Wednesday, 30 September 2015

रीढ़ की हड्डी / पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

मैं हूँ उनके साथ,खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
कभी नही जो तज सकते हैं, अपना न्यायोचित अधिकार
कभी नही जो सह सकते हैं, शीश नवाकर अत्याचार
एक अकेले हों, या उनके साथ खड़ी हो भारी भीड़
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
निर्भय होकर घोषित करते, जो अपने उदगार विचार
जिनकी जिह्वा पर होता है, उनके अंतर का अंगार
नहीं जिन्हें, चुप कर सकती है, आतताइयों की शमशीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
नहीं झुका करते जो दुनिया से करने को समझौता
ऊँचे से ऊँचे सपनो को देते रहते जो न्यौता
दूर देखती जिनकी पैनी आँख, भविष्यत का तम चीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
जो अपने कन्धों से पर्वत से बढ़ टक्कर लेते हैं
पथ की बाधाओं को जिनके पाँव चुनौती देते हैं
जिनको बाँध नही सकती है लोहे की बेड़ी जंजीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
जो चलते हैं अपने छप्पर के ऊपर लूका धर कर
हर जीत का सौदा करते जो प्राणों की बाजी पर
कूद उदधि में नही पलट कर जो फिर ताका करते तीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
जिनको यह अवकाश नही है, देखें कब तारे अनुकूल
जिनको यह परवाह नहीं है कब तक भद्रा, कब दिक्शूल
जिनके हाथों की चाबुक से चलती हें उनकी तकदीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़
तुम हो कौन, कहो जो मुझसे सही ग़लत पथ लो तो जान
सोच सोच कर, पूछ पूछ कर बोलो, कब चलता तूफ़ान
सत्पथ वह है, जिसपर अपनी छाती ताने जाते वीर
मैं हूँ उनके साथ, खड़ी जो सीधी रखते अपनी रीढ़

Tuesday, 29 September 2015

पागलपन

हिंदीज़ेन

एक ताकतवर जादूगर ने किसी शहर को तबाह कर देने की नीयत से वहां के कुँए में कोई जादुई रसायन डाल दिया. जिसने भी उस कुँए का पानी पिया वह पागल हो गया.
सारा शहर उसी कुँए से पानी लेता था. अगली सुबह उस कुँए का पानी पीनेवाले सारे लोग अपने होशहवास खो बैठे. शहर के राजा और उसके परिजनों ने उस कुँए का पानी नहीं पिया था क्योंकि उनके महल में उनका निजी कुआं था जिसमें जादूगर अपना रसायन नहीं मिला पाया था.
राजा ने अपनी जनता को सुधबुध में लाने के लिए कई फरमान जारी किये लेकिन उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा क्योंकि सारे कामगारों और पुलिसवालों ने भी जनता कुँए का पानी पिया था और सभी को यह लगा कि राजा बहक गया है और ऊलजलूल फरमान जारी कर रहा है. सभी राजा के महल तक गए और उन्होंने राजा से गद्दी छोड़ देने के लिए कहा.
राजा उन सबको समझाने-बुझाने के लिए महल से बाहर आ रहा था तब रानी ने उससे कहा – “क्यों न हम भी जनता कुँए का पानी पी लें! हम भी फिर उन्हीं जैसे हो जायेंगे.”
राजा और रानी ने भी जनता कुँए का पानी पी लिया और वे भी अपने नागरिकों की तरह बौरा गए और बेसिरपैर की हरकतें करने लगे.
अपने राजा को ‘बुद्धिमानीपूर्ण’ व्यवहार करते देख सभी नागरिकों ने निर्णय किया कि राजा को हटाने का कोई औचित्य नहीं है. उन्होंने तय किया कि राजा को ही राजकाज चलाने दिया जाय.

