Monday, 12 October 2015

लाओत्ज़ु का गधा

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लाओत्ज़ु अपने गधे पर सवार होकर एक शहर से दूसरे शहर जा रहा था. उसे रास्ते में राजा का दूत मिला. दूत ने लाओत्ज़ु से कहा -“राजा ने आपके बारे में बहुत कुछ सुना है और वे आपको अपने दरबारियों में सम्मिलित करना चाहते हैं. उन्हें बुद्धिमान जनों की ज़रुरत है.”
लाओत्ज़ु ने दूत से बहुत सम्मानपूर्ण व्यवहार किया और कहा – “क्षमा करें, पर यह संभव नहीं है. राजा को धन्यवाद दें और कहें कि मैं इस अनुरोध को स्वीकार नहीं कर सकता.”
जब दूत वापस जाने लगा तब लाओत्ज़ु ने अपने कान और अपने गधे के कानों को धोया. यह देखकर पास खड़े एक व्यक्ति ने पूछा – “आप ये क्या कर रहे हैं?”
लाओत्ज़ु ने कहा – “मैं अपने कान धो रहा हूँ क्योंकि राजनीतिक गलियारों से होकर आनेवाले सन्देश अपवित्र और खतरनाक होते हैं.”
आदमी ने पूछा – “लेकिन आपने अपने गधे के कान क्यों धोये?”
लाओत्ज़ुने कहा – “गधों में बड़ी राजनीतिक समझ होती है. वह पहले ही कुछ अजीब तरह से चल रहा था. जब उसने राजा के दूत का सन्देश सुना तो उसे स्वयं पर बड़ा अभिमान हो गया. उसने भी बड़े सपने संजो लिए. राजदरबार की भाषा की इतनी समझ तो मुझमें भी नहीं है जितनी इस गधे में है. ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि दरबार में भी इसके जैसे गधे ही भरे हुए हैं. इन सबकी भाषा एक समान है.”
यह सुनकर वह व्यक्ति बहुत हंसा. कहते हैं कि यह बात राजा तक भी पहुंची और इसे सुनकर राजा भी बहुत हंसा.
ऐसा था लाओत्ज़ु. उसकी बातें सुनकर सभी हंसते थे. वह अपने समय का सबसे ज्ञानी, सबसे विलक्षण, और बचकाना आदमी था. किसी ने भी उसे गंभीरता से नहीं लिया. उसने लोगों को कभी भी इतना प्रभावित नहीं किया कि वे उसकी शिक्षाओं को सहेजने के बारे में गंभीरता से सोचते. उसने अपने पीछे कोई धर्म या शास्त्र या संघ नहीं छोड़ा. वह सदैव अकेला ही रहा और सबसे शुद्ध बना रह सका.

Sunday, 11 October 2015

अमित के जन्म-दिन पर / हरिवंशराय बच्चन

अमित को बारंबार बधाई!
आज तुम्हारे जन्म-दिवस की,
मधुर घड़ी फिर आई।
अमित को बारंबार बधाई!

उषा नवल किरणों का तुमको
दे उपहार सलोना,
दिन का नया उजाला भर दे
घर का कोना-कोना,
रात निछावर करे पलक पर
सौ सपने सुखदायी।
अमित को बारंबार बधाई!

जीवन के इस नये बरस में
नित आनंद मनाओ,
सुखी रहो तन-मन से अपनी
कीर्ति-कला फैलाओ,
तुम्हें सहज ही में मिल जाएं
सब चीजें मन-भायी।
अमित को बारंबार बधाई!

Saturday, 10 October 2015

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ / हरिवंशराय बच्चन

सोचा करता बैठ अकेले,
गत जीवन के सुख-दुख झेले,
दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

नहीं खोजने जाता मरहम,
होकर अपने प्रति अति निर्मम,
उर के घावों को आँसू के खारे जल से नहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

आह निकल मुख से जाती है,
मानव की ही तो छाती है,
लाज नहीं मुझको देवों में यदि मैं दुर्बल कहलाता हूँ!
ऐसे मैं मन बहलाता हूँ!

