Sunday, 20 March 2016

बदलाव को स्वीकार कीजिए

बदलाव एक ऐसी सतत होने वाली चीज़ है जिसे हम चाह कर भी इक दूजे से अलग नहीं कर सकते। आप सोच रहे होंगे, एक दूजे से? जी, इक दूजे से। हर पल दूसरे पल से जुड़ा हुआ है, अगर आपने पिछले पल को नहीं जिया तो इस पल में ख़ुशी को सोचना भी एक गुनाह है क्योंकि इस पल में ख़ुशी तभी आ सकती है जब हमने पिछले पल को आनंद से गुज़ारा हो।

मैं किसी बाबा या उन जैसा नहीं लगना चाहता इसलिए कहता हूँ की साहब बदलाव समय की पुकार है, और ये किसी समय से नहीं, सतत समय से जुड़ा हुआ है। सतत समय जो इस ब्लॉग के लेखन के दौरान भी है, इसके पूर्ण होने पर भी रहेगा, और उसके बाद भी रहेगा मगर हर पल बदलता ज़रूर रहेगा।

ज़रुरत है की हम उस बदलाव को स्वीकार करें और खुद को बेहतर बनाए क्यूँकि बदलाव और समय किसी का इंतज़ार नहीं करते, वैसे भी चलता हुआ पानी कल-कल की ध्वनि करता है जबकि रुका-ठहरा हुआ पानी बदबू मारता है।
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लेखक - अमित शुक्ला

Wednesday, 9 March 2016

बड़ी भागादौड़ी है

आज एक नई शुरुआत हुई, एक बिल्कुल नई। शायद अपने सपने को पाने की ओर एक कदम बढ़ाया, मगर चारों ओर ये शोर कैसा? ये भागम-भाग कैसी?

एक पल को लगा की ये क्या हो रहा है? हम एक पल के लिए भी क्यूँ नही रुक रहे, सोचने के लिए, चिंतन के लिए, मगर जब थोड़ा और सोचा तो लगा की आजकल तो यही चल रहा है, हर एक अपने एक भुलावे में है, जल्दी में, किसी को किसी चीज़ के लिए वक़्त नहीं है, इतना भी नहीं की अगर कोई रास्ते में चोटिल पड़ा हो तब हम उसको अस्पताल पहुँचा सकें, या अगर कोई किसी के साथ बत्तमीजी करे तो हम उसका विरोध करें, इतने व्यस्त है हम।

जब उपरोक्त घटनाएँ हमारे साथ होती है तो हम सोचते है की काश कोई हमारी मदद को आता, मगर जब हमें किसी की मदद करनी चाहिए तो हम आँख मूँद लेते है या यूं कहूँ की फेर लेते है ताकि कोई हमें ना कहें की आपने देखते हुए भी कुछ क्यूँ नहीं किया। ये कितना कमाल है ना की हमें खुद के लिए सब कुछ अच्छा चाहिए होता है,मगर हम ये जानते है की कुछ भी अच्छा तब तक नहीं हो सकता जब तक  हम अच्छा करने की कोशिश नहीं करते या किसी और के लिए नहीं करते।

अस्मिता थिएटर का एक नाटक है 'दस्तक' जो महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के बारे में हमें जागरूक करता है और ये भी समझाता है की हमें क्या करना चाहिए, उसी नाटक में एक कविता का ज़िक्र होता है जो द्धितीय विश्व युद्ध के दौरान की है, और अगर आपको ये समझ में आ गई तो शायद आप भागादौड़ी के बीच में भी जीवन से सामंजस्य बनाएँगे।  वो कविता कुछ इस प्रकार है:

'पहले वो मेरे शहर में आए लोगों को मारने लगे मैंने कुछ नही कहा ,फिर वो मेरे मोहल्ले मे आए मै चुप रहा , फिर वो मेरी गली में आएँ, मैंने अपनी आँखें बंद कर ली और जब वो मेरे घर में आएँ तो मुझे बचाने वाला कोई नहीं बचा था.'