फ़िक्र है हरदम / भगतसिंह

उसे यह फ़िक्र है हरदम,
नया तर्जे-जफ़ा क्या है?
हमें यह शौक देखें,
सितम की इंतहा क्या है?
दहर से क्यों खफ़ा रहे,
चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदू सही,
आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमान हूँ,
ए-अहले-महफ़िल,
चरागे सहर हूँ,
बुझा चाहता हूँ।
मेरी हवाओं में रहेगी,
ख़यालों की बिजली,
यह मुश्त-ए-ख़ाक है फ़ानी,
रहे रहे न रहे।

रचनाकाल: मार्च 1931

Friday, 28 August 2015

भारत / रामधारी सिंह "दिनकर"

सीखे नित नूतन ज्ञान,नई परिभाषाएं,
जब आग लगे,गहरी समाधि में रम जाओ;
या सिर के बल हो खडे परिक्रमा में घूमो।
ढब और कौन हैं चतुर बुद्धि-बाजीगर के?
गांधी को उल्‍टा घिसो और जो धूल झरे,
उसके प्रलेप से अपनी कुण्‍ठा के मुख पर,
ऐसी नक्‍काशी गढो कि जो देखे, बोले,
आखिर , बापू भी और बात क्‍या कहते थे?
डगमगा रहे हों पांव लोग जब हंसते हों,
मत चिढो,ध्‍यान मत दो इन छोटी बातों पर
कल्‍पना जगदगुरु की हो जिसके सिर पर,
वह भला कहां तक ठोस कदम धर सकता है?
औ; गिर भी जो तुम गये किसी गहराई में,
तब भी तो इतनी बात शेष रह जाएगी
यह पतन नहीं, है एक देश पाताल गया,
प्‍यासी धरती के लिए अमृतघट लाने को।

Thursday, 27 August 2015

नर हो, न निराश करो मन को / मैथिलीशरण गुप्त

नर हो, न निराश करो मन को

कुछ काम करो, कुछ काम करो
जग में रह कर कुछ नाम करो
यह जन्म हुआ किस अर्थ अहो
समझो जिसमें यह व्यर्थ न हो
कुछ तो उपयुक्त करो तन को
नर हो, न निराश करो मन को।

संभलो कि सुयोग न जाय चला
कब व्यर्थ हुआ सदुपाय भला
समझो जग को न निरा सपना
पथ आप प्रशस्त करो अपना
अखिलेश्वर है अवलंबन को
नर हो, न निराश करो मन को।

जब प्राप्त तुम्हें सब तत्त्व यहाँ
फिर जा सकता वह सत्त्व कहाँ
तुम स्वत्त्व सुधा रस पान करो
उठके अमरत्व विधान करो
दवरूप रहो भव कानन को
नर हो न निराश करो मन को।

निज गौरव का नित ज्ञान रहे
हम भी कुछ हैं यह ध्यान रहे
मरणोंत्‍तर गुंजित गान रहे
सब जाय अभी पर मान रहे
कुछ हो न तज़ो निज साधन को
नर हो, न निराश करो मन को।

प्रभु ने तुमको कर दान किए
सब वांछित वस्तु विधान किए
तुम प्राप्‍त करो उनको न अहो
फिर है यह किसका दोष कहो
समझो न अलभ्य किसी धन को
नर हो, न निराश करो मन को। 

किस गौरव के तुम योग्य नहीं
कब कौन तुम्हें सुख भोग्य नहीं
जान हो तुम भी जगदीश्वर के
सब है जिसके अपने घर के 
फिर दुर्लभ क्या उसके जन को
नर हो, न निराश करो मन को। 

करके विधि वाद न खेद करो
निज लक्ष्य निरन्तर भेद करो
बनता बस उद्‌यम ही विधि है
मिलती जिससे सुख की निधि है
समझो धिक् निष्क्रिय जीवन को
नर हो, न निराश करो मन को
कुछ काम करो, कुछ काम करो।