Sunday, 27 September 2015

पिता और पुत्र

हिंदीज़ेन

crow chick

एक बहुत बड़े घर में ड्राइंग रूम में सोफा पर एक 80 वर्षीय वृद्ध अपने 45 वर्षीय पुत्र के साथ बैठे हुए थे। पुत्र बहुत बड़ा विद्वान् था और अखबार पढने में व्यस्त था।
तभी कमरे की खिड़की पर एक कौवा आकर बैठ गया।
पिता ने पुत्र से पूछा – “ये क्या है?”
पुत्र ने कहा – “कौवा है”।
कुछ देर बाद पिता ने पुत्र से दूसरी बार पूछा – “ये क्या है?”
पुत्र ने कहा – “अभी दो मिनट पहले तो मैंने बताया था कि ये कौवा है।”
ज़रा देर बाद बूढ़े पिता ने पुत्र से फ़िर से पूछा – “ये खिड़की पर क्या बैठा है?”
इस बार पुत्र के चेहरे पर खीझ के भाव आ गए और वह झल्ला कर बोला – “ये कौवा है, कौवा!”
पिता ने कुछ देर बाद पुत्र से चौथी बार पूछा – “ये क्या है?”
पुत्र पिता पर चिल्लाने लगा – “आप मुझसे बार-बार एक ही बात क्यों पूछ रहे हैं? चार बार मैंने आपको बताया कि ये कौवा है! आपको क्या इतना भी नहीं पता! देख नहीं रहे कि मैं अखबार पढ़ रहा हूँ!?”
पिता उठकर धीरे-धीरे अपने कमरे में गया और अपने साथ एक बेहद फटी-पुरानी डायरी लेकर आया। उसमें से एक पन्ना खोलकर उसने पुत्र को पढने के लिए दिया। उस पन्ने पर लिखा हुआ था:
“आज मेरा तीन साल का बेटा मेरी गोद में बैठा हुआ था तभी खिड़की पर एक कौवा आकर बैठ गया। उसे देखकर मेरे बेटे ने मुझसे 23 बार पूछा – पापा-पापा ये क्या है? – और मैंने 23 बार उसे बताया – बेटा, ये कौवा है। – हर बार वो मुझसे एक ही बात पूछता और हर बार मैं उसे प्यार से गले लगाकर उसे बताता – ऐसा मैंने 23 बार किया।”
(~_~)

Saturday, 26 September 2015

छाता

हिंदीजेन से साभार।


ज़ेन गुरु के कक्ष में प्रवेश करने से पहले शिष्य ने अपना छाता और जूते बाहर छोड़ दिए.
“मैंने खिड़की से तुम्हें आते हुए देख लिया था” – गुरु ने पूछा – “तुमने अपने जूते छाते के दाईं ओर उतारे या बाईं ओर?”
“यह तो मुझे याद नहीं आ रहा. इससे क्या फर्क पड़ता है? मैं तो हर समय ज़ेन के रहस्य का ही मनन करता रहता हूँ”.
“यदि तुम जीवन की इन छोटी-छोटी बातों की ओर ध्यान नहीं दे सकते तो तुम कभी भी कुछ नहीं सीख पाओगे. हर समय सतत जागरण में रहो, हर क्षण तुमसे ध्यान देने की अपेक्षा करता है – यही ज़ेन का एकमात्र रहस्य है”.

Friday, 25 September 2015

संध्या सिंदूर लुटाती है / हरिवंशराय बच्चन

संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

रंगती स्‍वर्णिम रज से सुदंर
निज नीड़-अधीर खगों के पर,
तरुओं की डाली-डाली में कंचन के पात लगाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

करती सरि‍ता का जल पीला,
जो था पल भर पहले नीला,
नावों के पालों को सोने की चादर-सा चमकाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

उपहार हमें भी मिलता है,
श्रृंगार हमें भी मिलता है,
आँसू की बूंद कपोलों पर शोणित की-सी बन जाती है!
संध्‍या सिंदूर लुटाती है!

Thursday, 24 September 2015

दुःख / महादेवी वर्मा

रजतरश्मियों की छाया में धूमिल घन सा वह आता;
इस निदाघ के मानस में करुणा के स्रोत बहा जाता।

उसमें मर्म छिपा जीवन का,
एक तार अगणित कम्पन का,
एक सूत्र सबके बन्धन का,
संसृति के सूने पृष्ठों में करुणकाव्य वह लिख जाता।

वह उर में आता बन पाहुन,
कहता मन से, अब न कृपण बन,
मानस की निधियां लेता गिन,
दृग-द्वारों को खोल विश्वभिक्षुक पर, हँस बरसा आता।

यह जग है विस्मय से निर्मित,
मूक पथिक आते जाते नित,
नहीं प्राण प्राणों से परिचित,
यह उनका संकेत नहीं जिसके बिन विनिमय हो पाता।