Friday, 9 October 2015

20 ज़रूरी बातों की लिस्ट

हिंदीज़ेन 

इंटरनेट पर यह इमेज लिस्ट मिली तो इसे आप लोगों से शेयर करने के बारे में सोचा. इस लिस्ट में हमारे शरीर और मन को स्वस्थ व संपन्न रखने के लिए जिन उपायों के बारे में बताया गया है वे बहुत सामान्य हैं और हमारी पुरानी पीढ़ियों के लोग इन्हें बहुत महत्व देते थे. भागदौड़ भरी व तनावयुक्त आधुनिक जीवनशैली के कारण हम कई अच्छी आदतों को अपना नहीं पाते. ये लिस्ट उन्हीं अच्छी आदतों या बातों का रिमांइडर हैः-
1. दिन भर में कई बार पानी पीजिए. पर्याप्त मात्रा में पानी पीना आपको अनेक रोगों से दूर रख सकता है. दूध वाली उबली चाय एसिडिटी बढ़ाती है. इसके स्थान पर नैचुरल जायके वाली ग्रीन-टी पीजिए.
2. दिन की शुरुआत पौष्टिक नाश्ते से करें. दोपहर का भोजन औसत लें और रात को भरपेट खाने से बचें.
3. अपने भोजन में अनाज और डिब्बाबंद फूड के स्थान पर फलों, सब्जियों और प्राकृतिक आहार को वरीयता दें.
4. सुबह से शाम तक एक ही जगह पर टिककर बैठे न रहें. सुबह या शाम कुछ दूरी तक पैदल चलें और हो सके तो सप्ताह में एक बार तैरने या साइकिल चलाने की आदत डालें.
5. हर समय इंटरनेट, टीवी या मोबाइल से ही चिपके न रहें. अपने पसंदीदा विषयों की किताबों को पढ़ना जारी रखें. अपने बच्चों को किताबों से ज्ञान अर्जित करने के लाभ बताएं.
6. सुखद नींद आपके मनोरंजन से ज्यादा ज़रूरी है. कितना भी काम का दबाव या सीरियल/फिल्म देखने की चाह हो लेकिन अपनी ज़रूरत के हिसाब से 6 से 8 घंटे की नींद ज़रूर लें. रात को दस बजे तक सोने और सुबह सात बजे तक उठ जाने से शरीर व मष्तिष्क को भरपूर आराम मिलता है और आप तरोताज़ा बने रहते हैं.
7. अपने या किसी और के बारे में निगेटिव विचार अपने मन में न लाएं. हर व्यक्ति में कुछ अच्छे की खोज करें और उससे सीखें. उदार और हंसमुख बनें.
8. बीती ताहि बिसार दें. अतीत में घट चुकी बातों और बुरे अनुभवों को अपने ऊपर हावी न होने दें. अपने मन में किसी भी व्यक्ति या घटना से उपजी कड़वाहट को घर न करने दें.
9. छोटी-छोटी खुशियों के पलों की अनदेखी न करें. ज़िंदगी इन्हीं लम्हों से मिलकर बनती है. तुनकमिजाजी भरा व्यवहार आपके प्रियजनों को आपसे दूर करता जाएगा.
10. खुद को किसी से कमतर न आंकें. अपनी या किसी दूसरे व्यक्ति की तुलना किसी और से न करें. प्रयास करें कि किस तरह आप अपनी व अन्य व्यक्तियों की खुशियों व क्षमताओं को बढ़ा सकते हैं.
11. नियमित योग व ध्यान साधना आपको स्थिर व स्वस्थ रख सकती है. तनाव तथा असंयमित जीवनशैली के कारण उपजी समस्याओं के उपचार के लिए इनके लिए समय निकालिए.
12. टालमटोल करने की आदत से बचिए. यदि किसी छोटे काम को आप सिर्फ दो मिनटों में ही कर सकते हों तो उसे फौरन कर डालिए.
13. प्रोसेस्ड या प्रेज़रवेटिव वाले भोजन और बाहर का खाना खाने की बजाए प्राकृतिक व ऑर्गेनिक आहार को तरजीह दें. अधिक गर्म/ठंडा, अधिक मीठा/नमकीन व अधिक तेल/मसाले वाले भोजन से होनेवाले नुकसान सर्वविदित हैं.
14. अपनी पीठ व गर्दन को एक ही मुद्रा में बैठे रहने के कारण होनेवाली अकड़न से बचाने के लिए कुछ-कुछ अंतराल पर उठकर अपने हाथ-पैर आदि को स्ट्रेच करने की आदत डालिए. इससे आपको कंप्यूटर के कारण होनेवाले कलाई के दर्द व आंखों की जलन में भी आराम मिलेगा.
15. शांत संगीत सुनें. पक्षियों के कलरव को सुननने के लिए शहर के कोलाहल से दूर जाएं. गाएं. गुनगुनाएं.
16. अपने परिवेश को साफ-सुथरा रखें. अपनी डेस्क और टेबल आदि से गैरज़रूरी चीजों व क्लटर को हटा दें.
17. ऐसे वस्त्रादि पहनें जिन्हें पहनने से आपको खुशी मिलती हो. फैशन या दूसरी की ख्वाहिश पूरी करने के लिए अपनी इच्छाओं को दरकिनार न करें.
18. जिन चीजों की आपको ज़रुरत न हो उन्हें या तो बेच दें या किसी और को दें. चीजों को Repair, Reuse या Recycle करने की नीति का पालन करें.
19. हमेशा आशान्वित रहें कि आप जो कुछ भी कर रहे हैं वह सबके हित में होगा. लक्ष्य बनाएं और उसकी प्राप्ति की दिशा में भरसक प्रयास करें. असफलताओं से हताश व निराश न हों.
20. असल ज़िंदगी हमारे घर और comfort zone के बाहर है. पुराने दोस्तों की खोजखबर लें. दुनिया देखें. नए लोगों से मिलें, कुछ नया करें. नई रुचियां विकसित करें… आप जो जानते हों वह दूसरों को सिखाएं.