Tuesday, 25 August 2015

जंगल में नास्तिक

अफ़्रीका के जंगलों से गुज़रते समय एक नास्तिक वैज्ञानिक विकासवाद के कारण अस्तित्व में आए प्राकृतिक सौंदर्य की सराहना करता जा रहा था.
“कितने सुंदर विराट वृक्ष! कितनी वेगवती नदियां! कितने सुंदर प्राणी! और यह सब किसी के हस्तक्षेप के बिना अपने आप ही घटित हो गया! दुनिया में केवल अज्ञानी और कायर ही हैं जो किसी अज्ञात शक्ति के भय से ग्रस्त होकर चमत्कारिक ब्रह्मांड के अस्तित्व का श्रेय नाहक ही ईश्वर को देते हैं.”
तभी उसके पीछे झाड़ियों में कुछ आहट हुई. एक शेर नास्तिक पर झपटा. उसने भागने की कोशिश की लेकिन शेर ने उसे चित कर दिया.
जब कोई राह न सूझी, नास्तिक के मुंह से निकल पड़ा, “भगवान बचाओ!”
और एक चमत्कार हुआ: सब कुछ थम गया. वातावरण में दिव्य प्रकाश व्याप्त हो गया और एक आवाज़ आई:
“तुम क्या चाहते हो? इतने वर्षों तक तुम मेरे अस्तित्व को नकारते रहे और दूसरों को भी यह समझाते रहे कि ईश्वर का कोई वजूद नहीं है. तुमने मेरी रची दुनिया को महज़ “घटनाओं का संयोग” कहा.
नास्तिक को अचरज में कुछ न सूझा, वह बोला:
“सिर्फ इसलिए कि मैं अगले ही पल मरनेवाला हूं, मैं पाखंड का आश्रय नहीं लूंगा. मैं पूरी ज़िंदगी यही सिद्ध करता रहा हूं कि तुम्हारा कोई अस्तित्व नहीं है.”
“अच्छा, तो अब तुम मुझसे क्या चाहते हो?”
नास्तिक ने एक पल को विचार किया. वह जानता था कि अब किसी संवाद की गुंजाइश नहीं थी. अंततः उसने कहा:
“मैं नहीं बदल सकता लेकिन यह शेर तो बदल सकता है. तुम इस खूंखार भयानक शेर को आस्थावान ईसाई बना दो!”
उसी क्षण दिव्य प्रकाश लुप्त हो गया. जंगल में चिड़ियों की चहचहाहट फिर से सुनाई देनी लगी. शेर नास्तिक के ऊपर से उतर गया. उसने श्रृद्धा से अपना सर झुकाया, और नम्रतापूर्वक बोला:
“हे ईश्वर, मेरी भूख मिटाने के लिए तूने अपार उदारता दिखाई और मुझे यह भोजन सौंपा. तुझे लाख-लाख धन्यवाद प्रभु…”
(~_~)

Monday, 24 August 2015

एक टुकड़ा सत्य

Hindizen Se Saabhaar

lonely reader

एक दिन शैतान और उसका एक मित्र साथ बैठकर बातचीत कर रहे थे। उनहोंने एक आदमी को सामने से आते हुए देखा। उस आदमी ने सड़क पर झुककर कुछ उठाकर अपने पास रख लिया।
“उसने सड़क से क्या उठाया?” – शैतान के मित्र ने शैतान से पूछा।
“एक टुकड़ा सत्य” – शैतान ने जवाब दिया।
शैतान का मित्र चिंतित हो गया। सत्य का एक टुकड़ा तो उस आदमी की आत्मा को बचा लेगा! इसका अर्थ यह है की नर्क में एक आदमी कम हो जाएगा!
लेकिन शैतान चुपचाप बैठा सब कुछ देखता रहा।
“तुम बिल्कुल परेशान नहीं लगते!?” – मित्र ने कहा – “उसे सत्य का एक टुकड़ा मिल गया है!”
“न! इसमें चिंता की कोई बात नहीं है।” – शैतान बोला।
मित्र ने पूछा – “क्या तुम्हें पता है कि वह आदमी उस सत्य के टुकड़े का क्या करेगा!?”
शैतान ने उत्तर दिया – “हमेशा की तरह वह उससे एक नए धर्म की स्थापना करेगा और इस प्रकार वह लोगों को पूर्ण सत्य से थोड़ा और दूर कर देगा।”
(~_~)

Sunday, 23 August 2015

साथी, घर-घर आज दिवाली / हरिवंशराय बच्चन

साथी, घर-घर आज दिवाली!

फैल गयी दीपों की माला
मंदिर-मंदिर में उजियाला,
किंतु हमारे घर का, देखो, दर काला, दीवारें काली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!

हास उमंग हृदय में भर-भर
घूम रहा गृह-गृह पथ-पथ पर,
किंतु हमारे घर के अंदर डरा हुआ सूनापन खाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!