मृगमरीचिका के चिर पथ पर,
सुख आता प्यासों के पग धर,
रुद्ध हृदय के पट लेता कर,
गर्वित कहता ’मैं मधु हूँ मुझसे क्या पतझर का नाता’।

दुख के पद छू बहते झर झर,
कण कण से आँसू के निर्झर,
हो उठता जीवन मृदु उर्वर,
लघु मानस में वह असीम जग को आमन्त्रित कर लाता।

Wednesday, 23 September 2015

पेंसिल और इरेज़र

From Hindizen

pencil and eraser

इस ब्लॉग के नियमित पाठक और सम्माननीय टिप्पणीकार श्री जी विश्वनाथ जी ने कुछ दिनों पूर्व मुझे एक ईमेल फौरवर्ड भेजा. उसे मैं यहाँ अनूदित करके पोस्ट कर रहा हूँ. आपको धन्यवाद, विश्वनाथ जी!
एक दिन एक पेंसिल ने इरेज़र (रबर) से कहा – “मुझे माफ़ कर दो…”
इरेज़र ने कहा – “क्यों? क्या हुआ? तुमने तो कुछ भी गलत नहीं किया!”
पेंसिल बोली – “मुझे यह देखकर दुःख होता है कि तुम्हें मेरे कारण चोट पहुँचती है. जब कभी मैं कोई गलती करती हूँ तब तुम उसे सुधारने के लिए आगे आ जाते हो. मेरी गलतियों के निशान मिटाते-मिटाते तुम खुद को ही खो बैठते हो. तुम छोटे, और छोटे होते-होते अपना अस्तित्व ही खो देते हो”.
इरेज़र ने कहा – “तुम सही कहती हो लेकिन मुझे उसका कोई खेद नहीं है. मेरे होने का अर्थ ही यही है! मुझे इसीलिए बनाया गया कि जब कभी तुम कुछ गलत कर बैठो तब मैं तुम्हारी सहायता करूं. मुझे पता है कि मैं एक दिन चला जाऊँगा और तुम्हारे पास मेरे जैसा कोई और आ जाएगा. मैं अपने काम से बहुत खुश हूँ. मेरी चिंता मत करो. मैं तुम्हें उदास नहीं देख सकता.”
पेंसिल और इरेज़र के बीच घटा यह संवाद बहुत प्रेरक है. उन्हीं की भाँती माता-पिता इरेज़र और बच्चे पेंसिल की तरह हैं. माता-पिता अपने बच्चों की गलतियों को सुधारने के लिए सदैव तत्पर रहते हैं. इस प्रक्रिया में उन्हें कभी-कभी ज़ख्म भी मिलते हैं और वे छोटे – बूढ़े होते हुए एक दिन हमेशा के लिए चले जाते हैं. बच्चों को उनकी जगह कोई और (जीवनसाथी) मिल जाता है लेकिन माता-पिता अपने बच्चों का हित देखकर हमेशा खुश ही होते हैं. वे अपने बच्चों पर कभी कोई विपदा या चिंता मंडराते नहीं देख सकते.
* * *
इसी ब्लॉग में पेंसिल का सन्देश भी बहुत पहले पोस्ट किया गया था, उसे पढना भी आपको अच्छा लगेगा.

Tuesday, 22 September 2015

Monday, 21 September 2015

सस्पेंडेड कॉफ़ी

हिंदीज़ेन से साभार

इसे मैंने फेसबुक पर पढ़ा. अच्छा लगा इसलिए हिंदी अनुवाद करके यहां लगा रहा हूं.