Thursday, 8 October 2015

अस्वस्थ हूँ

आज तबियत नासाज़ है। आज आराम कर लेता हूँ, ताकि कल आपसे कुशलता से बात कर सकूं।

Wednesday, 7 October 2015

कोई विरला विष खाता है/ पद्मभूषण डॉ हरिवंशराय बच्चन

कोई विरला विष खाता है!
मधु पीने वाले बहुतेरे,
और सुधा के भक्त घनेरे,
गज भर की छातीवाला ही विष को अपनाता है!
कोई विरला विष खाता है!
पी लेना तो है ही दुष्कर,
पा जाना उसका दुष्करतर,
बडा भाग्य होता है तब विष जीवन में आता है!
कोई विरला विष खाता है!
स्वर्ग सुधा का है अधिकारी,
कितनी उसकी कीमत भारी!
किंतु कभी विष-मूल्य अमृत से ज्यादा पड़ जाता है!
  1. कोई विरला विष खाता है!

Tuesday, 6 October 2015

Monday, 5 October 2015

दक्षिणा के मोती

हिंदीज़ेन से साभार।


नदी के तट पर गुरुदेव ध्यानसाधना में लीन थे. उनका एक शिष्य उनके पास आया. उसने गुरु के प्रति भक्ति और समर्पण की भावना के वशीभूत होकर दक्षिणा के रूप में उनके चरणों के पास दो बहुत बड़े-बड़े मोती रख दिए.
गुरु ने अपने नेत्र खोले. उन्होंने एक मोती उठाया, लेकिन वह मोती उनके उनकी उँगलियों से छूटकर नदी में गिर गया.
यह देखते ही शिष्य ने नदी में छलांग लगा दी. सुबह से शाम तक नदी में दसियों गोते लगा देने के बाद भी उसे वह मोती नहीं मिला. अंत में निराश होकर उसने गुरु को उनके ध्यान से जगाकर पूछा – “आपने तो देखा था कि मोती कहाँ गिरा था! आप मुझे वह जगह बता दें तो मैं उसे ढूंढकर वापस लाकर आपको दे दूँगा!”
गुरु ने दूसरा मोती उठाया और उसे नदी में फेंकते हुए बोले – “वहां!”
(~_~)