आँख हमारी नभ-मंडल पर,
वही हमारा नीलम का घर,
दीप मालिका मना रही है रात हमारी तारोंवाली!
साथी, घर-घर आज दिवाली!

Saturday, 22 August 2015

है यह पतझड़ की शाम, सखे! / हरिवंशराय बच्‍चन

है यह पतझड़ की शाम, सखे!

नीलम-से पल्लव टूट गए,
मरकत-से साथी छूट गए,
अटके फिर भी दो पीत पात जीवन-डाली को थाम, सखे!
है यह पतझड़ की शाम, सखे!

लुक-छिप करके गानेवाली,
मानव से शरमानेवाली,
कू-कू कर कोयल मांग रही नूतन घूँघट अविराम, सखे!
है यह पतझड़ की शाम, सखे!

नंगी डालों पर नीड़ सघन,
नीड़ों में हैं कुछ-कुछ कंपन,
मत देख, नज़र लग जाएगी; यह चिड़ियों के सुखधाम, सखे!
है यह पतझड़ की शाम, सखे!

Friday, 21 August 2015

एक कहानी / हरिवंशराय बच्चन

एक कहानी
(१)
कहानी है सृष्टि के प्रारम्भ की। पृथ्वी पर मनुष्य था, मनुष्य में हृदय था, हृदय में पूजा की भावना थी, पर देवता न थे। वह सूर्य को अर्ध्यदान देता था, अग्नि को हविष समर्प्ति कर्ता था, पर वह इतने से ही संतुष्ट न था। वह कुछ और चाहता था।
उसने ऊपर की ओर हाथ उठाकर प्रार्थना की, ’हे स्वर्ग ! तूने हमारे लिए पृथ्वी पर सब सुविधाएँ दीं, पर तूने हमारे लिए कोई देवता नहीं दिया। तू देवताओं से भरा हुआ है, हमारे लिए एक देवता भेज दे जिसे हम अपनी भेंट चढा सकें, जो हमारी भेंट पाकर मुस्कुरा सके, जो हमारे हृदय की भावनाओं को समझ सके। हमें एक साक्षात देवता भेज दे।’
पृथ्वी के बाल-काल के मनुष्य की उस प्रार्थना में इतनी सरलता थी, इतनी सत्यता थी कि स्वर्ग पसीज उठा। आकाशवाणी हुई, ’जा मंदिर बना, शरद ॠतु की पूर्णिमा को जिस समय चंद्र बिंब क्षितिज के ऊपर उठेगा उसी समय मंदिर में देवता प्रकट होंगे। जा, मंदिर बना।’ मनुष्य का हृदय आनन्द से गद्गद हो उठा। उसने स्वर्ग को बारबार प्रणाम किया।
पृथ्वी पर देवता आयेंगे!—इस प्रत्याशा ने मनुष्य के जीवन में अपरिमित स्फूर्ति भर दी। अल्पकाल में ही मन्दिर का निर्माण हो गया। चंदन का द्वार लग गया। पुजारी की नियुक्ति हो गई। शरद पूर्णिमा भी आ गई। भक्तगण सवेरे से ही जलपात्र और फूल अक्षत के थाल ले-लेकर मंदिर के चारों ओर एकत्र होने लगे। संध्या तक अपार जन समूह इकट्ठा हो गया। भक्तों की एक आँख पूर्व क्षितिज पर थी और दूसरी मंदिर के द्वार पर। पुजारी को आदेश था कि देवता के प्रकट होते ही वह शंखध्वनि करे और मंदिर के द्वार खोल दे।
पुजारी देवता की प्रतीक्षा में बैठ था—अपलक नेत्र, उत्सुक मन। सहसा देवता प्रकट हो गए। वे कितने सुंदर थे, कितने सरल थे, कितने सुकुमार थे, कितने कोमल ! देवता देवता ही थे।
बाहर भक्तों ने चंद्र बिंब देख लिया था। अगणित कंठों ने एक साथ नारे लगाए। देवता की जय ! देवता की जय !- इस महारव से दशों दिशाएँ गूँज उठीं, पर मंदिर से शंखध्वनि न सुन पड़ी।
पुजारी ने झरोखे से एक बार इस अपार जनसमूह को देखा और एक बार सुंदर, सुकुमार, सरल देवता को। पुजारी काँप उठा।
समस्त जन समूह क्रुद्ध कंठस्वर से एक साथ चिल्लाने लगा, ’मंदिर का द्वार खोलो, खोलो।’ पुजारी का हाथ कितनी बार साँकल तक जा-जाकर लौट आया।
हजारों हाथ एक साथ मंदिर के कपाट पीटने लगे, धक्के देने लगे। देखते ही देखते चंदन का द्वार टूट कर गिर पड़ा, भक्तगण मंदिर में घुस पड़े। पुजारी अपनी आँखें मूँदकर एक कोने में खड़ा हो गया।
देवता की पूजा होने लगी। बात की बात में देवता फूलों से लद गए, फूलों में छिप गए, फूलों से दब गए। रात भर भक्तगण इस पुष्प राशि को बढ़ाते रहे।
और सबेरे जब पुजारी ने फूलों को हटाया तो उसके नीचे थी देवता की लाश।