“मैं अपने एक मित्र के साथ एक छोटे कॉफीहाउस गया और हमने अपना ऑर्डर दिया. जब हम अपनी टेबल की ओर जा रहे थे तब मैंने देखा कि दो लोग आए और उन्होंने काउंटर पर जाकर कहा:
‘तीन कॉफी. दो हमारे लिए और एक सस्पेंडेड कॉफी’, उन्होंने पैसे दिए और दो कॉफी लेकर चले गए.
मैंने अपने मित्र से पूछा, “ये सस्पेंड कॉफी क्या होती है?”
उसने कहा, “देखो, अभी पता चल जाएगा.”
कुछ और लोग वहां आए. दो लड़कियों ने कॉफी ली और पैसे देकर चलती बनीं. अगला ऑर्डर तीन वकीलों ने दिया – अपने लिए तीन कॉफी और बाकी दो सस्पेंडेड. मुझे सस्पेंडेड कॉफी का चक्कर समझ में नहीं आ रहा था. मौसम बहुत खुशगवार था और मैं कॉफीहाउस की खिड़की से बाहर चौराहे का सुंदर नज़ारा देख रहा था. तभी मैले कपड़े पहने एक गरीब आदमी भीतर आया और उसने काउंटर पर बैठे मैनेजर से बड़ी उम्मीद से पूछा, ‘क्या कोई सस्पेंडेड कॉफी है?’
मैं समझ गया कि लोग अपनी ओर से कीमत अदा करके उन व्यक्तियों के लिए कॉफी का इंतजाम कर रहे थे जो गरीब होने के कारण कॉफी नहीं खरीद पाते. सस्पेंडेड कॉफी खरीदने का यह दस्तूर नेपल्स में शुरु हुआ लेकिन अब यह दुनिया में दूर-दूर तक फैल चुका है और लोग सस्पेंडेड कॉफी ही नहीं बल्कि सैंडविच या पूरा खाना भी ऑर्डर करते हैं.
कितना अच्छा हो यदि दुनिया के हर शहर और कस्बे में ऐसे रेस्तरां या ऐसी राशन की दुकानें भी हों जहां कोई जाकर किसी ज़रूरतमंद की मदद कर सके… उसे थोड़ी खुशी दे सके. 
(~_~)

Sunday, 20 September 2015

मोतियों के सौदागर

http://hindizen.com/2014/07/12/jewel-merchants/


एक रात हीरे-जवाहरात के दो सौदागर किसी दूरदराज़ रेगिस्तान की सराय पर लगभग एक ही वक़्त पर पहुंचे. उन दोनों को एक-दूसरे की मौजूदगी का अहसास था. जब वे अपने ऊंटों से माल-असबाब उतार रहे थे तब उनमें से एक सौदागर ने जानबूझकर एक बड़ा मोती थैले से गिरा दिया.
मोती लुढ़कता हुआ दुसरे सौदागर के करीब पहुँच गया, जिसने बारीकी से मुआयना करते हुए उसे उठाया और पहले सौदागर को सौंपते हुए कहा, “यह तो बहुत ही बड़ा और नायाब मोती है. इसकी रंगत और चमक बेमिसाल है.”
पहले सौदागर ने बेपरवाही से कहा, “इतनी तारीफ करने के लिए आपका शुक्रिया लेकिन यह तो मेरे माल का बहुत मामूली और छोटा मोती है”.
दोनों सौदागरों के पासे ही एक खानाबदोश बद्दू बैठा आग ताप रहा था. उसने यह माजरा देखा और उठकर दोनों सौदागरों को अपने साथ खाने का न्यौता दिया. खाने के दौरान बद्दू ने उन्हें अपने साथ बीता एक पुराना वाकया सुनाया.
“दोस्तों, बहुत साल बीते मैं भी आप दोनों की मानिंद हीरे-जवाहरातों का बड़ा मशहूर सौदागर था. एक दिन मेरा कारवां रेगिस्तान के भयानक अंधड़ में फंस गया. मेरे साथ के लोग तितर-बितर हो गए और मैं अपने साथियों से बिछड़कर राह खो बैठा.”
“कई दिनों तक मैं अपने ऊँट के साथ भूखा-प्यासा रेगिस्तान में भटकता रहा लेकिन मुझे कहीं कुछ नहीं मिला. खाने की किसी चीज़ की तलाश में मैंने अपने ऊँट पर लदे हर थैले को दसियों बार खोलकर देखा.”
“आप मेरी हैरत का अंदाजा नहीं लगा सकते जब मुझे माल में एक ऐसा छोटा थैला मिला जो मेरी नज़रों से तब तक बचा रह गया था. कांपती हुई उँगलियों से मैंने उस थैले को खोला.”
“और आप जानते हैं उस थैले में क्या था?”
“वह बेशकीमती मोतियों से भरा हुआ था.”
(~_~)