Sunday, 4 October 2015

प्राचीन प्रथा

हिंदीज़ेन से साभार।

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मरू-प्रदेश की भूमि में बहुत कम फल उपजते थे. अतः ईश्वर ने अपने पैगंबर को पृथ्वी पर यह नियम पहुंचाने के लिए कहा, “प्रत्येक व्यक्ति दिन में केवल एक ही फल खाए”.
लोगों में मसीहा की बात मानी और दिन में केवल एक ही फल खाना प्रारंभ कर दिया. यह प्रथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी चलती रही. दिन में एक ही फल खाने के कारण इलाके में फलों की कमी नहीं पड़ी. जो फल खाने से बच रहते थे उनके बीजों से और भी कई वृक्ष पनपे. जल्द ही प्रदेश की भूमि उर्वर हो गयी और अन्य प्रदेशों के लोग वहां बसने की चाह करने लगे.
लेकिन लोग दिन में एक ही फल खाने की प्रथा पर कायम रहे क्योंकि उनके पूर्वजों के अनुसार मसीहा ने उन्हें ऐसा करने के लिए कहा था. दूसरे प्रदेश से वहां आनेवाले लोगों को भी उन्होंने फलों की बहुतायत का लाभ नहीं उठाने दिया.
इसका परिणाम यह हुआ कि अधिशेष फल धरती पर गिरकर सड़ने लगे. उनका घोर तिरस्कार हो रहा था.
ईश्वर को यह देखकर दुःख पहुंचा. उसने पुनः पैगंबर को बुलाकर कहा, “उन्हें जाकर कहो कि वे जितने चाहें उतने फल खा सकते हैं. उन्हें फल अपने पड़ोसियों और अन्य शहरों के लोगों से बांटने के लिए कहो”.
मसीहा ने प्रदेश के लोगों को ईश्वर का नया नियम बताया. लेकिन नगरवासियों ने उसकी एक न सुनी और उसपर पत्थर फेंके. ईश्वर का बताया पुराना नियम शताब्दियों से उनके मन और ह्रदय दोनों पर ही उत्कीर्ण हो चुका था.
समय गुज़रता गया. धीरे-धीरे नगर के युवक इस पुरानी बर्बर और बेतुकी प्रथा पर प्रश्नचिह्न लगाने लगे. जब उन्होंने देखा कि उनके बड़े-बुजुर्ग टस-से-मस होने के लिए तैयार नहीं हैं तो उन्होंने धर्म का ही तिरस्कार कर दिया. अब वे मनचाही मात्रा में फल खा सकते थे और उन्हें भी खाने को दे सकते थे जो उनसे वंचित थे.
केवल स्थानीय देवालयों में ही कुछ ऐसे लोग बच गए थे जो स्वयं को ईश्वर के अधिक समीप मानते थे और पुरानी प्रथाओं का त्याग नहीं करना चाहते थे. सच तो यह है कि वे यह देख ही नहीं पा रहे थे कि दुनिया कितनी बदल गयी थी और परिवर्तन सबके लिए अनिवार्य हो गया था.
(पाउलो कोएलो के ब्लॉग से)

Saturday, 3 October 2015

भविष्यवेत्ता

हिंदीज़ेन से साभार।

एक बहुत पूरानी यूनानी कहानी सुनाता हूँ।

(तस्वीर लेख से नहीं लिया गया है)

आपको. उन दिनों कहीं एक बहुत प्रसिद्ध भविष्यवेत्ता रहता था. एक दिन वह राह चलते कुएं में गिर गया. हुआ यूं कि वह रात के दौरान तारों का अवलोकन करते हुए चला जा रहा था. उसे पता न था कि राह में कहीं एक कुंआ है, उसी कुंए में वो गिर गया.
उसके गिरने और चिल्लाने की आवाज़ सुनकर पास ही एक झोपड़ी में रहनेवाली बुढ़िया उसकी मदद को वहां पहुंच गई और उसे कुंए से निकाला.
जान बची पाकर भविष्यवेत्ता बहुत खुश हुआ. वह बोला, “तुम नहीं आतीं तो मैं मारा जाता! तुम्हें पता है मैं कौन हूं? मैं राज-ज्योतिषी हूं. हर कोई आदमी मेरी फीस नहीं दे सकता – यहां तक कि राजाओं को भी मेरा परामर्श लेने के लिए महीनों तक इंतज़ार करना पड़ता है – लेकिन मैं तुमसे कोई पैसा नहीं लूंगा. तुम कल मेरे घर आओ, मैं मुफ्त में तुम्हारा भविष्य बताऊंगा”.
यह सुनकर बुढ़िया बहुत हंसी और बोली, “यह सब रहने दो! तुम्हें अपने दो कदम आगे का तो कुछ दिखता नहीं है, मेरा भविष्य तुम क्या बताओगे?”
(~_~)