(२)
अब भी पृथ्वी पर मनुष्य था, मनुष्य में हृदय था, हृदय में पूजा की भावना थी, पर देवता न थे। अब भी वह सूर्य को अर्ध्यदान देता था, अग्नि को हविष समर्पित करता था, पर अब उसका असंतोष पहले से कहीं अधिक था। एक बार देवता की प्राप्ति ने उसकी प्यास जगा दी थी, उसकी चाह बढा दी थी। वह कुछ और चाहता था।
मनुष्य ने अपराध किया था और इस कारण लज्जित था। देवता की प्राप्ति ने उसकी प्यास जगा दी थी, उसकी चाह बढा दी थी। वह कुछ और चाहता था।
मनुष्य ने अपराध किया था और इस कारण लज्जित था। देवता की प्राप्ति स्वर्ग से ही हो सकती थी, पर वह स्वर्ग के सामने जाए किस मुँह से। उसने सोचा, स्वर्ग का हॄदय महान है, मनुष्य के एक अपराध को भी क्या वह क्षमा न करेगा।
उसने सर नीचा करके कहा, ’हे स्वर्ग, हमारा अपराध क्षमा कर, अब हमसे ऐसी भूल न होगी, हमारी फिर वही प्रार्थना है—पहले वाली।’
मनुष्य उत्तर की प्रत्याशा में खड़ा रहा। उसे कुछ भी उत्तर न मिला।
बहुत दिन बीत गए। मनुष्य ने सोचा समय सब कुछ भुला देता है, स्वर्ग से फिर प्रार्थना करनी चाहिए।
उसने हाथ जोड़कर विनय की, ’हे स्वर्ग, तू अगणित देवताओं का आवास है, हमें केवल एक देवता का प्रसाद और दे, हम उन्हें बहुत सँभाल कर रक्खेंगे।’
मनुष्य का ही स्वर दिशाओं से प्रतिध्वनित हुआ। स्वर्ग मौन रहा।
बहुत दिन फिर बीत गए। मनुष्य हार नहीं मानेगा। उसका यत्न नहीं रुकेगा। उसकी आवाज स्वर्ग को पहुँचनी होगी।
उसने दृढता के साथ खड़े होकर कहा, ’हे स्वर्ग, जब हमारे हृदय में पूजा की भावना है तो देवता पर हमारा अधिकार है। तू हमार अधिकार हमें क्यों नहीं देता?’
आकाश से गड़गड़ाहट का शब्द हुआ और कई शिला खंड़ पृथ्वी पर आ गिरे।
मनुष्य ने बड़े आश्चर्य से उन्हें देखा और मत्था ठोक कर बोला, ’वाह रे स्वर्ग, हमने तुझसे माँगा था देवता और तूने हमें भेजा है पत्थर ! पत्थर !
स्वर्ग बोला, ’हे महान मनुष्य, जबसे मैंने तेरी प्रार्थना सुनी तब से मैं एक पाँव से देवताओं के द्वार-द्वार घूमता रहा हूँ। मनुष्य की पूजा स्वीकार करने का प्रस्ताव सुनकर देवता थरथर काँपते हैं। तेरी पूजा देवताओं को अस्वीकृत नहीं, असह्य है। तेर एक पुष्प जब तेरे आत्मसमर्पण की भावना को लेकर देवता पर चढता है तो उसका भार समस्त ब्रह्मांड के भार को हल्का कर देता है। तेरा एक बूँद अर्ध्य जल जब तेरे विगलित हॄदय के अश्रुओं का प्रतीक बनकर देवता को अर्पित होता है तब सागर अपनी लघुता पर हाहाकार कर उठता है। छोटे देवों ने मुझसे क्या कहा, उसे क्या बताऊँ। देवताओं में सबसे अधिक तेजोपुंज सूर्य ने कहा था, मनुष्य पृथ्वी से मुझे जल चढाता है, मुझे भय है किसी न किसी दिन मैं अवश्य ठंढा पड़ जाऊँगा और मनुष्य किसी अन्य सूर्य की खोज करेगा। हे विशाल मानव, तेरी पूजा को सह सकने की शक्ति केवल इन पाषाणों में है।’
उसी दिन से मनुष्य ने पत्थरों को पूजना आरम्भ किया था और यह जानकर हिमालय सिहर उठा था।