Saturday, 19 September 2015

बुद्ध के धर्म का सार

http://hindizen.com/2012/05/01/essence/

पो चीन के तांग राजवंश में उच्चाधिकारी और कवि था. एक दिन उसने एक पेड़ की शाखा पर बैठे बौद्ध महात्मा को ध्यान करते देखा. उनके मध्य यह वार्तालाप हुआ:
पो: “महात्मा, आप इस पेड़ की शाखा पर बैठकर ध्यान क्यों कर रहे हैं? ज़रा सी भी गड़बड़ होगी और आप नीचे गिरकर घायल हो जायेंगे!”
महात्मा: “मेरी चिंता करने के लिए आपका धन्यवाद, महामहिम. लेकिन आपकी स्थिति इससे भी अधिक गंभीर है. यदि मैं कोई गलती करूंगा तो मेरी ही मृत्यु होगी, लेकिन शासन के इतने ऊंचे पद पर बैठकर आप कोई गलती कर बैठेंगे तो सैंकड़ों-हजारों मनुष्यों का जीवन खतरे में पड़ जाएगा”.
पो: “शायद आप ठीक कहते हैं. अब मैं कुछ कहूं? यदि आप मुझे बुद्ध के धर्म का सार एक वाक्य में बता देंगे तो मैं आपका शिष्य बन जाऊँगा, अन्यथा, मैं आपसे कभी मिलना नहीं चाहूँगा”.
महात्मा: “यह तो बहुत सरल है! सुनिए. बुद्ध के धर्म का सार यह है, ‘बुरा न करो, अच्छा करो, और अपने मन को शुद्ध रखो’.”
पो: “बस इतना ही!? यह तो एक तीन साल का बच्चा भी जानता है!”
महात्मा: “आपने सही कहा. एक तीन साल के बच्चे को भी इसका ज्ञान होता है, लेकिन अस्सी साल के व्यक्ति के लिए भी इसे कर सकना कठिन है.”

Friday, 18 September 2015

चंद्रमा की ओर इशारा

http://hindizen.com/2013/11/29/finger-pointing-to-the-moon/

भिक्षुणी वू जिन्कांग ने आचार्य हुइनेंग से पूछा, “मैं कई वर्षों से महापरिनिर्वाण सूत्र का पारायण कर रही हूं लेकिन इनमें कही अनेक बातों को समझ नहीं पा रही हूं. कृपया मुझे उनका ज्ञान दें.”
आचार्य ने कहा, “मुझे पढ़ना नहीं आता. यदि तुम मुझे वे अंश पढ़कर सुना दो तो शायद मैं तुम्हें उनका अर्थ बता पाऊं.”
भिक्षुणी ने कहा, “आपको लिखना-पढ़ना नहीं आता फिर भी आप इन गूढ़ शास्त्रों का ज्ञान कैसे आत्मसात कर लेते हैं?”
“सत्य शब्दों पर आश्रित नहीं होता. यह आकाश में दीप्तिमान चंद्रमा की भांति है, और शब्द हमारी उंगली हैं. उंगली से इशारा करके आकाश में चंद्रमा की स्थिति को दर्शाया जा सकता है, लेकिन उंगली चंद्रमा नहीं है. चंद्रमा को देखने के लिए दृष्टि को उंगली के परे ले जाना पड़ता है. ऐसा ही है न?”, आचार्य ने कहा.
इस दृष्टांत का सार यह है कि चंद्रमा की ओर इंगित करने वाली उंगली चंद्रमा नहीं है. क्या इसका कोई गहन अर्थ भी है? हमारे दिन-प्रतिदिन के जीवन से इसका क्या संबंध है? इस दृष्टांत के अर्थ का हम किस प्रकार उपयोग कर सकते हैं?
चित्र में लॉफ़िंग बुद्ध होतेई चंद्रमा की ओर इशारा कर रहा है. होतेई चीन के परवर्ती लियांग राजवंश (907–923 ईसवी) में महात्मा था. प्रसन्नता और संतोष होतेई के चित्र व चरित्र का रेखांकन करने वाले प्रमुख तत्व हैं. उसकी थलथलाते हुए पेट और प्रसन्नचित्त मुखमंडल की छवि विषाद हर लेती है.
* * * * *

Thursday, 17 September 2015

नीड़ का निर्माण / पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

वह उठी आँधी कि नभ में
छा गया सहसा अँधेरा,
धूलि धूसर बादलों ने
भूमि को इस भाँति घेरा,

रात-सा दिन हो गया, फिर
रात आ‌ई और काली,
लग रहा था अब न होगा
इस निशा का फिर सवेरा,

रात के उत्पात-भय से
भीत जन-जन, भीत कण-कण
किंतु प्राची से उषा की
मोहिनी मुस्कान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

वह चले झोंके कि काँपे
भीम कायावान भूधर,
जड़ समेत उखड़-पुखड़कर
गिर पड़े, टूटे विटप वर,

हाय, तिनकों से विनिर्मित
घोंसलो पर क्या न बीती,
डगमगा‌ए जबकि कंकड़,
ईंट, पत्थर के महल-घर;

बोल आशा के विहंगम,
किस जगह पर तू छिपा था,
जो गगन पर चढ़ उठाता
गर्व से निज तान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

क्रुद्ध नभ के वज्र दंतों
में उषा है मुसकराती,
घोर गर्जनमय गगन के
कंठ में खग पंक्ति गाती;

एक चिड़िया चोंच में तिनका
लि‌ए जो जा रही है,
वह सहज में ही पवन
उंचास को नीचा दिखाती!

नाश के दुख से कभी
दबता नहीं निर्माण का सुख
प्रलय की निस्तब्धता से
सृष्टि का नव गान फिर-फिर!

नीड़ का निर्माण फिर-फिर,
नेह का आह्णान फिर-फिर!

Wednesday, 16 September 2015

बुद्ध-प्रतिमा को बंदी बनाना

http://hindizen.com/2008/10/09/buddha-in-jail/


एक व्यापारी कपड़े के 50 थान लेकर दूसरे नगर में बेचने जा रहा था। मार्ग में एक स्थान पर वह सुस्ताने के लिए एक पेड़ के नीचे बैठ गया। वहीं पेड़ की छांव में भगवान बुद्ध की एक प्रतिमा भी लगी हुई थी। व्यापारी को बैठे-बैठे नींद लग गयी। कुछ समय बाद जागने पर उसने पाया कि उसके थान चोरी हो गए थे। उसने फ़ौरन पुलिस में जाकर रिपोर्ट लिखवाई।
मामला ओ-ओका नामक न्यायाधीश की अदालत में गया। ओ-ओका ने निष्कर्ष निकाला – ”पेड़ की छाँव में लगी बुद्ध की प्रतिमा ने ही चोरी की है। उसका कार्य वहाँ पर लोगों का ध्यान रखना है, लेकिन उसने अपने कर्तव्य-पालन में लापरवाही की है। प्रतिमा को बंदी बना लिया जाए।”
पुलिस ने बुद्ध की प्रतिमा को बंदी बना लिया और उसे अदालत में ले आए। पीछे-पीछे उत्सुक लोगों की भीड़ भी अदालत में आ पंहुची। सभी जानना चाहते थे कि न्यायाधीश कैसा निर्णय सुनायेंगे।
जब ओ-ओका अपनी कुर्सी पर आकर बैठे तब अदालत परिसर में कोलाहल हो रहा था। ओ-ओका नाराज़ हो गए और बोले – “इस प्रकार अदालत में हँसना और शोरगुल करना अदालत का अनादर है। सभी को इसके लिए दंड दिया जाएगा।”
लोग माफी मांगने लगे। ओ-ओका ने कहा – “मैं आप सभी पर जुर्माना लगाता हूँ, लेकिन यह जुर्माना वापस कर दिया जाएगा यदि यहाँ उपस्थित प्रत्येक व्यक्ति कल अपने घर से कपड़े का एक थान ले कर आए। जो व्यक्ति कपड़े का थान लेकर नहीं आएगा उसे जेल भेज दिया जाएगा।”
अगले दिन सभी लोग कपड़े का एक-एक थान ले आए। उनमें से एक थान व्यापारी ने पहचान लिया और इस प्रकार चोर पकड़ा गया। लोगों को उनके थान लौटा दिए गए और बुद्ध की प्रतिमा को रिहा कर दिया गया।
चित्र साभार – फ्लिकर