Thursday, 20 August 2015

लहरों का निमंत्रण / हरिवंशराय बच्चन

तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !

     :१:
रात का अंतिम प्रहर है,
झिलमिलाते हैं सितारे ,
वक्ष पर युग बाहु बाँधे
मैं खड़ा सागर किनारे,
         वेग से बहता प्रभंजन
         केश पट मेरे उड़ाता,
    शून्य में भरता उदधि -
    उर की रहस्यमयी पुकारें;
इन पुकारों की प्रतिध्वनि 
हो रही मेरे ह्रदय में,
है प्रतिच्छायित जहाँ पर 
सिंधु का हिल्लोल कंपन .
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !

       :२:

विश्व की संपूर्ण पीड़ा
सम्मिलित हो रो रही है,
शुष्क पृथ्वी आंसुओं से 
पाँव अपने धो रही है,
          इस धरा पर जो बसी दुनिया 
          यही अनुरूप उनके--
    इस व्यथा से हो न विचलित 
    नींद सुख की सो रही है;
क्यों धरनि अबतक न गलकर
लीन जलनिधि में हो गई हो ?
देखते क्यों नेत्र कवि के
भूमि पर जड़-तुल्य जीवन ?
तीर पर कैसे रुकूँ मैं,
आज लहरों में निमंत्रण !

      :३:

  जर जगत में वास कर भी 
  जर नहीं ब्यबहार कवि का,
  भावनाओं से विनिर्मित
  और ही संसार कवि का,
         बूँद से उच्छ्वास को भी 
         अनसुनी करता नहीं वह
किस तरह होती उपेक्षा -
पात्र पारावार कवि का ,
  विश्व- पीड़ा से , सुपरिचित
  हो तरल बनने, पिघलने ,
  त्याग कर आया यहाँ कवि
  स्वप्न-लोकों के प्रलोभन .
  तीर पर कैसे रुकूं मैं,
  आज लहरों में निमंत्रण  ! 

      :४:

  जिस तरह मरू के ह्रदय में
  है कहीं लहरा रहा सर ,
  जिस तरह पावस- पवन में
  है पपीहे का छुपा स्वर ,
         जिस तरह से अश्रु- आहों से
         भरी कवि की निशा में 
नींद की परियां बनातीं
कल्पना का लोक सुखकर,
  सिंधु के इस तीव्र हाहा-
  कर ने , विश्वास मेरा ,
  है छिपा रक्खा कहीं पर
  एक रस-परिपूर्ण गायन.
  तीर पर कैसे रुकूं मैं 
  आज लहरों में निमंत्रण !

      :५:

  नेत्र सहसा आज मेरे
  तम पटल के पार जाकर 
  देखते हैं रत्न- सीपी से
  बना प्रासाद सुंदर ,
         है ख जिसमें उषा ले 
         दीप कुंचित रश्मियों का ;
ज्योति में जिसकी सुनहली 
सिंधु कन्याएँ मनोहर
  गूढ़ अर्थो से भरी मुद्रा
  बनाकर गान करतीं
  और करतीं अति अलौकिक
  ताल पर उन्मत्त नर्तन .
  तीर पर कैसे रुकूं मैं
  आज लहरों में निमंत्रण !

     :६:

  मौन हो गन्धर्व बैठे 
  कर स्रवन इस गान का स्वर,
  वाद्ध्य - यंत्रो पर चलाते 
  हैं नहीं अब हाथ किन्नर,
         अप्सराओं के उठे जो 
         पग उठे ही रह गए हैं,
कर्ण उत्सुक, नेत्र अपलक 
साथ देवों के पुरंदर
  एक अदभुत और अविचल
  चित्र- सा है जान पड़ता,
  देव- बालाएँ विमानो से 
  रहीं कर पुष्प- वर्षण.
  तीर पर कैसे रुकूं मैं,
  आज लहरों में निमंत्रण !