Tuesday, 15 September 2015

ताबूत

http://hindizen.com/2009/01/11/a-wooden-box/

एक किसान इतना बूढा हो चुका था कि उससे खेत में काम करते नहीं बनता था। हर दिन वह धीरे-धीरे चलकर खेत को जाता और एक पेड़ की छाँव में बैठा रहता।
उसका बेटा खेत में काम करते समय अपने पिता को पेड़ के नीचे सुस्ताते हुए देखता था और सोचता था – “अब उनसे कुछ भी काम नहीं करते बनता। अब उनकी कोई ज़रूरत नहीं है।”
एक दिन बेटा इस सबसे इतना खिन्न हो गया कि उसने लकड़ी का एक ताबूत बनाया। उसे खींचकर वह खेत के पास स्थित पेड़ तक ले कर गया। उसने अपने पिता से ताबूत के भीतर बैठने को कहा। पिता चुपचाप भीतर बैठ गया। लड़का फ़िर ताबूत को जैसे-तैसे खींचकर पास ही एक पहाड़ी की चोटी तक ले कर गया। वह ताबूत को वहां से धकेलने वाला ही था कि पिता ने भीतर से कुछ कहने के लिए ठकठकाया।
लड़के ने ताबूत खोला। पिता भीतर शान्ति से बैठा हुआ था। पिता ने ऊपर देखकर बेटे से कहा – ”मुझे मालूम है कि तुम मुझे यहाँ से नीचे फेंकने वाले हो। इससे पहले कि तुम यह करो, मैं तुम्हें एक बात कहना चाहता हूँ।”
“क्या?” – लड़के ने पूछा।
“मुझे तुम फेंक दो लेकिन इस ताबूत को संभालकर रख लो। तुम्हारे बच्चों को आगे चलकर काम आएगा।”

Monday, 14 September 2015

पूर्व निष्कर्ष

अरविन्द सर के व्हाट्सएप्प सन्देश से साभार।

एक छोटा सा बच्चा अपने दोनों हाथों में एक एक एप्पल लेकर खड़ा था

उसके पापा ने मुस्कराते हुए कहा "बेटा एक एप्पल मुझे दे दो"

इतना सुनते ही उस बच्चे ने एक एप्पल को दांतो से कुतर लिया.

उसके पापा कुछ बोल पाते उसके पहले ही उसने अपने दूसरे एप्पल को भी दांतों से कुतर लिया

अपने छोटे से बेटे की इस हरकत को देखकर बाप ठगा सा रह गया और उसके चेहरे पर मुस्कान गायब हो गई थी...
तभी उसके बेटे ने अपने नन्हे हाथ आगे की ओर बढाते हुए पापा को कहा....
"पापा ये लो.. ये वाला ज्यादा मीठा है."

शायद हम कभी कभी पूरी बात जाने बिना निष्कर्ष पर पहुंच जाते हैं..
नजर का आपरेशन तो सम्भव है, पर नजरिये का नही..!
फर्क सिर्फ सोच का  होता है...वरना , वही सीढ़ियां ऊपर भी जाती हैं और नीचे भी आती हैं।

Sunday, 13 September 2015

ध्वज-वंदना / रामधारी सिंह "दिनकर"

नमो, नमो, नमो...

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!
नमो नगाधिराज-शृंग की विहारिणी!
नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी!
प्रणय-प्रसारिणी, नमो अरिष्ट-वारिणी!
नमो मनुष्य की शुभेषणा-प्रचारिणी!
नवीन सूर्य की नई प्रभा, नमो, नमो!
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

हम न किसी का चाहते तनिक, अहित, अपकार
प्रेमी सकल जहान का भारतवर्ष उदार
सत्य न्याय के हेतु, फहर फहर ओ केतु
हम विरचेंगे देश-देश के बीच मिलन का सेतु
पवित्र सौम्य, शांति की शिखा, नमो, नमो!
नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

तार-तार में हैं गुंथा ध्वजे, तुम्हारा त्याग
दहक रही है आज भी, तुम में बलि की आग
सेवक सैन्य कठोर, हम चालीस करोड़
कौन देख सकता कुभाव से ध्वजे, तुम्हारी ओर
करते तव जय गान, वीर हुए बलिदान
अंगारों पर चला तुम्हें ले सारा हिन्दुस्तान!
प्रताप की विभा, कृषानुजा, नमो, नमो!

नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो!

Saturday, 12 September 2015

कृष्ण की चेतावनी / रामधारी सिंह "दिनकर"

वर्षों तक वन में घूम-घूम,
बाधा-विघ्नों को चूम-चूम,
सह धूप-घाम, पानी-पत्थर,
पांडव आये कुछ और निखर।
सौभाग्य न सब दिन सोता है,
देखें, आगे क्या होता है।

मैत्री की राह बताने को,
सबको सुमार्ग पर लाने को,
दुर्योधन को समझाने को,
भीषण विध्वंस बचाने को,
भगवान् हस्तिनापुर आये,
पांडव का संदेशा लाये।

‘दो न्याय अगर तो आधा दो,
पर, इसमें भी यदि बाधा हो,
तो दे दो केवल पाँच ग्राम,
रक्खो अपनी धरती तमाम।
हम वहीं खुशी से खायेंगे,
परिजन पर असि न उठायेंगे!

दुर्योधन वह भी दे ना सका,
आशिष समाज की ले न सका,
उलटे, हरि को बाँधने चला,
जो था असाध्य, साधने चला।
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।

हरि ने भीषण हुंकार किया,
अपना स्वरूप-विस्तार किया,
डगमग-डगमग दिग्गज डोले,
भगवान् कुपित होकर बोले-
‘जंजीर बढ़ा कर साध मुझे,
हाँ, हाँ दुर्योधन! बाँध मुझे।

यह देख, गगन मुझमें लय है,
यह देख, पवन मुझमें लय है,
मुझमें विलीन झंकार सकल,
मुझमें लय है संसार सकल।
अमरत्व फूलता है मुझमें,
संहार झूलता है मुझमें।

‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।

‘दृग हों तो दृश्य अकाण्ड देख,
मुझमें सारा ब्रह्माण्ड देख,
चर-अचर जीव, जग, क्षर-अक्षर,
नश्वर मनुष्य सुरजाति अमर।
शत कोटि सूर्य, शत कोटि चन्द्र,
शत कोटि सरित, सर, सिन्धु मन्द्र।

‘शत कोटि विष्णु, ब्रह्मा, महेश,
शत कोटि विष्णु जलपति, धनेश,
शत कोटि रुद्र, शत कोटि काल,
शत कोटि दण्डधर लोकपाल।
जञ्जीर बढ़ाकर साध इन्हें,
हाँ-हाँ दुर्योधन! बाँध इन्हें।

‘भूलोक, अतल, पाताल देख,
गत और अनागत काल देख,
यह देख जगत का आदि-सृजन,
यह देख, महाभारत का रण,
मृतकों से पटी हुई भू है,
पहचान, इसमें कहाँ तू है।

‘अम्बर में कुन्तल-जाल देख,
पद के नीचे पाताल देख,
मुट्ठी में तीनों काल देख,
मेरा स्वरूप विकराल देख।
सब जन्म मुझी से पाते हैं,
फिर लौट मुझी में आते हैं।

‘जिह्वा से कढ़ती ज्वाल सघन,
साँसों में पाता जन्म पवन,
पड़ जाती मेरी दृष्टि जिधर,
हँसने लगती है सृष्टि उधर!
मैं जभी मूँदता हूँ लोचन,
छा जाता चारों ओर मरण।

‘बाँधने मुझे तो आया है,
जंजीर बड़ी क्या लाया है?
यदि मुझे बाँधना चाहे मन,
पहले तो बाँध अनन्त गगन।
सूने को साध न सकता है,
वह मुझे बाँध कब सकता है?

‘हित-वचन नहीं तूने माना,
मैत्री का मूल्य न पहचाना,
तो ले, मैं भी अब जाता हूँ,
अन्तिम संकल्प सुनाता हूँ।
याचना नहीं, अब रण होगा,
जीवन-जय या कि मरण होगा।

‘टकरायेंगे नक्षत्र-निकर,
बरसेगी भू पर वह्नि प्रखर,
फण शेषनाग का डोलेगा,
विकराल काल मुँह खोलेगा।
दुर्योधन! रण ऐसा होगा।
फिर कभी नहीं जैसा होगा।

‘भाई पर भाई टूटेंगे,
विष-बाण बूँद-से छूटेंगे,
वायस-श्रृगाल सुख लूटेंगे,
सौभाग्य मनुज के फूटेंगे।
आखिर तू भूशायी होगा,
हिंसा का पर, दायी होगा।’

थी सभा सन्न, सब लोग डरे,
चुप थे या थे बेहोश पड़े।
केवल दो नर ना अघाते थे,
धृतराष्ट्र-विदुर सुख पाते थे।
कर जोड़ खड़े प्रमुदित,
निर्भय, दोनों पुकारते थे ‘जय-जय’!