      :७:

  दीर्घ उर में भी जलधि के 
  है नहीं खुशियाँ समाती,
  बोल सकता कुछ न उठती
  फूल बारंबार छाती;
         हर्ष रत्नागार अपना 
         कुछ दिखा सकता जगत को 
भावनाओं से भरी यदि
यह फफककर फूट जाती;
  सिंधु जिस पर गर्व करता 
  और जिसकी अर्चना को 
  स्वर्ग झुकता, क्यों न उसके 
  प्रति करे कवि अर्ध्य अर्पण .
  तीर पर कैसे रुकूं मैं,
  आज लहरों में निमंत्रण !

         :८:

   आज अपने स्वप्न को मैं 
   सच बनाना चाहता हूँ ,
   दूर कि इस कल्पना के 
   पास जाना चाहता हूँ
         चाहता हूँ तैर जाना 
         सामने अंबुधि पड़ा जो ,
कुछ विभा उस पार की
इस पार लाना चाहता हूँ;
   स्वर्ग के भी स्वप्न भू पर 
   देख उनसे दूर ही था,
   किंतु पाऊँगा नहीं कर 
   आज अपने पर नियंत्रण .
   तीर पर कैसे रुकूं मैं ,
   आज लहरों में निमंत्रण !

        :९:

   लौट आया यदि वहाँ से 
   तो यहाँ नवयुग लगेगा ,
   नव प्रभाती गान सुनकर 
   भाग्य जगती का जागेगा ,
          शुष्क जड़ता शीघ्र बदलेगी 
          सरस चैतन्यता में ,
यदि न पाया लौट , मुझको 
लाभ जीवन का मिलेगा;
   पर पहुँच ही यदि न पाया 
   ब्यर्थ क्या प्रस्थान होगा?
कर सकूंगा विश्व में फिर 
भी नए पथ का प्रदर्शन.
तीर पर कैसे रुकू मैं ,
आज लहरों में निमंत्रण ! 


      :१०:

    स्थल गया है भर पथों से 
    नाम कितनों के गिनाऊँ,
    स्थान बाकी है कहाँ पथ
    एक अपना भी बनाऊं?
          विशव तो चलता रहा है 
          थाम राह बनी-बनाई,
किंतु इस पर किस तरह मैं 
कवि चरण अपने बढ़ाऊँ?
    राह जल पर भी बनी है 
    रुढि,पर, न हुई कभी वह,
    एक तिनका भी बना सकता 
    यहाँ पर मार्ग नूतन !
    तीर पर कैसे रुकूं मैं,
    आज लहरों में निमंत्रण!

           :११:

    देखता हूँ आँख के आगे 
    नया यह क्या तमाशा --
    कर निकलकर दीर्घ जल से 
    हिल रहा करता माना- सा 
            है हथेली मध्य चित्रित 
            नीर भग्नप्राय बेड़ा!
मै इसे पहचानता हूँ ,
है नहीं क्या यह निराशा ?
    हो पड़ी उद्दाम इतनी 
    उर-उमंगें , अब न उनको 
    रोक सकता हाय निराशा का,
    न आशा का प्रवंचन.
    तीर पर कैसे रुकूं मैं ,
    आज लहरों में निमंत्रण!

         :१२: 

    पोत अगणित इन तरंगों ने 
    डुबाए मानता मैं 
    पार भी पहुचे बहुत से --
    बात यह भी जनता मैं ,
          किंतु होता सत्य यदि यह 
          भी, सभी जलयान डूबे,
पार जाने की प्रतिज्ञा 
आज बरबस ठानता मैं,
    डूबता मैं किंतु उतराता
    सदा व्यक्तित्व मेरा,
    हों युवक डूबे भले ही 
    है कभी डूबा न यौवन !
    तीर पर कैसे रुकूं मैं,
    आज लहरों में निमंत्रण !

          :१३:

    आ रहीं प्राची क्षितिज से 
    खींचने वाली सदाएं 
    मानवों के भाग्य निर्णायक 
    सितारों! दो दुआए ,
           नाव, नाविक फेर ले जा ,
           है नहीं कुछ काम इसका ,
आज लहरों से उलझने को 
फड़कती हैं भुजाएं;
     प्राप्त हो उस पार भी इस 
     पार-सा चाहे अँधेरा ,
     प्राप्त हो युग की उषा 
     चाहे लुटाती नव किरण-धन.
     तीर पर कैसे रुकूं मैं ,
     आज लहरों में निमंत्रण!